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नारे बहुत हैं, नतीजे ग़ायब: ओडिशा में गिरता जन्म लैंगिक अनुपात एक गहरी नीतिगत विफलता

 24 जनवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | वरिष्ठ पत्रकार    

जब देश में ‘बेटी बचाओ’ की बातें हो रही हैं, तब ओडिशा चुपचाप एक खतरनाक जनसांख्यिकीय ढलान पर फिसल रहा है।

भारत में जन्म के समय लिंगानुपात (Sex Ratio at Birth – SRB) केवल एक आँकड़ा नहीं, बल्कि समाज के भीतर जड़ जमाए लैंगिक पूर्वाग्रहों का सबसे सटीक आईना है। प्रति 1000 पुरुष बच्चों पर जन्म लेने वाली बालिकाओं की संख्या यह बताती है कि किसी समाज में बेटियों को लेकर सोच कितनी बराबरी वाली है। जैविक रूप से यह अनुपात 943 से 952 के बीच होना स्वाभाविक माना जाता है। इससे नीचे गिरावट अक्सर लैंगिक चयनात्मक गर्भपात और गहरी पितृसत्तात्मक मानसिकता की ओर इशारा करती है।

देश में हल्की सुधार, लेकिन तस्वीर पूरी नहीं

राष्ट्रीय स्तर पर हालिया आंकड़े एक हल्का-सा सकारात्मक संकेत देते हैं।
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) के अनुसार, भारत का SRB:

  • 2015-16 में 919

  • 2019-21 में बढ़कर 929

सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) के आंकड़े भी यही संकेत देते हैं कि 2015-17 में 896 से बढ़कर 2020-22 में 914 तक सुधार हुआ है।

कई राज्यों में उल्लेखनीय सुधार दिखा है —
हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान जैसे राज्यों में SRB में बढ़ोतरी दर्ज हुई है, जो दशकों तक सबसे खराब प्रदर्शन करने वालों में गिने जाते थे।

लेकिन ओडिशा: एक डरावनी अपवाद

देश की इस औसत प्रगति के बीच ओडिशा अकेला ऐसा राज्य बनकर उभरा है, जहाँ 2015 से 2022 के बीच जन्म के समय लिंगानुपात लगातार गिरता गया।

NFHS के अनुसार:

  • 2005-06: 966

  • 2015-16: 932

  • 2019-21: 894

यह स्तर न केवल राष्ट्रीय औसत से नीचे है, बल्कि प्राकृतिक जैविक सीमा से भी काफी कम है।

यह गिरावट किसी एक सर्वे तक सीमित नहीं है।
सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम और सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम — दोनों में लगातार गिरावट दर्ज हुई है। यानी समस्या आँकड़ों की नहीं, व्यवस्था की है

घटती प्रजनन दर और बढ़ता खतरा

जब कुल प्रजनन दर घटती है, तब बेटे की चाह और तेज़ हो जाती है। ऐसे में तकनीक का दुरुपयोग कर लैंगिक चयनात्मक गर्भपात की संभावना बढ़ जाती है।
ओडिशा में SRB की यह लगातार गिरावट इसी कड़वे सच की ओर इशारा करती है।

कानून है, लेकिन ज़मीन पर असर क्यों नहीं?

भारत में PCPNDT Act जैसे सख्त कानून मौजूद हैं, जो भ्रूण लिंग जांच और चयन पर रोक लगाते हैं। इसके अलावा:

  • केंद्र की बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ (BBBP) योजना

  • ओडिशा की बीजू कन्या रत्न योजना (BKRY)

का उद्देश्य भी यही था कि जन्म के समय लिंगानुपात सुधरे और बेटियों को बराबरी का दर्जा मिले।

लेकिन नतीजे निराशाजनक हैं।

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ: पोस्टर ज़्यादा, ज़मीन कम

CAG और संसदीय समितियों की रिपोर्ट्स बताती हैं कि:

  • BBBP के लगभग 80% फंड
    सिर्फ विज्ञापन, होर्डिंग, पोस्टर और प्रचार पर खर्च हुए

  • वास्तविक ग्राउंड-लेवल हस्तक्षेप लगभग नदारद रहे

  • कई राज्यों में जारी फंड का बड़ा हिस्सा खर्च ही नहीं हुआ

ओडिशा का उदाहरण और भी चौंकाने वाला है —
2019-20 में उपलब्ध ₹375 लाख में से केवल ₹11.99 लाख खर्च हुए।
बाक़ी राशि बिना उपयोग के लौट गई।

यह साफ़ संकेत है कि योजना काग़ज़ों और नारों से आगे नहीं बढ़ पाई।

बीजू कन्या रत्न योजना: सीमित दायरा, सीमित असर

ओडिशा की अपनी योजना BKRY को 2016 में केवल तीन ज़िलों तक सीमित रखा गया —
अंगुल, ढेंकानाल और गंजाम।

इन तीनों ज़िलों में योजना अवधि के दौरान SRB घटता ही गया
कोई ठोस मूल्यांकन तंत्र नहीं,
स्वास्थ्य-शिक्षा-पुलिस तंत्र से तालमेल नहीं,
और न ही समाज की जड़ों में बैठी बेटे की चाह को चुनौती देने की कोई रणनीति।

यह सिर्फ आंकड़ों की नहीं, सोच की लड़ाई है

ओडिशा में गिरता SRB कोई आकस्मिक घटना नहीं है।
यह बताता है कि:

  • योजनाएँ टॉप-डाउन हैं

  • समाज की मानसिकता को बदले बिना सिर्फ स्कीमें लाने से कुछ नहीं बदलेगा

  • पितृसत्ता, आर्थिक असुरक्षा और सामाजिक दबाव आज भी बेटियों पर भारी हैं

अब आगे क्या?

यदि इस गिरावट को रोकना है, तो ज़रूरत है:

  • कानूनों के सख्त और ईमानदार अमल की

  • समुदाय-स्तर पर लगातार संवाद और भागीदारी की

  • योजनाओं में जवाबदेही और निगरानी तंत्र जोड़ने की

  • और सबसे अहम —
    नारों से आगे जाकर सामाजिक बदलाव की राजनीतिक इच्छाशक्ति की

निष्कर्ष

ओडिशा की कहानी हमें यह सिखाती है कि
सुंदर स्लोगन और रंगीन पोस्टर लैंगिक न्याय नहीं दिला सकते।
जब तक नीति और ज़मीन के बीच की दूरी खत्म नहीं होगी,
तब तक ‘बेटी बचाओ’ सिर्फ एक वाक्य रहेगा —
हक़ीक़त नहीं।

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