27 जनवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | वरिष्ठ पत्रकार
“University Grants Commission (Promotion of Equity in Higher Education Institutions) Regulations, 2026”।
इन नियमों का उद्देश्य देशभर के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में व्याप्त जाति, धर्म, लिंग, जन्मस्थान और विकलांगता के आधार पर होने वाले भेदभाव को समाप्त करना बताया गया है। हालांकि, नियमों के लागू होते ही यह मामला केवल नीतिगत सुधार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सुप्रीम कोर्ट से लेकर सड़कों तक एक बड़े सामाजिक और वैचारिक विवाद का रूप ले चुका है।
पृष्ठभूमि: एक लंबा और संवेदनशील संघर्ष
UGC के ये नए नियम अचानक नहीं आए। इनकी जड़ें वर्ष 2019 में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक जनहित याचिका (PIL) में हैं। यह याचिका दायर की थी —
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राधिका वेमुला, हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के शोध छात्र रोहित वेमुला की मां
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अबेदा सलीम तडवी, मुंबई के एक मेडिकल कॉलेज की छात्रा पायल तडवी की मां
रोहित वेमुला और पायल तडवी — दोनों की कथित तौर पर संस्थागत और जातिगत भेदभाव के चलते आत्महत्या हो गई थी। इन मामलों ने देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था में मौजूद गहरी सामाजिक असमानताओं को उजागर किया।
याचिका में मांग की गई थी कि कॉलेज परिसरों में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए एक सशक्त, स्पष्ट और बाध्यकारी तंत्र विकसित किया जाए।
आम जनता की नज़र से: बराबरी की कोशिश और उसका विरोध
भारत की सामाजिक संरचना को यदि ज़मीनी स्तर पर देखा जाए, तो यह सच्चाई नज़रअंदाज़ नहीं की जा सकती कि देश की लगभग 95 प्रतिशत आबादी — जिसमें अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य वंचित समुदाय शामिल हैं — लंबे समय से शिक्षा, अवसर और गरिमा के स्तर पर असमानता का सामना करती आई है। ऐसे में UGC के 2026 इक्विटी रेगुलेशंस को इन वर्गों द्वारा सिर्फ एक कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि बराबरी का एक औज़ार माना जा रहा है।
इन नियमों की मूल भावना यही है कि उच्च शिक्षा संस्थान किसी भी व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर कमतर न समझें और संस्थागत ढांचे को इस हद तक बाध्य किया जाए कि वह सम्मानजनक और समान व्यवहार देने के लिए मजबूर हो। आम छात्र और अभिभावक इसे एक ऐसा कदम मान रहे हैं, जो वर्षों से चले आ रहे अदृश्य भेदभाव को पहली बार औपचारिक रूप से चुनौती देता है।
इसके विपरीत, इस कानून का सबसे मुखर विरोध भारत के कुछ उच्च जाति और ब्राह्मण वर्गों से सामने आ रहा है। विरोध के पीछे तर्क भले ही “समानता के नाम पर भेदभाव” का दिया जा रहा हो, लेकिन सामाजिक विश्लेषकों और आम लोगों के एक बड़े वर्ग का मानना है कि इस असंतोष की जड़ें कहीं न कहीं उस मानसिकता में छिपी हैं, जिसमें खुद को जन्म के आधार पर स्वाभाविक रूप से श्रेष्ठ मान लिया गया है।
आम जनता के बीच यह सवाल लगातार उठ रहा है कि
अगर कोई कानून सिर्फ इतना कहता है कि हर छात्र, हर शिक्षक और हर कर्मचारी को समान गरिमा और अवसर मिले,
तो उससे असहजता क्यों हो रही है?
