30 जनवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | वरिष्ठ पत्रकार
सुनेत्रा पवार से एनसीपी नेताओं की मुलाकात ने उत्तराधिकार की बहस को दी हवा
सुनेत्रा पवार वर्तमान में राज्यसभा सांसद हैं। लेकिन अगर उन्हें उपमुख्यमंत्री बनना है, तो उन्हें विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना अनिवार्य होगा।
पवार परिवार का ही कोई सदस्य मैदान में उतारा जाएगा
बारामती सिर्फ एक सीट नहीं, बल्कि पवार परिवार की राजनीतिक पहचान और ताकत का प्रतीक रही है।
एनसीपी के लिए अजित पवार की कमी:
“नेतृत्व का ऐसा शून्य जो भरना आसान नहीं”
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अजित पवार की मृत्यु से एनसीपी को जो झटका लगा है, वह सिर्फ भावनात्मक नहीं बल्कि रणनीतिक और संगठनात्मक भी है।
अजित पवार को शरद पवार द्वारा वर्षों तक तैयार किया गया था।
उनके पास:
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प्रशासनिक पकड़
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फाइलों पर तेज़ निर्णय
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और पार्टी व नौकरशाही—दोनों में समान प्रभाव था
विशेषज्ञों के अनुसार, मौजूदा नेतृत्व में कोई ऐसा चेहरा नहीं है जो उसी स्तर का भरोसा और नियंत्रण कायम कर सके।
क्या फिर से एक होंगे दोनों एनसीपी गुट?
इस पूरे घटनाक्रम के बीच, एनसीपी (शरदचंद्र पवार गुट) की प्रतिक्रिया भी बेहद अहम मानी जा रही है।
पार्टी के महाराष्ट्र अध्यक्ष शशिकांत शिंदे ने पीटीआई से कहा कि अजित पवार चाहते थे कि
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नगर निकाय और स्थानीय चुनावों के बाद
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दोनों एनसीपी गुटों के विलय पर गंभीर चर्चा हो
उन्होंने कहा:
“अजित दादा भावुक व्यक्ति थे। वे चाहते थे कि परिवार और पार्टी एक रहे। अब देखना होगा कि क्या हम उनकी आख़िरी इच्छा पूरी कर पाते हैं।”
हालांकि, महायुति सरकार में शामिल होने के सवाल पर शिंदे ने फिलहाल कोई स्पष्ट रुख अपनाने से इनकार किया।
जल्दबाज़ी क्यों?
चुनावी झटकों ने बढ़ाया दबाव
विश्लेषकों का कहना है कि हालिया नगर निगम चुनावों में पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ जैसे अहम गढ़ों में हार ने एनसीपी को पहले ही कमजोर कर दिया है।
ऐसे में नेतृत्व को लेकर कोई भी भ्रम पार्टी को और नुकसान पहुँचा सकता है।
यही कारण है कि:
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पार्टी जल्द से जल्द नेतृत्व का स्पष्ट चेहरा चाहती है
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और अजित पवार के बाद उत्पन्न शून्य को तुरंत भरने की कोशिश कर रही है
निष्कर्ष:-
शोक, सत्ता और भविष्य—तीनों एक ही फ्रेम में
आने वाले हफ्तों में यह साफ हो जाएगा कि:
यह मुलाकात केवल संवेदना तक सीमित थी
महाराष्ट्र की राजनीति इस वक्त निर्णायक मोड़ पर खड़ी है—और हर कदम इतिहास लिख सकता है।
