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अंकिता भंडारी: यह सिर्फ़ एक हत्या नहीं, यह सत्ता, संरक्षण और स्त्री-अस्मिता के सौदे का राष्ट्रीय अभियोग है

5 जनवरी 2026  | पत्रकार   :कविता शर्मा  | पत्रकार

अंकिता भंडारी की हत्या को तीन साल से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन न्याय आज भी अधूरा है, सवाल आज भी ज़िंदा हैं और जनता आज भी सड़कों पर है। यह कोई सामान्य आपराधिक मामला नहीं रहा। यह अब एक बेटी बनाम सत्ता, न्याय बनाम संरक्षण, और जनता बनाम राजनीतिक बेशर्मी की लड़ाई बन चुका है।

उत्तराखंड की यह बेटी इसलिए नहीं मरी कि वह कमज़ोर थी,
वह इसलिए मारी गई क्योंकि उसने समर्पण से इनकार किया।
उसने सत्ता की हवस के आगे झुकने से मना कर दिया।

और यही उसकी “गलती” थी।


वनतरा रिज़ॉर्ट से गंगा तक – अपराध की पूरी श्रृंखला

18 सितंबर 2022 की वह रात कोई सामान्य रात नहीं थी।
अंकिता भंडारी — एक साधारण परिवार की लड़की, जो नौकरी कर अपने सपनों को ज़िंदा रखना चाहती थी — उसे यह नहीं पता था कि जिस रिज़ॉर्ट में वह काम कर रही है, वह अय्याशी, वीआईपी संस्कृति और सत्ता-संरक्षित अपराधों का अड्डा है।

जांच में सामने आया कि
– उस पर “स्पेशल गेस्ट” को ख़ुश करने का दबाव डाला गया
– उसने विरोध किया
– उसने अपनी अस्मिता को सौदे में लगाने से इनकार किया
– और फिर उसे ज़िंदा नहीं छोड़ा गया

उसका शव गंगा में मिला —
जैसे किसी ने सोचा हो कि नदी सब बहा ले जाएगी — सच भी, गुनाह भी, और सत्ता की बदनामी भी।


न्याय या प्रबंधन? सवाल अदालत से ज़्यादा सत्ता से है

तीन लोगों को सज़ा मिलना न्याय का अंत नहीं होता,
जब तक यह तय न हो जाए कि
वे सिर्फ़ मोहरे थे या पूरी साज़िश के हिस्सेदार।

सबसे बड़ा प्रश्न आज भी वही है जिसे बार-बार दबाने की कोशिश हुई:
👉 वह “वीआईपी” कौन था?

– जिसके नाम पर अंकिता पर दबाव डाला गया
– जिसके कारण जांच की दिशा बदली
– जिसके कारण शुरू में बुलडोज़र चला, लेकिन सवालों पर ब्रेक लगा

सरकार और पुलिस ने कहा – कोई वीआईपी नहीं था
लेकिन सवाल यह है:
अगर कोई वीआईपी नहीं था,
तो फिर इतनी हड़बड़ी क्यों?
रिज़ॉर्ट तोड़ने की जल्दी क्यों?
सीबीआई जांच से डर क्यों?


धामी सरकार और बीजेपी: जवाबदेही से भागने की राजनीति

यह कहना अब अतिशयोक्ति नहीं है कि
अंकिता भंडारी मामला धामी सरकार के लिए नैतिक संकट बन चुका है।

उत्तराखंड की जनता ने साफ़ कर दिया है कि
विकास, सड़क, धर्म और राष्ट्रवाद के नारों से
बेटियों के बलात्कार और हत्या पर चुप्पी नहीं खरीदी जा सकती।

बीजेपी के भीतर से ही आवाज़ें उठना इस बात का प्रमाण है कि
– पार्टी के कई कार्यकर्ता और छोटे नेता
– अब अपनी आत्मा का सौदा करने को तैयार नहीं

इस्तीफे इस बात के संकेत हैं कि
सत्ता की दीवारों में दरार पड़ चुकी है।

यह वही बीजेपी है जिसके नेताओं पर देशभर में
यौन उत्पीड़न, बलात्कार, महिला शोषण और चरित्र हनन के आरोपों की
लंबी और शर्मनाक सूची है —
लेकिन पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अक्सर
या तो चुप रहता है
या पीड़िता के चरित्र पर सवाल खड़े कर देता है।


उत्तराखंड की जनता: जिसने बता दिया कि डर बिक चुका नहीं है

इस पूरे प्रकरण का सबसे उजला पक्ष
उत्तराखंड की स्वाभिमानी जनता है।

– बिना हिंसा
– बिना सत्ता से डर
– बिना जाति और दल की राजनीति के
लोग सड़कों पर उतरे।

माओं ने कहा — यह हमारी बेटी है
युवाओं ने कहा — यह हमारा भविष्य है
और महिलाओं ने साफ़ शब्दों में कहा —
“अगर आज चुप रहे, तो कल हमारी बारी होगी।”

यह वही जनता है जिसने बता दिया कि
बेटियों की अस्मिता कोई चुनावी मुद्दा नहीं,
यह सभ्यता का प्रश्न है।


यही वह समय है जब छोटे नेता इतिहास लिखते हैं

इतिहास गवाह है —
जब सत्ता अंधी हो जाती है,
तब परिवर्तन अक्सर
छोटे, अनजान और ईमानदार चेहरों से शुरू होता है।

आज जब बड़े नेता
एसी कमरों में बैठकर
फाइलों और बयानबाज़ी में
न्याय को उलझा रहे हैं,
तब कुछ लोग ऐसे भी हैं जो कह रहे हैं:

“पार्टी बाद में,
न्याय पहले।”

यही लोग कल का इतिहास बनते हैं।


अंकिता भंडारी का न्याय: एक परीक्षा, एक चेतावनी

अंकिता का मामला
सरकार के लिए चेतावनी है,
न्यायपालिका के लिए परीक्षा है,
और समाज के लिए आईना है।

अगर इस केस में
पूरा सच सामने नहीं आया,
अगर हर प्रभावशाली चेहरे की भूमिका उजागर नहीं हुई,
तो यह संदेश जाएगा कि
भारत में बेटी की अस्मिता से बड़ा कोई पद होता है।

और अगर ऐसा हुआ —
तो यह हार सिर्फ़ अंकिता की नहीं होगी,
यह हार संविधान, लोकतंत्र और इंसानियत की होगी।


अंतिम सवाल — जो सत्ता से नहीं, समाज से है

क्या हम सिर्फ़ कैंडल मार्च तक सीमित रहेंगे?
क्या हर अंकिता के बाद हम भूल जाएंगे?
या क्या हम यह तय करेंगे कि
अब कोई भी बेटी
सत्ता की हवस का शिकार नहीं बनेगी?

उत्तराखंड की जनता ने अपना उत्तर दे दिया है।
अब देश की बारी है।

अंकिता भंडारी अमर है —
क्योंकि उसकी हत्या ने हमें चुप रहना नहीं सिखाया,
बल्कि बोलना सिखाया है।


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