नई दिल्ली | 25 फरवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi |वरिष्ठ पत्रकार
यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पूर्ववर्ती पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका की संरचना, स्वतंत्र न्यायपालिका की अवधारणा और न्याय तक पहुंच जैसे पहलुओं पर तो विस्तार से चर्चा थी, लेकिन भ्रष्टाचार जैसे संवेदनशील मुद्दों का उल्लेख नहीं था। हालांकि, पुरानी किताब में “न्याय में देरी, न्याय से वंचना के समान” (Justice delayed is justice denied) जैसी उक्ति के माध्यम से मामलों के निस्तारण में लगने वाले समय पर चिंता व्यक्त की गई थी।
लंबित मामलों का परिदृश्य: न्याय प्रणाली पर बढ़ता दबाव
नई पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका पर बढ़ते दबाव को समझाने के लिए लंबित मामलों के अनुमानित आंकड़े भी दिए गए हैं। पुस्तक के अनुसार:
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सुप्रीम कोर्ट में लगभग 81,000 मामले लंबित
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हाई कोर्ट्स में करीब 62,40,000 मामले लंबित
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जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों में लगभग 4,70,00,000 मामले लंबित
ये आंकड़े न केवल न्यायिक प्रणाली की जटिलताओं को उजागर करते हैं, बल्कि न्याय तक समयबद्ध पहुंच के प्रश्न को भी केंद्र में लाते हैं। अध्याय में बताया गया है कि न्यायाधीशों की अपर्याप्त संख्या, जटिल कानूनी प्रक्रियाएं और बुनियादी ढांचे की कमी इस बोझ के प्रमुख कारणों में शामिल हैं।
भ्रष्टाचार पर अध्याय: जवाबदेही और सुधार के तंत्र
किताब का नया खंड न्यायपालिका में जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए मौजूद तंत्रों पर भी प्रकाश डालता है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि न्यायाधीश एक आचार संहिता से बंधे होते हैं, जो उनके न्यायालय के भीतर और बाहर के आचरण को नियंत्रित करती है।
पुस्तक में Centralised Public Grievance Redress and Monitoring System (CPGRAMS) के माध्यम से शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि 2017 से 2021 के बीच 1,600 से अधिक शिकायतें प्राप्त हुईं। साथ ही, गंभीर आरोपों की स्थिति में संसद द्वारा महाभियोग (Impeachment) की संवैधानिक प्रक्रिया का भी विवरण दिया गया है, जिसमें निष्पक्ष जांच और संबंधित न्यायाधीश को अपना पक्ष रखने का अवसर शामिल होता है।
अध्याय यह भी रेखांकित करता है कि भ्रष्टाचार के अनुभव न्याय तक पहुंच, विशेषकर गरीब और वंचित वर्गों के लिए, अधिक कठिन बना सकते हैं। इसी संदर्भ में राज्य और केंद्र स्तर पर पारदर्शिता बढ़ाने, तकनीक के उपयोग और संस्थागत सुधारों के प्रयासों का उल्लेख किया गया है।
पूर्व मुख्य न्यायाधीश का दृष्टिकोण: पारदर्शिता ही विश्वास की कुंजी
पुस्तक में जुलाई 2025 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश द्वारा व्यक्त विचारों का उद्धरण भी शामिल है, जिसमें न्यायपालिका के भीतर सामने आए कुछ मामलों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा गया कि ऐसे घटनाक्रम जन-विश्वास को प्रभावित कर सकते हैं। उद्धरण में यह भी रेखांकित किया गया है कि विश्वास की पुनर्स्थापना का मार्ग “त्वरित, निर्णायक और पारदर्शी कार्रवाई” से होकर गुजरता है तथा पारदर्शिता और जवाबदेही लोकतांत्रिक मूल्यों की आधारशिला हैं।
छात्रों के लिए विमर्श: संवैधानिक सिद्धांतों की समझ पर जोर
नई किताब में विद्यार्थियों को समसामयिक संवैधानिक मुद्दों पर चर्चा के लिए प्रेरित किया गया है। उदाहरणस्वरूप:
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इलेक्टोरल बॉन्ड्स: राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता बनाम गोपनीयता
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सूचना प्रौद्योगिकी कानून: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और डिजिटल अधिकार
इन उदाहरणों के माध्यम से छात्रों से यह समझने को कहा गया है कि न्यायपालिका ने किन संवैधानिक सिद्धांतों के आधार पर हस्तक्षेप किया और ऐसे निर्णय लोकतंत्र के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं।
नई पाठ्यपुस्तकों की पृष्ठभूमि: NEP 2020 और NCF के अनुरूप बदलाव
NCERT ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF) के अनुरूप कक्षा 1 से 8 तक की नई पाठ्यपुस्तकों का विकास किया है। सामाजिक विज्ञान की कक्षा 8 की पुस्तक का पहला भाग पूर्व में जारी किया जा चुका था। कोविड-19 महामारी के बाद पुराने पाठ्यक्रमों को “रैशनलाइज” कर सामग्री का भार कम किया गया था, जबकि नई पुस्तकों में विषय-वस्तु को अधिक विश्लेषणात्मक और समकालीन संदर्भों के अनुरूप ढाला गया है।
शिक्षा जगत में प्रतिक्रिया: यथार्थपरकता बनाम संवेदनशीलता
शिक्षा विशेषज्ञों के एक वर्ग का मानना है कि न्यायपालिका जैसी संवैधानिक संस्था की चुनौतियों पर तथ्यात्मक और संतुलित चर्चा विद्यार्थियों में लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति समझ और जिम्मेदारी विकसित करती है। वहीं, कुछ शिक्षाविद इस विषय की संवेदनशीलता को देखते हुए अध्यापन के दौरान संतुलित दृष्टिकोण अपनाने पर बल देते हैं।
निष्कर्ष:-
आलोचनात्मक सोच और संस्थागत समझ की ओर कदम
कुल मिलाकर, NCERT की नई कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान पुस्तक भारतीय न्यायपालिका के समक्ष मौजूद चुनौतियों, सुधार प्रयासों और संवैधानिक विमर्श को अधिक स्पष्टता से सामने लाती है। यह परिवर्तन विद्यार्थियों में आलोचनात्मक सोच, नागरिक चेतना और संस्थागत समझ को प्रोत्साहित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
