नई दिल्ली।5 जनवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi |वरिष्ठ पत्रकार
यह फैसला न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने सुनाया, जिसने 10 दिसंबर 2025 को इन सभी की ज़मानत याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया था।
“सभी आरोपी एक समान स्थिति में नहीं”
पीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि सभी आरोपियों की भूमिका और कथित सहभागिता एक जैसी नहीं है। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट होता है कि उमर ख़ालिद और शरजील इमाम की स्थिति अन्य आरोपियों से “गुणात्मक रूप से भिन्न” है।
न्यायालय के अनुसार, इन दोनों के विरुद्ध लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया गंभीर प्रकृति के हैं और उनके खिलाफ उपलब्ध अभियोजन सामग्री उस कानूनी सीमा को पार करती है, जो गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए के तहत ज़मानत के लिए तय की गई है।
पीठ ने कहा,
“इस चरण पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि अभियोजन का मामला प्रथम दृष्टया असत्य है। ऐसे में इन अपीलकर्ताओं को ज़मानत पर रिहा करने का कोई औचित्य नहीं बनता।”
यूएपीए के तहत ज़मानत की ऊँची कानूनी कसौटी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यूएपीए की धारा 43D(5) का विस्तृत उल्लेख करते हुए कहा कि यह एक विशेष कानून है, जिसमें सामान्य आपराधिक मामलों की तुलना में ज़मानत के लिए कहीं अधिक सख्त मानदंड निर्धारित किए गए हैं।
अदालत के मुताबिक, इस प्रावधान के तहत न्यायालय को यह परखना होता है कि केस डायरी और पुलिस रिपोर्ट के अवलोकन से क्या आरोप “प्रथम दृष्टया सही” प्रतीत होते हैं और क्या आरोपी की कथित भूमिका का आरोपित अपराध से तर्कसंगत संबंध बनता है।
अन्य आरोपियों को राहत, लेकिन सख्त शर्तों के साथ
वहीं दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि गुलफिशा फ़ातिमा और अन्य सह-आरोपियों को दी गई ज़मानत का अर्थ आरोपों की गंभीरता को कम करना नहीं है। अदालत ने इन्हें कड़े प्रतिबंधों और निगरानी शर्तों के अधीन रिहा करने का आदेश दिया है।
पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि ज़मानत की किसी भी शर्त का उल्लंघन हुआ, तो ट्रायल कोर्ट को बिना किसी बाधा के ज़मानत रद्द करने का पूरा अधिकार होगा।
दिल्ली पुलिस का पक्ष: “भाषणों से भड़की हिंसा”
सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि आरोपियों के कथित भाषणों और आह्वानों के कारण राजधानी में आवश्यक सेवाओं की आपूर्ति बाधित हुई, जिसे पुलिस ने “आर्थिक सुरक्षा पर हमला” और यूएपीए की धारा 15 के तहत “आतंकी कृत्य” करार दिया।
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने दलील दी कि “चक्का जाम” जैसे नारे महज़ राजनीतिक विरोध नहीं थे, बल्कि योजनाबद्ध तरीके से शहर को पंगु बनाने के निर्देश थे।
भाजपा नेता कपिल मिश्रा जैसे कुछ नेताओं के ऐसे कई वीडियो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं
इस पूरे मामले में सबसे ज़्यादा सवाल कथित दोहरे मानदंड (Double Standards) को लेकर उठते हैं। आलोचकों का कहना है कि 2020 के दिल्ली दंगों से ठीक पहले और दंगों के दौरान भाजपा नेता कपिल मिश्रा जैसे कुछ नेताओं के ऐसे कई वीडियो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं, जिनमें वे भड़काऊ भाषा का प्रयोग करते और पुलिस के सामने ही आक्रामक चेतावनी देते दिखाई देते हैं। इसके बावजूद न तो दिल्ली पुलिस ने उनके खिलाफ उसी सख्ती से कार्रवाई की, जैसी यूएपीए के तहत छात्र कार्यकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर की गई, और न ही अब तक सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर उनकी भूमिका की कोई निर्णायक न्यायिक समीक्षा सामने आई। इसी असमानता को लेकर सवाल उठते हैं कि जब कथित तौर पर “भाषण” और “उकसावे” को आधार बनाकर कुछ लोगों को वर्षों तक जेल में रखा जा सकता है, तो फिर सत्तारूढ़ दल से जुड़े नेताओं के मामले में वही कसौटी क्यों लागू नहीं होती। यही वह बिंदु है, जहां कानून की निष्पक्षता और समानता पर बहस और गहरी हो जाती है, और न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता को लेकर आम जनता के मन में गंभीर शंकाएँ जन्म लेती हैं।
बचाव पक्ष की दलील: “भाषण अपने-आप में आतंकवाद नहीं”
वहीं बचाव पक्ष ने यह तर्क दिया कि केवल तीखा या अप्रिय भाषण देना यूएपीए जैसे कठोर कानून को लागू करने का आधार नहीं बन सकता। शरजील इमाम की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि अभियोजन का पूरा मामला भाषणों पर आधारित है, जबकि आतंकवादी कृत्य के लिए स्पष्ट आपराधिक मंशा और प्रत्यक्ष हिंसक कार्रवाई का प्रमाण आवश्यक होता है।
पृष्ठभूमि: 2020 के दिल्ली दंगे
गौरतलब है कि फरवरी 2020 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और एनआरसी के विरोध के दौरान उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भीषण सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी थी। इन दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने एक कथित “बड़ी साज़िश” का आरोप लगाते हुए कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और छात्र नेताओं के खिलाफ यूएपीए के तहत मुकदमे दर्ज किए।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक ओर जहां राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों में न्यायपालिका के सतर्क रुख को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर यह भी रेखांकित करता है कि हर आरोपी की भूमिका का आकलन अलग-अलग किया जाना ज़रूरी है। आने वाले समय में इस मामले की सुनवाई और ट्रायल पर देश की नज़र बनी रहेगी, क्योंकि यह फैसला नागरिक स्वतंत्रताओं, अभिव्यक्ति की आज़ादी और कठोर आतंकवाद विरोधी कानूनों के संतुलन से जुड़े बड़े संवैधानिक सवालों को भी छूता है।
