नई दिल्ली | 5 अप्रैल 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | वरिष्ठ पत्रकार
प्रस्तावना: डेटा सार्वजनिक, लेकिन उपयोग के लायक नहीं
पश्चिम बंगाल में 2025–26 के दौरान भारतीय चुनाव आयोग द्वारा कराई गई Special Intensive Revision (SIR) को अभूतपूर्व बताया गया। लेकिन जब अंतिम मतदाता सूची सामने आई, तो यह सिर्फ आंकड़ों का सेट नहीं था—यह एक ऐसी “डिजिटल दीवार” थी, जिसे पार करना लगभग असंभव था।
मतदाता सूचियों को searchable या machine-readable फॉर्मेट में देने के बजाय स्कैन किए गए PDF इमेज के रूप में जारी किया गया। इसका सीधा अर्थ है:
ऐसे समय में जब चुनावी माहौल बेहद संवेदनशील हो, यह सवाल स्वाभाविक है—जब डेटा को उपयोगहीन बना दिया जाए, तो इसका फायदा किसे मिलता है?
राजनीतिक संदर्भ: आरोप, विवाद और संवैधानिक टकराव
इस SIR प्रक्रिया को लेकर भारी राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया।
- पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री Mamata Banerjee ने आरोप लगाया कि बड़ी संख्या में उन समुदायों के मतदाताओं को निशाना बनाया गया, जो भाजपा के समर्थन में नहीं माने जाते।
- 13 मार्च 2026 को मुख्य चुनाव आयुक्त Gyanesh Kumar के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश किया गया।
- उनके चयन को लेकर पहले ही विवाद था, क्योंकि नई व्यवस्था में Supreme Court of India के मुख्य न्यायाधीश की जगह एक कैबिनेट मंत्री को शामिल कर दिया गया, जिससे चयन समिति में सरकार का बहुमत हो गया।
इस पृष्ठभूमि में डेटा का फॉर्मेट भी राजनीतिक सवाल बन गया।
‘Logical Discrepancy’: चुनावी इतिहास का नया और विवादित शब्द
2026 के SIR में पहली बार एक नई श्रेणी सामने आई—Logical Discrepancy।
यह क्या है?
मतदाताओं को तीन श्रेणियों में बांटा गया:
- Mapped
- Unmapped
- Logical Discrepancy (नई श्रेणी)
क्यों विवाद?
कागज़ पर यह श्रेणी नाम, उम्र या रिश्तों में असंगति के लिए थी। लेकिन हकीकत में:
- “Mohammed” vs “Muhammad” जैसे मामूली अंतर
- “Mondal” vs “Mandal” जैसी स्पेलिंग भिन्नता
- पुराने रिकॉर्ड की खराब स्कैनिंग
इन सबने सॉफ्टवेयर को भ्रमित कर दिया।
मतलब—इंसान के लिए स्पष्ट पहचान, मशीन के लिए ‘संदिग्ध’ बन गई।
1.36 करोड़ मतदाता: न हटाए गए, न वोट देने की अनुमति
इस प्रक्रिया में लगभग 1.36 करोड़ मतदाताओं को Logical Discrepancy में डाल दिया गया।
इनकी स्थिति:
- नाम सूची से हटाए नहीं गए
- लेकिन वोट देने की अनुमति भी नहीं
- स्टेटस: “Under Adjudication”
सबसे गंभीर बात—कोई स्पष्ट समयसीमा नहीं, जबकि चुनाव घोषित कर दिए गए।
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप
मामला इतना गंभीर हुआ कि Supreme Court of India को हस्तक्षेप करना पड़ा।
- 20 फरवरी को कोर्ट ने Article 142 के तहत न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति की
- झारखंड और ओडिशा से भी अधिकारी बुलाए गए
फिर भी:
- 32 लाख मामलों में से
- लगभग 40% (करीब 13 लाख नाम)
- पहली सप्लीमेंट्री सूची में शामिल ही नहीं हुए
डेटा तक पहुंच: शुरुआत ही मुश्किल
Alt News ने जब कोलकाता की दो सीटों—भवानीपुर और बालीगंज—के डेटा का विश्लेषण करना चाहा, तो तीन स्तर की बाधाएं सामने आईं:
1. एक्सेस बैरियर (Captcha दीवार)
- एक बार में सिर्फ 10 एरिया डाउनलोड
- हर बार CAPTCHA
- ऑटोमेशन असंभव
2. फॉर्मेट बैरियर
- स्कैन PDF, जो डिजिटल फाइल से 228 गुना भारी
- लेकिन कोई usable डेटा नहीं
3. वाटरमार्क बैरियर
- हर 10 में से 1 एंट्री पर “UNDER ADJUDICATION”
- कई बार नाम ही पढ़ना मुश्किल
यह तीन-स्तरीय संरचना स्पष्ट संकेत देती है—
डेटा सार्वजनिक है, लेकिन practically inaccessible।
चौंकाने वाला डेटा: 39,604 मतदाता “लिम्बो” में
Alt News ने 558 PDF फाइलों को डिजिटाइज़ किया और पाया:
- कुल 39,604 मतदाता (11.2%) “Under Adjudication”
- यह सिर्फ दो सीटों का डेटा है
धार्मिक आधार पर असमानता: क्या यह पैटर्न है?
