नई दिल्ली, 25 मार्च 2026:✍🏻 Z S Razzaqi | वरिष्ठ पत्रकार
1. न्यायपालिका पर कथित दबाव: जजों के ट्रांसफर और कॉलेजियम विवाद
विपक्ष का आरोप है कि भाजपा सरकार न्यायपालिका को नियंत्रित करने के लिए हाई कोर्ट जजों के ट्रांसफर का हथियार इस्तेमाल कर रही है। हालिया उदाहरण: अक्टूबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस अतुल श्रीधरन को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट से छत्तीसगढ़ ट्रांसफर करने की सिफारिश की थी। सरकार ने इसे “रिव्यू” मांगा और कॉलेजियम ने फैसला बदला, उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट भेज दिया।
जनवरी 2026 में संभल हिंसा केस में FIR दर्ज करने वाले जज को आगरा से संभल ट्रांसफर करने के तुरंत बाद ट्रांसफर कर दिया गया, जिसे कांग्रेस ने “न्यायपालिका पर हमला” बताया। फरवरी 2026 में सरकार ने लोकसभा में कहा कि सभी ट्रांसफर “जनहित” में हैं, लेकिन विपक्ष इसे “कार्यपालिका हस्तक्षेप” मानता है।
तथ्य: सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 2025 में 14 जजों के ट्रांसफर की सिफारिश की थी। आलोचक कहते हैं कि सरकार रिव्यू के नाम पर “अनचाहे जजों” को साइडलाइन कर रही है, जबकि भाजपा इसे “प्रशासनिक सुधार” बताती है।
2. चुनाव आयोग: “वोट चोरी” के आरोप और नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव
2023 के कानून ने मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति पैनल में चीफ जस्टिस की जगह यूनियन मिनिस्टर को शामिल कर दिया, जिससे सरकार को बहुमत मिल गया।
2025 में राहुल गांधी ने हरियाणा, महाराष्ट्र और कर्नाटक चुनावों में “वोट चोरी” का आरोप लगाया—25 लाख वोटों की चोरी, डुप्लीकेट वोटर, फर्जी पते। चुनाव आयोग ने इन आरोपों को “झूठा और भ्रामक” बताया, लेकिन विपक्ष ने SIR (Special Intensive Revision) को “वोट चोरी का हथियार” कहा।
आंकड़े: 2025 के चुनावी विवाद में विपक्ष ने ईसीआई पर “बीजेपी का एक्सटेंशन” होने का आरोप लगाया। भाजपा ने इसे “कांग्रेस की संस्थाओं को बदनाम करने की साजिश” करार दिया।
3. जांच एजेंसियां (ED, CBI, IT): विपक्ष पर 95% कार्रवाई
ED और CBI पर सबसे गंभीर आरोप है। 2014 से पहले UPA काल में ED ने 26 राजनेताओं की जांच की, जिनमें 53% विपक्षी थे। मोदी सरकार में 2024 तक 121 राजनेताओं की जांच में 95% विपक्षी थे। CBI में भी यही पैटर्न—60% से बढ़कर 95%।
2025-26 में बंगाल, दिल्ली, झारखंड में ED रेड्स ने I-PAC (TMC की कंसल्टेंसी) और AAP नेताओं को टारगेट किया। विपक्ष इसे “चुनाव से पहले राजनीतिक vendetta” कहता है।
सरकार का जवाब: ये भ्रष्टाचार विरोधी कार्रवाई हैं। लेकिन आंकड़े दिखाते हैं कि भाजपा नेताओं पर बहुत कम कार्रवाई हुई।
4. मुख्यधारा मीडिया: “गोदी मीडिया” का उदय
