25 दिसम्बर 2025 लखनऊ | उर्दू साहित्य समाचार | ज़िआउस सहर रज़ज़ाक़ी | वरिष्ठ पत्रकार
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| कैफ़ जलालपुरी अवार्ड 2025 प्राप्त करते हुए श्री आबिद हुसैन हैदरी जी |
गरिमामय उपस्थिति और विद्वानों का संगम
इस साहित्यिक समारोह की अध्यक्षता लखनऊ विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर मनुका खन्ना ने की। मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. अम्मार रिज़वी, पूर्व कार्यवाहक मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश तथा प्रोफेसर अरविंद मोहन, डीन, फैकल्टी ऑफ आर्ट्स, लखनऊ विश्वविद्यालय उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथि के तौर पर विश्वविद्यालय की कुल सचिव डॉ. भावना मिश्रा की गरिमामयी उपस्थिति ने कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई।
विशिष्ट वक्ता के रूप में डॉ. अनीस अंसारी, पूर्व कुलपति, ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय, लखनऊ ने अपने विचार रखे, जिन्होंने पूरे कार्यक्रम को वैचारिक गहराई प्रदान की।
“ज्ञान के मीनार” – अध्यक्षीय उद्बोधन
अपने अध्यक्षीय भाषण में प्रोफेसर मनुका खन्ना ने पुस्तक के लेखक प्रोफेसर अब्बास रज़ा नय्यर और पुस्तक के केंद्रबिंदु प्रोफेसर आबिद हुसैन हैदरी – दोनों को “ज्ञान का मीनार” करार देते हुए कहा कि यह कृति उर्दू साहित्य के गंभीर अध्येताओं के लिए एक संदर्भ ग्रंथ का दर्जा रखती है। उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर बल दिया कि लेखक ने अत्यंत संतुलित, गहन और निष्पक्ष दृष्टि के साथ प्रोफेसर आबिद हुसैन हैदरी के साहित्यिक व्यक्तित्व के विविध आयामों को उजागर किया है, जो किसी भी शोधात्मक लेखन की बुनियादी शर्त होती है।
लेखक की विनम्रता और भावनात्मक क्षण
पुस्तक के लेखक प्रोफेसर अब्बास रज़ा नय्यर ने अपने संबोधन में सभी अतिथियों, वक्ताओं, शोधार्थियों और आयोजकों के प्रति अपने विशिष्ट और आत्मीय अंदाज़ में आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजन न केवल लेखक को आत्मिक संतोष देते हैं, बल्कि शोध और आलोचना के कठिन मार्ग पर आगे बढ़ने का संबल भी प्रदान करते हैं।
वहीं, पुस्तक के केंद्र में रहे प्रोफेसर आबिद हुसैन हैदरी ने इस अवसर को अपने जीवन का अत्यंत भावुक क्षण बताते हुए कहा कि यह पुस्तक उनके लिए किसी व्यक्तिगत सम्मान से बढ़कर उनके चाहने वालों, शिष्यों और विशेष रूप से प्रोफेसर अब्बास रज़ा नय्यर की मोहब्बत और बौद्धिक समर्पण का परिणाम है। उन्होंने कहा कि ऐसी रचनात्मक पहलकदमियां उन्हें निरंतर कुछ नया करने की प्रेरणा देती रहती हैं।
शोध, आलोचना और समकालीन संदर्भ
कार्यक्रम में प्रस्तुत शोध पत्रों पर टिप्पणी करते हुए प्रोफेसर सोबान सईद ने प्रोफेसर आबिद हुसैन हैदरी की अदबी शख्सियत और प्रोफेसर अब्बास रज़ा नय्यर के आलोचनात्मक दृष्टिकोण के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला और दोनों विद्वानों को हार्दिक बधाई दी।
मुख्य अतिथि डॉ. अम्मार रिज़वी ने अपने उद्बोधन में कहा कि इस प्रकार की पुस्तकें केवल किसी व्यक्ति या युग का दस्तावेज़ नहीं होतीं, बल्कि भावी शोधार्थियों के लिए मार्गदर्शक का काम करती हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी कृतियां लेखकों और शोधकर्ताओं को और बेहतर कार्य करने का आत्मविश्वास भी देती हैं, इसलिए साहित्यिक और शैक्षणिक संस्थानों को ऐसे आयोजनों की निरंतरता बनाए रखनी चाहिए।
शोध पत्र, कविताएं और साहित्यिक अभिव्यक्ति
कार्यक्रम के दौरान डॉ. वज़ाहत हुसैन रिज़वी, डॉ. मुंतज़िर क़ायमी, डॉ. बाक़र मेहंदी और डॉ. मसीहुद्दीन ख़ान ने पुस्तक तथा उसके लेखक के बौद्धिक और साहित्यिक योगदान पर गहन शोध पत्र प्रस्तुत किए।
इसके अतिरिक्त डॉ. मख़मूर काकोरवी, डॉ. सलमा हिजाब, आसिम काकोरवी और अज़ीज़ रज़ा ने कविताओं के माध्यम से लेखक के व्यक्तित्व और साहित्यिक यात्रा पर अपने विचार व्यक्त कर कार्यक्रम को भावनात्मक ऊंचाई प्रदान की।
सम्मान और अभिनंदन
इस अवसर पर प्रोफेसर आबिद हुसैन हैदरी को कैफ़ फाउंडेशन, लखनऊ की ओर से प्रतिष्ठित कैफ़ जलालपुरी अवार्ड 2025 से सम्मानित किया गया। साथ ही सिपासना उर्दू विभाग की छात्रा हलअता तथा अंजुमन फ़रोग़े मर्सिया ख़्वानी की ओर से श्री क़ाज़ी असद ने उन्हें सिपास-नामा भेंट किया।
डॉ. अज़ीज़ रज़ा, डॉ. मिर्ज़ा शफ़ीक़ हुसैन शफ़क़, डॉ. सरदार मेहंदी, डॉ. अकबर अली बिलग्रामी और डॉ. इस्मत मलीहाबादी ने भी पुस्तक के लेखक और उसके केंद्रबिंदु दोनों विद्वानों को बधाई देते हुए अपने विचार रखे।
सशक्त मंच संचालन और व्यापक सहभागिता
कार्यक्रम का अत्यंत सधे हुए और प्रभावशाली ढंग से मंच संचालन उर्दू विभाग के शोधार्थी ग़ुलाम अब्बास रिज़वी ने किया। अंत में उर्दू विभाग के प्राध्यापक डॉ. जानिसार आलम ने सभी अतिथियों, वक्ताओं और श्रोताओं का धन्यवाद ज्ञापित किया।
इस साहित्यिक समारोह में विश्वविद्यालय तथा नगर के विभिन्न महाविद्यालयों के शिक्षक, शहर के प्रतिष्ठित साहित्यकार, बुद्धिजीवी वर्ग के सदस्य, शोधार्थी और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे, जिससे यह आयोजन एक जीवंत और सार्थक साहित्यिक महफिल में तब्दील हो गया।
उर्दू साहित्य के लिए एक मील का पत्थर
कुल मिलाकर, प्रोफेसर अब्बास रज़ा नय्यर की यह पुस्तक और उसका विमोचन समारोह उर्दू साहित्य में शोध और आलोचना की परंपरा को नई ऊर्जा देने वाला साबित हुआ। यह आयोजन इस बात का सशक्त प्रमाण है कि विश्वविद्यालयी परिसरों में आज भी गंभीर साहित्यिक विमर्श की मजबूत ज़मीन मौजूद है, जो आने वाली पीढ़ियों को दिशा और दृष्टि प्रदान करती रहेगी
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