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Israel Lebanon framework agreement faces: हिज़्बुल्लाह ने किया खारिज, ईरान-अमेरिका तनाव फिर बढ़ा, क्या मध्य पूर्व में शांति का सपना टूटने वाला है?

 27 जून 2026 | विस्तृत विश्लेषण |✍🏻 Z S Razzaqi | अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार   

वॉशिंगटन में हुए समझौते ने खड़ी कर दी नई सियासी और सैन्य चुनौती

मध्य पूर्व में लंबे समय से जारी संघर्ष के बीच इज़रायल और लेबनान के बीच अमेरिका की मध्यस्थता में एक नया फ्रेमवर्क समझौता सामने आया है। इसे क्षेत्र में शांति स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया जा रहा था, लेकिन समझौते पर हस्ताक्षर होने के कुछ ही घंटों बाद हालात फिर तनावपूर्ण होते दिखाई देने लगे हैं।

एक तरफ लेबनान के शक्तिशाली संगठन हिज़्बुल्लाह ने इस समझौते को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया है, वहीं दूसरी ओर ईरान और अमेरिका के बीच नए आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए हैं। इसके साथ ही दक्षिणी लेबनान और गाजा में सैन्य गतिविधियां भी जारी हैं, जिससे युद्धविराम की स्थिरता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।


हिज़्बुल्लाह प्रमुख नईम कासिम का तीखा हमला

Naim Qassem ने समझौते को "अपमानजनक", "शर्मनाक" और "राष्ट्रीय संप्रभुता के समर्पण" के बराबर बताया।

उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि हिज़्बुल्लाह इस समझौते को मान्यता नहीं देता और इसे ईरान-अमेरिका समझौता ज्ञापन (MoU) से प्रतिस्थापित किया जाना चाहिए।

कासिम ने कहा कि इज़रायली सेना की वापसी को हिज़्बुल्लाह के निरस्त्रीकरण से जोड़ना "लाल रेखा पार करने" जैसा है। उन्होंने चेतावनी दी कि संगठन अपना सशस्त्र प्रतिरोध जारी रखेगा और किसी भी दबाव के आगे नहीं झुकेगा।


समझौते में क्या है सबसे बड़ा विवाद?

समझौते के अनुसार लेबनानी सेना को पूरे देश में सुरक्षा और प्रशासनिक नियंत्रण मजबूत करना होगा तथा गैर-राज्य सशस्त्र समूहों का निरस्त्रीकरण सुनिश्चित करना होगा।

विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रावधान का सीधा संबंध हिज़्बुल्लाह से है।

सबसे विवादास्पद पहलू यह है कि इज़रायल को तत्काल दक्षिणी लेबनान से हटने के लिए बाध्य नहीं किया गया है। समझौते में केवल "क्रमिक पुनःतैनाती" का उल्लेख है, जबकि कुछ क्षेत्रों में इज़रायली सुरक्षा उपस्थिति जारी रह सकती है।

यही कारण है कि लेबनान के भीतर इस समझौते को लेकर मतभेद उभर आए हैं।


इज़रायल ने सैनिकों को दिया ‘लंबे समय तक रहने’ का आदेश

Israel Katz ने घोषणा की है कि इज़रायली सेना को दक्षिणी लेबनान के सुरक्षा क्षेत्र में लंबे समय तक रहने की तैयारी करने के निर्देश दिए गए हैं।

उनका कहना है कि जब तक हिज़्बुल्लाह का पूर्ण निरस्त्रीकरण नहीं हो जाता, तब तक इज़रायल पीछे नहीं हटेगा।

इस बयान ने समझौते के भविष्य को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं क्योंकि लेबनान में इसे इज़रायली प्रभाव बनाए रखने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।


ईरान ने अमेरिका पर लगाया समझौता तोड़ने का आरोप

Iran ने आरोप लगाया है कि अमेरिका ने उसके मिसाइल, ड्रोन और रडार प्रतिष्ठानों पर हवाई हमले करके दोनों देशों के बीच हुए समझौता ज्ञापन का उल्लंघन किया है।

ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) का दावा है कि उसने जवाबी कार्रवाई में क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है।

तेहरान का कहना है कि अमेरिका ने युद्धविराम और होरमुज़ जलडमरूमध्य से संबंधित कई शर्तों का उल्लंघन किया है।


क्या फिर भड़क सकता है क्षेत्रीय संघर्ष?

विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता फिलहाल शांति की बजाय नए विवादों की शुरुआत करता हुआ दिखाई दे रहा है।

पूर्व अमेरिकी राजनयिकों और क्षेत्रीय विशेषज्ञों का कहना है कि यह समझौता इज़रायल के लिए रणनीतिक रूप से लाभकारी हो सकता है, लेकिन लेबनान के लिए दीर्घकालिक राजनीतिक और सुरक्षा संकट पैदा कर सकता है।

यदि लेबनानी सेना को हिज़्बुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ती है, तो देश के भीतर राजनीतिक टकराव और गृह-संघर्ष जैसी स्थिति भी पैदा हो सकती है।


गाजा और वेस्ट बैंक में भी जारी है तनाव

इसी बीच गाजा पट्टी और पश्चिमी तट में भी हिंसा थमती दिखाई नहीं दे रही।

गाजा में कई इलाकों पर ड्रोन हमलों और हवाई हमलों की खबरें सामने आई हैं, जबकि पश्चिमी तट में इज़रायली सेना और बस्तियों से जुड़े समूहों की गतिविधियां बढ़ी हुई बताई जा रही हैं।

मानवीय संगठनों का कहना है कि क्षेत्र में आम नागरिक लगातार असुरक्षा और विस्थापन का सामना कर रहे हैं।


यूरोप ने किया स्वागत, लेकिन चुनौतियां बरकरार

Ursula von der Leyen सहित कई यूरोपीय नेताओं ने इस समझौते का स्वागत किया है और इसे तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है।

हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि स्थायी शांति तभी संभव होगी जब लेबनान की संप्रभुता सुरक्षित रहे, सभी पक्ष समझौते का पालन करें और क्षेत्र में मानवीय सहायता निर्बाध रूप से पहुंचती रहे।


निष्कर्ष:-

इज़रायल और लेबनान के बीच हुआ नया फ्रेमवर्क समझौता मध्य पूर्व की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। लेकिन हिज़्बुल्लाह का विरोध, इज़रायल की सैन्य उपस्थिति, ईरान-अमेरिका तनाव और गाजा में जारी हिंसा यह संकेत दे रही है कि क्षेत्र में शांति की राह अभी भी बेहद कठिन है।

फिलहाल दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह समझौता वास्तव में स्थायी शांति की नींव बनेगा या फिर मध्य पूर्व एक बार फिर बड़े संघर्ष की ओर बढ़ेगा।

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