रवीश कुमार द्वारा गढ़ा गया शब्द “गोदी मीडिया” अब आम हो चुका है। Zee News, Times Now, Republic, Aaj Tak आदि को भाजपा का “माउथपीस” कहा जाता है। Reporters Sans Frontières (2024) ने कहा कि ये आउटलेट्स “पॉपुलिज्म और प्रो-BJP प्रोपगैंडा” फैलाते हैं।अमन चोपड़ा जैसे एंकर दिनरात नफरत फैलते हैं ,नफरती खबरों की डिबेट करवाते ,नफरती मुद्दे उछालते हैं
आलोचना: सरकार विज्ञापन, रेगुलेटरी दबाव और इवेंट इन्वाइटेशन के जरिए मीडिया को “लाइन” में रखती है।
5. सोशल मीडिया पर नई सेंसरशिप: आलोचक पत्रकारों और इन्फ्लुएंसर्स के अकाउंट सस्पेंड
2025-26 में सबसे नया ट्रेंड: IT Act Section 69A के तहत X (Twitter), Instagram पर आलोचक अकाउंट्स को “Withheld in India” कर दिया जा रहा है। मार्च 2026 में @Nehr_who, @DrNimoYadav, @ActivistSandeep, @mrjethwani_ जैसे हैंडल्स, पैरोडी अकाउंट्स और डॉक्टर्स-आरजे के अकाउंट्स ब्लॉक हुए।
The Wire और Free Speech Collective की रिपोर्ट: 2025 में 14,875 फ्री स्पीच उल्लंघन, जिसमें 8 पत्रकारों की हत्या और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स पर हमले शामिल। सरकार ने 2024-25 में X को 1,400+ पोस्ट/अकाउंट हटाने के आदेश दिए।
सरकारी पक्ष: ये “राष्ट्रीय सुरक्षा” और “फेक न्यूज” रोकने के लिए हैं। लेकिन आलोचक इसे “आलोचना को चुप कराने” का तरीका बताते हैं।
विश्लेषण: लोकतंत्र को खतरा या सामान्य प्रशासनिक सुधार?
- विपक्ष का तर्क: ये “संस्थागत कब्जा” (institutional capture) है। ED/CBI, ECI, मीडिया और सोशल मीडिया—सभी को “एक तरफा” इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे 2024 लोकसभा में भाजपा को बहुमत न मिलने के बावजूद सत्ता मजबूत बनी रही।
- भाजपा का जवाब: कांग्रेस “फेक नैरेटिव” चला रही है। संस्थाएं मजबूत हैं, भ्रष्टाचार पर कार्रवाई हो रही है। 2025 के बिल (मिनिस्टर डिसक्वालिफिकेशन) को नैतिकता सुधार बताया गया।
- निष्पक्ष नजरिया: आंकड़े (95% ED कार्रवाई विपक्ष पर) और हालिया घटनाएं (जज ट्रांसफर रिव्यू, अकाउंट ब्लॉक) चिंता पैदा करती हैं। लेकिन 2024 चुनाव में भाजपा को गठबंधन सरकार बनानी पड़ी, जो लोकतंत्र की जीत है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने Fact Check Unit को असंवैधानिक करार दिया—यह भी चेक एंड बैलेंस का उदाहरण है।
भारतीय लोकतंत्र मजबूत है, लेकिन संस्थागत स्वतंत्रता पर सवाल उठ रहे हैं। जनता, मीडिया और न्यायपालिका को सतर्क रहना होगा। 2026 के विधानसभा चुनाव इसकी परीक्षा लेंगे। सच्ची लोकतंत्र तब मजबूत होगा जब सभी पक्ष तथ्यों पर बहस करें, न कि आरोप-प्रत्यारोप पर।
स्रोत: BBC, The Hindu, The Wire, Wikipedia, Scroll.in, Indian Express, Reporters Sans Frontières, Free Speech Collective आदि (2024-2026 की रिपोर्ट्स)।
यह रिपोर्ट तथ्यों पर आधारित है। पाठक स्वयं निर्णय लें। लोकतंत्र की रक्षा हर नागरिक की जिम्मेदारी है।