ग्रामीण और कस्बाई भारत में रहने वाले लोगों के लिए यह विवाद किसी कानूनी बहस से ज़्यादा जीवन के अनुभवों से जुड़ा मुद्दा है। वे मानते हैं कि जब तक संस्थान अपने भीतर मौजूद शक्ति-संतुलन को नहीं पहचानेंगे, तब तक समानता सिर्फ काग़ज़ों तक सीमित रहेगी। इसी कारण, UGC के ये नियम देश की बड़ी आबादी को सशक्तिकरण की दिशा में एक आवश्यक हस्तक्षेप प्रतीत हो रहे हैं, न कि किसी के अधिकारों पर हमला।
इस पूरे विमर्श में भारत की आम जनता अब केवल दर्शक नहीं रहना चाहती। वह यह समझने लगी है कि सवाल किसी एक जाति के खिलाफ या पक्ष में कानून बनाने का नहीं है, बल्कि सवाल यह है कि
क्या भारत की शिक्षा व्यवस्था सचमुच हर भारतीय को बराबरी से स्वीकार करने के लिए तैयार है या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट की भूमिका
साल 2025 की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को स्पष्ट शब्दों में कहा था कि वह उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव से निपटने के लिए
“एक वास्तव में मजबूत और प्रभावी तंत्र”
बनाने की दिशा में काम करे।
कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं और अन्य हितधारकों को यह स्वतंत्रता भी दी कि वे UGC के मसौदा नियमों पर अपने सुझाव दें। इन सुझावों पर विचार करने के बाद ही जनवरी 2026 में UGC ने अंतिम नियम अधिसूचित किए, जिनसे उसके 2012 के पुराने नियम स्वतः निरस्त हो गए।
नियमों का उद्देश्य: ‘इक्विटी’ की अवधारणा
UGC के अनुसार, इन नियमों का मुख्य उद्देश्य है —
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उच्च शिक्षा संस्थानों में
धर्म, जाति, लिंग, नस्ल, जन्मस्थान और विकलांगता के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को समाप्त करना -
विशेष रूप से निम्न वर्गों की सुरक्षा और समावेशन:
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अनुसूचित जाति (SC)
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अनुसूचित जनजाति (ST)
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अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)
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आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS)
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दिव्यांग व्यक्ति
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UGC का दावा है कि यह नियम किसी वर्ग के विरुद्ध नहीं, बल्कि सभी के लिए समान अवसर और गरिमा सुनिश्चित करने की दिशा में एक सुधारात्मक कदम है।
दायरा (Scope): किस पर लागू होंगे ये नियम?
UGC के 2026 रेगुलेशंस का दायरा काफी व्यापक है।
ये नियम लागू होंगे —
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देश के सभी उच्च शिक्षा संस्थानों (HEIs) पर
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सभी हितधारकों पर, जिनमें शामिल हैं:
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छात्र
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शिक्षक
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गैर-शैक्षणिक कर्मचारी
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प्रबंधन समिति के सदस्य
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संस्थान प्रमुख (Vice-Chancellor / Director)
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खास बात यह है कि सुरक्षा केवल वर्तमान छात्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि —
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प्रवेश की प्रक्रिया में शामिल अभ्यर्थियों
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ओपन, डिस्टेंस और ऑनलाइन शिक्षा लेने वालों को भी इसके अंतर्गत रखा गया है।
इसके अलावा, नियम पुरुष, महिला और तृतीय लिंग — तीनों को समान रूप से संरक्षण प्रदान करते हैं।
‘भेदभाव’ और ‘जाति-आधारित भेदभाव’ की परिभाषा
जाति-आधारित भेदभाव
नियम 3(1)(c) के अनुसार,
जाति-आधारित भेदभाव का अर्थ है —
अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों के साथ केवल उनकी जाति या जनजाति के आधार पर किया गया भेदभाव।
सामान्य भेदभाव
नियम 3(1)(f) में भेदभाव की परिभाषा और भी व्यापक है। इसके अंतर्गत —
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अनुचित, पक्षपातपूर्ण या असमान व्यवहार
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ऐसा कोई भी कार्य, जो —
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समानता को क्षति पहुँचाए
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मानवीय गरिमा के प्रतिकूल हो
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शिक्षा के अधिकार को सीमित करे
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इसमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष — दोनों तरह का भेदभाव शामिल किया गया है।
उच्च शिक्षा संस्थानों की जिम्मेदारी
नियमों के तहत प्रत्येक HEI पर यह कानूनी जिम्मेदारी डाली गई है कि —
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वह किसी भी प्रकार के भेदभाव को न केवल रोके, बल्कि सक्रिय रूप से समाप्त करे
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संस्थान प्रमुख को यह अधिकार दिया गया है कि वह नियमों के अनुपालन के लिए आवश्यक कदम उठाए
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किसी भी स्तर पर भेदभाव को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा
Equal Opportunity Centres: एक अहम प्रावधान
UGC ने सभी HEIs को Equal Opportunity Centres (EOC) स्थापित करने का निर्देश दिया है।
इन केंद्रों की भूमिका होगी —
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वंचित वर्गों के लिए नीतियों को लागू करना
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काउंसलिंग और सहायता प्रदान करना
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कैंपस में विविधता और समावेशन को बढ़ावा देना
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नागरिक समाज, मीडिया, पुलिस, जिला प्रशासन, NGOs और माता-पिता से समन्वय
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ज़रूरत पड़ने पर जिला और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों के माध्यम से कानूनी सहायता दिलाना
विवाद और विरोध: क्यों उठ रहे सवाल?
इन नियमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल की गई हैं।
मुख्य आपत्तियां यह हैं —
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नियम कथित रूप से ‘जनरल कैटेगरी’ के खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा देते हैं
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जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा को “जाति-निरपेक्ष” (caste-neutral) होना चाहिए
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कुछ वर्गों को आशंका है कि इससे ‘सवर्ण समुदाय’ को निशाना बनाया जाएगा
इसी बीच, देश के विभिन्न हिस्सों में —
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विरोध प्रदर्शन
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समर्थन में आंदोलन
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तीखी सार्वजनिक बहस
भी देखने को मिल रही है।
