23 मार्च 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार
वैश्विक स्तर पर बढ़ते ईरान-इज़राइल-अमेरिका संघर्ष के बीच श्रीलंका ने एक ऐसा फैसला लिया है जिसने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में नई बहस छेड़ दी है। राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके की सरकार ने अमेरिका के उस संवेदनशील अनुरोध को ठुकरा दिया, जिसमें दो युद्धक विमानों को श्रीलंका के एक रणनीतिक हवाई अड्डे पर उतारने की अनुमति मांगी गई थी।
यह निर्णय केवल एक प्रशासनिक इनकार नहीं, बल्कि एक स्पष्ट भू-राजनीतिक संदेश है—श्रीलंका किसी भी वैश्विक सैन्य ध्रुवीकरण का हिस्सा नहीं बनेगा।
संसद में बड़ा खुलासा: अमेरिका का सैन्य अनुरोध और श्रीलंका का जवाब
राष्ट्रपति दिसानायके ने संसद में जानकारी दी कि अमेरिका ने 26 फरवरी को औपचारिक रूप से अनुरोध किया था कि उसके दो सशस्त्र युद्धक विमान 4 से 8 मार्च के बीच मत्ताला राजपक्षे अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा पर उतर सकें।
यह वही समय था जब विश्व राजनीति तेजी से बदल रही थी—सिर्फ दो दिन बाद अमेरिका और इज़राइल ने ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू कर दिया।
राष्ट्रपति के अनुसार:
- ये विमान जिबूती स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डे से आने वाले थे
- इनमें 8 एंटी-शिप मिसाइलों की तैनाती थी
- मिशन स्पष्ट रूप से सामरिक और युद्ध-संबंधी था
उन्होंने संसद में दो टूक कहा:
“हमने अपनी तटस्थता बनाए रखने के लिए इस अनुरोध को अस्वीकार कर दिया।”
एक दिन, दो महाशक्तियां—और श्रीलंका का संतुलित फैसला
घटना का सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि उसी दिन श्रीलंका को ईरान की ओर से भी प्रस्ताव मिला।
ईरान ने अपने तीन नौसैनिक जहाजों को “गुडविल विजिट” के लिए श्रीलंका भेजने की अनुमति मांगी थी।
राष्ट्रपति दिसानायके ने इस स्थिति को बेहद स्पष्ट शब्दों में समझाया:
“अगर हम ईरान को अनुमति देते, तो हमें अमेरिका को भी देनी पड़ती—इसलिए हमने दोनों को ‘ना’ कहा।”
यह निर्णय श्रीलंका की विदेश नीति के उस सिद्धांत को दर्शाता है, जिसमें तटस्थता और रणनीतिक संतुलन सर्वोच्च प्राथमिकता हैं।
वैश्विक पृष्ठभूमि: युद्ध, ऊर्जा संकट और बढ़ती अनिश्चितता
मध्य पूर्व में चल रहा यह संघर्ष अब क्षेत्रीय सीमाओं से निकलकर वैश्विक असर डाल रहा है।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य—जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है—इस युद्ध का केंद्र बन चुका है।
ईरान की सैन्य गतिविधियों के कारण:
- वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित हुई
- ऊर्जा कीमतों में तेज उछाल आया
- कई देशों की अर्थव्यवस्थाएं दबाव में आ गईं
दुनिया भर के देश इस संघर्ष से दूरी बनाए रखते हुए केवल तनाव कम करने की अपील कर रहे हैं।
अमेरिका का दबाव और नाटो में दरार
इस बीच, डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सहयोगी देशों पर युद्ध में सक्रिय समर्थन देने का दबाव बढ़ा दिया है।
उन्होंने नाटो देशों की आलोचना करते हुए उन्हें “कमज़ोर” तक करार दिया, क्योंकि वे सीधे सैन्य सहयोग से बच रहे हैं।
यह घटनाक्रम इस बात का संकेत है कि पश्चिमी गठबंधन के भीतर भी इस युद्ध को लेकर मतभेद गहराते जा रहे हैं।
स्विट्जरलैंड का उदाहरण: तटस्थता की वैश्विक लहर
श्रीलंका अकेला देश नहीं है जिसने तटस्थता का रास्ता चुना।
स्विट्जरलैंड ने भी घोषणा की है कि वह अमेरिका को हथियारों का निर्यात रोक देगा, यदि उनका उपयोग ईरान के खिलाफ युद्ध में किया जाना है।
यह कदम दिखाता है कि तटस्थता अब केवल नीति नहीं, बल्कि एक वैश्विक रणनीतिक विकल्प बनती जा रही है।
मानवीय जिम्मेदारी: युद्ध के बीच राहत कार्य
जहां एक ओर श्रीलंका ने सैन्य अनुरोधों को ठुकराया, वहीं उसने मानवीय कर्तव्यों को प्राथमिकता दी।
- श्रीलंकाई नौसेना ने IRIS Dena पर हुए हमले के बाद 32 ईरानी नाविकों को बचाया
- इसके बाद IRIS Bushehr से 200 से अधिक क्रू सदस्यों को सुरक्षित निकाला गया
यह दिखाता है कि श्रीलंका युद्ध से दूरी रखते हुए मानवता के साथ खड़ा है।
विश्लेषण: छोटे देश का बड़ा कूटनीतिक दांव
श्रीलंका का यह निर्णय कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है:
1. रणनीतिक स्वतंत्रता
छोटे देश भी वैश्विक दबावों के बावजूद अपनी नीति तय कर सकते हैं।
2. संतुलन की राजनीति
अमेरिका और ईरान—दोनों को एक साथ ‘ना’ कहना एक साहसिक और संतुलित निर्णय है।
3. क्षेत्रीय स्थिरता में योगदान
हिंद महासागर क्षेत्र में तनाव को कम रखने के लिए यह कदम अहम माना जा रहा है।
4. भविष्य की कूटनीति का संकेत
यह घटना बताती है कि आने वाले समय में अधिक देश “तटस्थ लेकिन सक्रिय” नीति अपनाएंगे।
निष्कर्ष:-
तटस्थता ही नई शक्ति?
जब दुनिया महाशक्तियों के टकराव की ओर बढ़ रही है, ऐसे में श्रीलंका जैसे देशों का यह रुख अंतरराष्ट्रीय स्थिरता और शांति के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।