विश्लेषण के अनुसार:
- मुस्लिम मतदाता: 39.5%
- लेकिन adjudication में हिस्सा: 66.5%
सीटवार स्थिति:
भवानीपुर:
- मुस्लिम वोटर: 21.9%
- Adjudication: 51.8%
बालीगंज:
- मुस्लिम वोटर: 54.3%
- Adjudication: ~75%
👉 कुल मिलाकर:
एक मुस्लिम मतदाता के ‘Under Adjudication’ होने की संभावना, हिंदू मतदाता से 3.1 गुना ज्यादा पाई गई।
Alt News का बड़ा कदम: डेटा को वापस जनता तक लाना
Alt News ने सिर्फ विश्लेषण ही नहीं किया, बल्कि पूरा डेटा सार्वजनिक कर दिया।
डेटा में शामिल:
- वोटर ID
- सीरियल नंबर
- स्टेटस
- डेमोग्राफिक वर्गीकरण
हालांकि गोपनीयता के कारण धर्म की जानकारी सीधे प्रकाशित नहीं की गई।
असली मुद्दा: तकनीक नहीं, निर्णय
भारत जैसे देश में:
- Aadhaar
- UPI
- DigiLocker
जैसे सिस्टम बड़े स्तर पर काम करते हैं।
तो फिर:
CSV या searchable डेटा देना क्यों संभव नहीं?
जवाब साफ है—
यह तकनीकी सीमा नहीं, बल्कि नीतिगत निर्णय है।
लागत बनाम पारदर्शिता: बड़ा अंतर
Alt News ने:
- 3.5 लाख रिकॉर्ड डिजिटाइज़ किए
- कुल खर्च: ~$141 (₹11,800)
जबकि चुनाव आयोग:
- ERONET सिस्टम पर करोड़ों खर्च
- लेकिन पारदर्शिता सीमित
चुनाव आयोग का पक्ष और उसकी सीमाएं
चुनाव आयोग का तर्क:
- डेटा misuse हो सकता है
- मशीन-readable फाइल editable होती है
लेकिन विशेषज्ञों का कहना:
- डाउनलोड की गई फाइल बदलने से original डेटा प्रभावित नहीं होता
👉 असली सवाल:
क्या चिंता डेटा की सुरक्षा है या उसके उपयोग पर नियंत्रण?
निष्कर्ष:-
लोकतंत्र में डेटा की असली परिभाषा
यह मामला सिर्फ पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं है। यह एक बड़ा सिद्धांत स्थापित करता है:
“लोकतंत्र में डेटा सिर्फ सार्वजनिक होना पर्याप्त नहीं है,
उसे उपयोग के योग्य भी होना चाहिए।”
जब डेटा:
- खोजा न जा सके
- विश्लेषण न हो सके
- सत्यापन न किया जा सके
तो वह पारदर्शिता नहीं, बल्कि नियंत्रित सूचना (controlled transparency) बन जाता है।

