30 दिसम्बर 2025 |✍🏻 Z S Razzaqi | अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की जमकर तारीफ़ करते हुए एक ऐसा बयान दिया है, जिसने वैश्विक राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। ट्रंप ने कहा कि अगर मौजूदा दौर में नेतन्याहू जैसे नेता इज़राइल की कमान संभाले न होते, तो “शायद आज इज़राइल का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता।”
यह बयान उस समय आया, जब नेतन्याहू फ्लोरिडा में ट्रंप से मुलाक़ात के लिए पहुंचे, और दोनों नेताओं के बीच गाज़ा युद्धविराम के अगले चरण, हमास के निरस्त्रीकरण, ईरान के परमाणु कार्यक्रम और पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति पर व्यापक चर्चा हुई।
“वॉरटाइम प्राइम मिनिस्टर” बताकर ट्रंप ने नेतन्याहू को सराहा
डोनाल्ड ट्रंप ने नेतन्याहू को एक “wartime prime minister” यानी युद्धकालीन प्रधानमंत्री बताते हुए कहा—
“उन्होंने असाधारण काम किया है। उन्होंने इज़राइल को एक बेहद खतरनाक और गहरे आघात वाले दौर से बाहर निकाला है। यह कोई छोटी बात नहीं है।”
ट्रंप ने आगे कहा—
“अगर उस समय गलत प्रधानमंत्री होता, तो सच्चाई यह है कि आज इज़राइल शायद अस्तित्व में ही न होता।”
इस दौरान नेतन्याहू ट्रंप के बगल में खड़े थे और मुस्कुराते हुए इस बयान पर सहमति जताते दिखाई दिए।
गाज़ा सीज़फायर का दूसरा चरण: हमास से हथियार डालने की शर्त
ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा कि गाज़ा युद्धविराम के दूसरे चरण में प्रवेश करने से पहले हमास को अपने हथियार छोड़ने होंगे।
अमेरिका और इज़राइल दोनों की यह साझा रणनीति है कि—
गाज़ा को पूरी तरह डिमिलिट्राइज़ (निरस्त्रीकृत) किया जाए
हमास को राजनीतिक और सैन्य रूप से निष्क्रिय किया जाए
क्षेत्र में एक अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल (International Stabilization Force) तैनात किया जाए
इज़राइली सरकार की प्रवक्ता शोश बेड्रोसियन के अनुसार, नेतन्याहू का ज़ोर इस बात पर रहेगा कि गाज़ा भविष्य में इज़राइल या अमेरिका के लिए किसी भी तरह का सुरक्षा खतरा न बने।
हमास का सख़्त इनकार: “हथियार नहीं छोड़ेंगे”
हालांकि हमास के सशस्त्र विंग इज़्ज़ुद्दीन अल-क़स्साम ब्रिगेड्स ने ट्रंप और इज़राइल की इस शर्त को सिरे से खारिज कर दिया है।
एक वीडियो बयान में संगठन ने कहा—
“जब तक कब्ज़ा जारी है, हम अपने हथियार नहीं छोड़ेंगे। ये हथियार हमारे आत्मरक्षा के साधन हैं।”
हमास ने यह भी पुष्टि की कि उसके लंबे समय से प्रवक्ता रहे अबू उबैदा की मौत हो चुकी है, जिनके बारे में इज़राइल पहले ही अगस्त 2024 में हवाई हमले में मारे जाने का दावा कर चुका था।
नेतन्याहू का अगला एजेंडा: ईरान पर दबाव बढ़ाने की कोशिश
सूत्रों के मुताबिक, नेतन्याहू इस मुलाक़ात में ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को लेकर भी अमेरिकी दबाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
इज़राइली पक्ष चाहता है कि—
ईरान पर और कड़े प्रतिबंध लगाए जाएँ
उसके बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को निशाना बनाया जाए
ज़रूरत पड़ने पर सैन्य कार्रवाई के विकल्प खुले रखे जाएँ
हालांकि, अमेरिकी थिंक-टैंक Center for International Policy के विश्लेषक सीना तोसी का मानना है कि ट्रंप द्वारा पहले ही यह दावा करना कि जून में हुए अमेरिकी हमलों से ईरान का परमाणु कार्यक्रम “नष्ट हो चुका है”, इज़राइल के लिए अब नई सैन्य कार्रवाई को जायज़ ठहराना मुश्किल बना रहा है।
व्हाइट हाउस में बढ़ती झुंझलाहट?
हालाँकि सार्वजनिक रूप से ट्रंप और नेतन्याहू के रिश्ते मज़बूत दिख रहे हैं, लेकिन अंदरखाने तस्वीर कुछ और है।
अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार—
व्हाइट हाउस के कई वरिष्ठ अधिकारी मानते हैं कि नेतन्याहू सीज़फायर के दूसरे चरण को जानबूझकर टाल रहे हैं
अमेरिका गाज़ा में एक तकनीकी फिलिस्तीनी सरकार और अंतरराष्ट्रीय निगरानी चाहता है
जबकि इज़राइल अब भी सैन्य दबाव बनाए रखने के पक्ष में है
लंदन स्थित थिंक टैंक Chatham House के विशेषज्ञ योसी मेकेलबर्ग का कहना है—
“अमेरिकी प्रशासन में यह धारणा मज़बूत हो रही है कि नेतन्याहू शांति प्रक्रिया को धीमा कर रहे हैं।”
गाज़ा युद्धविराम: उपलब्धि भी, चुनौती भी
अक्टूबर में हुआ गाज़ा युद्धविराम ट्रंप की वापसी के बाद उनकी सरकार की बड़ी कूटनीतिक उपलब्धियों में गिना जा रहा है।
पहले चरण के तहत—
हमास ने ज़िंदा बंधकों को रिहा किया
मृत बंधकों के शव लौटाए
इज़राइल ने सीमित सैन्य गतिविधियाँ रोकीं
दूसरे चरण में प्रस्ताव है कि—
इज़राइली सेना गाज़ा से पीछे हटे
हमास हथियार डाले
अंतरिम प्रशासन शासन संभाले
लेकिन दोनों पक्ष एक-दूसरे पर युद्धविराम उल्लंघन के आरोप लगा रहे हैं।
ईरान की तीखी प्रतिक्रिया
ईरान ने अपने खिलाफ चल रही रिपोर्ट्स को “मनोवैज्ञानिक युद्ध” करार देते हुए चेतावनी दी है कि यदि उस पर दोबारा हमला हुआ, तो इसके “कठोर और दूरगामी परिणाम” होंगे।
निष्कर्ष:-
यह बयान केवल तारीफ़ नहीं, बल्कि आने वाले महीनों में पश्चिम एशिया की राजनीति किस दिशा में जाएगी — उसका संकेत भी माना जा रहा है।
