26 दिसंबर 2025:कविता शर्मा | पत्रकार
दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा उन्नाव बलात्कार मामले में दोषी ठहराए जा चुके पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की आजीवन कारावास की सज़ा को निलंबित करने का हालिया आदेश केवल एक कानूनी निर्णय नहीं है, बल्कि यह न्याय की संवेदनशीलता, पीड़ित अधिकारों और आपराधिक न्याय प्रणाली की दिशा पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। यह आदेश ऐसे समय आया है, जब देश यौन अपराधों के मामलों में कठोर रुख और पीड़ित-केंद्रित न्याय की अपेक्षा कर रहा है।
“लोक सेवक” की तकनीकी व्याख्या और उसका प्रभाव
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह तर्क स्वीकार किया कि एक विधायक (MLA) भारतीय दंड संहिता की धारा 21 के तहत “लोक सेवक” की परिभाषा में नहीं आता। इसी आधार पर अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि—
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POCSO अधिनियम, 2012 की धारा 5(c) (लोक सेवक द्वारा किया गया यौन अपराध, जिसे गंभीर श्रेणी में रखा गया है)
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और IPC की धारा 376(2)
इनका प्रयोग सेंगर पर लागू नहीं होता।
इसी “तकनीकी व्याख्या” के कारण अदालत ने यह माना कि आजीवन कारावास की सज़ा टिकाऊ नहीं है और उसे निलंबित किया जा सकता है।
क्या तकनीकी सही होना, न्यायसंगत भी है?
कानूनी दृष्टि से यह तर्क पाठ्य (textual) व्याख्या पर आधारित हो सकता है, क्योंकि POCSO अधिनियम IPC की परिभाषाओं को अपनाता है।
लेकिन यहीं से समस्या शुरू होती है।
क्योंकि—
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यदि धारा 5(c) लागू न भी मानी जाए,
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तब भी POCSO की धारा 4 के तहत नाबालिग से बलात्कार एक गंभीर अपराध है,
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जिसकी सज़ा आजीवन कारावास तक हो सकती है।
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इसी तरह IPC की धारा 376 के अंतर्गत भी आजीवन सज़ा का प्रावधान है।
अर्थात, अपराध की गंभीरता कम नहीं होती, फिर सज़ा निलंबन कैसे न्यायसंगत ठहराया जा सकता है?
उन्नाव मामला: एक साधारण केस नहीं, बल्कि संस्थागत विफलता की कहानी
2017 का उन्नाव बलात्कार मामला कोई सामान्य आपराधिक मुकदमा नहीं था। यह मामला सत्ता, प्रशासन और भय के गठजोड़ का प्रतीक बन गया था।
कुछ तथ्य जिन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता:
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पीड़िता को एफआईआर दर्ज कराने के लिए मुख्यमंत्री आवास के बाहर आत्मदाह का प्रयास करना पड़ा।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि
“कुलदीप सिंह के प्रभाव में प्रशासनिक मशीनरी काम कर रही थी।” -
पीड़िता के पिता को संदिग्ध परिस्थितियों में गिरफ्तार किया गया, हिरासत में पीटा गया और बाद में उनकी मृत्यु हो गई।
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2020 में अदालत ने इसी मामले में सेंगर को पीड़िता के पिता की मौत के लिए गैर-इरादतन हत्या का दोषी ठहराते हुए 10 साल की सज़ा सुनाई।
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2019 में संदिग्ध सड़क हादसे के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामला उत्तर प्रदेश से हटाकर दिल्ली स्थानांतरित किया।
इन सभी तथ्यों से यह स्पष्ट है कि यह मामला सिस्टमेटिक उत्पीड़न और सत्ता के दुरुपयोग का उदाहरण था।
सज़ा निलंबन: जीवन कारावास में अपवाद, नियम नहीं
भारतीय न्याय व्यवस्था में सज़ा निलंबन के सिद्धांत बिल्कुल स्पष्ट हैं—
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निश्चित अवधि की सज़ा में निलंबन सामान्य हो सकता है।
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लेकिन आजीवन कारावास में सज़ा निलंबन अपवाद है, नियम नहीं।
सुप्रीम कोर्ट बार-बार यह कह चुका है कि—
दोषसिद्धि के बाद “निर्दोष होने की धारणा” समाप्त हो जाती है।
हाल ही में शीर्ष अदालत ने झारखंड हाईकोर्ट को एक हत्या मामले में सज़ा निलंबन पर कड़ी फटकार भी लगाई थी, यह कहते हुए कि गंभीर अपराधों में हल्केपन की कोई जगह नहीं है।
क्या पीड़िता की सुरक्षा और न्याय की भावना को दरकिनार किया गया?
दिल्ली ट्रायल कोर्ट ने 2019 में सज़ा सुनाते समय स्पष्ट रूप से कहा था कि—
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पीड़िता को धमकाया गया,
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परिवार को व्यवस्थित तरीके से चुप कराने की कोशिश की गई,
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और सत्ता का दुरुपयोग लगातार होता रहा।
ऐसे पृष्ठभूमि वाले मामले में सज़ा निलंबन का निर्णय
पीड़िता की सुरक्षा, समाज में संदेश और न्याय की आत्मा—तीनों के लिए चिंताजनक प्रतीत होता है।
निष्कर्ष:-
कानून की भाषा बनाम न्याय का उद्देश्य
यह मामला एक बुनियादी सवाल उठाता है
क्या न्याय केवल शब्दों की व्याख्या है,या फिर समाज, पीड़ित और नैतिकता के प्रति उत्तरदायित्व भी?
आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि उच्चतम न्यायालय इस आदेश को किस दृष्टि से देखता है, क्योंकि यह फैसला केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं, बल्कि भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली की दिशा तय करने वाला बन सकता है।
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