संभल | 13 जनवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi |वरिष्ठ पत्रकार
यह आदेश ऐसे समय में आया है, जब संभल हिंसा के दौरान कम से कम पाँच लोगों की मौत और कई नागरिकों के गोली लगने के आरोप पहले से ही स्थानीय समाज में आक्रोश का कारण बने हुए थे।
पाँच मौतें, कई घायल और पुलिस फायरिंग के आरोप
याचिकाकर्ताओं और पीड़ित परिवारों के अनुसार, संभल में हुई हिंसा के दौरान पुलिस ने भीड़ नियंत्रण के नाम पर अत्यधिक बल प्रयोग किया, जिसमें सीधे गोली चलाने के आरोप लगाए गए।
इन घटनाओं में:
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कई युवक गोली लगने से घायल हुए
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कम से कम पाँच लोगों की मौत हुई
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और कुछ पीड़ितों का इलाज डर और दबाव के कारण छिपकर कराना पड़ा
पीड़ित पक्ष का आरोप है कि यह कार्रवाई भीड़ नियंत्रण नहीं बल्कि दमनात्मक पुलिस ऑपरेशन थी, जिसमें विशेष समुदाय को निशाना बनाया गया।
मुकदमा रोकने की कोशिशें: दबाव, डर और चुप्पी का माहौल
याचिकाओं में यह भी कहा गया कि घटना के तुरंत बाद:
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पुलिस ने FIR दर्ज करने से इनकार किया
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पीड़ित परिवारों पर समझौते और चुप्पी का दबाव बनाया गया
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कुछ मामलों में यह संदेश दिया गया कि “मुकदमा किया तो हालात और बिगड़ेंगे”
यही कारण रहा कि कई पीड़ित परिवार काफी समय तक सामने नहीं आ सके।
हालांकि, कुछ लोगों ने तमाम दबावों के बावजूद कानूनी लड़ाई लड़ने का फैसला किया, और अंततः अदालत का दरवाज़ा खटखटाया।
कोर्ट का सख़्त रुख: ‘जांच से पहले FIR ज़रूरी’
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि:
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यदि पुलिस पर गंभीर आपराधिक आरोप हैं,
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और पीड़ित पक्ष प्रथम दृष्टया साक्ष्य प्रस्तुत करता है,
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तो FIR दर्ज करना कानूनी बाध्यता है, न कि पुलिस की मर्जी।
कोर्ट ने यह भी माना कि पुलिस स्वयं आरोपी होने की स्थिति में निष्पक्ष जांच की उम्मीद नहीं की जा सकती, इसलिए न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है।
यह आदेश उस व्यवस्था पर सीधा प्रहार है, जहाँ अक्सर वर्दी कानून से ऊपर खड़ी दिखाई देती है।
अनुज कुमार की भूमिका पर सवाल
घटना के समय अनुज कुमार संभल के CO के रूप में तैनात थे और कानून-व्यवस्था की पूरी जिम्मेदारी उन्हीं के पास थी।
याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि:
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फायरिंग और बल प्रयोग उनकी जानकारी और निर्देश में हुआ,
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बाद में मामलों को कमज़ोर करने और दबाने की कोशिशें की गईं,
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और अधीनस्थ पुलिसकर्मियों को भी इसी लाइन पर काम करने को कहा गया।
हालांकि, यह सभी बिंदु अदालती जांच के विषय हैं, लेकिन कोर्ट का FIR आदेश यह दर्शाता है कि आरोप हल्के या निराधार नहीं माने गए।
सांप्रदायिक पक्षपात के आरोप और प्रशासनिक चुप्पी
संभल हिंसा को लेकर सबसे गंभीर सवाल सांप्रदायिक चयनात्मकता का है।
स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि:
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एक समुदाय के खिलाफ कठोर और हिंसक कार्रवाई हुई
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जबकि दूसरे पक्ष के खिलाफ नरमी और संरक्षण का रवैया अपनाया गया
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पुलिस की भाषा, कार्रवाई और बाद की रिपोर्टिंग में भी पक्षपात झलकता है
इन आरोपों पर प्रशासन की ओर से अब तक कोई ठोस और पारदर्शी जवाब सामने नहीं आया है।
कानूनी लड़ाई की जीत या व्यवस्था की हार?
यह FIR आदेश सिर्फ एक केस नहीं है, बल्कि यह सवाल उठाता है कि:
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क्या आम नागरिक को न्याय पाने के लिए अदालत तक घसीटना ही पड़ेगा?
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क्या पुलिस पर मुकदमा दर्ज होना अब भी असाधारण घटना है?
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और क्या सांप्रदायिक हिंसा में राज्य की निष्पक्षता सच में कायम है?
पीड़ित परिवारों के लिए यह आदेश न्याय की पहली सीढ़ी है, जबकि पुलिस-प्रशासन के लिए यह विश्वसनीयता का बड़ा संकट।
निष्कर्ष:
कानून के ऊपर कोई नहीं
अब निगाहें इस पर हैं कि
FIR के बाद जांच किस दिशा में जाती है,
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