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इंदौर लॉ कॉलेज विवाद: सुप्रीम कोर्ट से क्लीन चिट के बावजूद दो वर्षों तक संकट में रहे प्रोफेसर

21 दिसम्बर 2025| इंदौर | भोपाल | ✍🏻 Z S Razzaqi |वरिष्ठ पत्रकार  

ABVP आरोपों से शुरू हुआ मामला, 2025 में सरकार ने माना—आरोप निराधार

इंदौर स्थित गवर्नमेंट न्यू लॉ कॉलेज के तत्कालीन प्रिंसिपल डॉ. इनामुर रहमान से जुड़ा विवाद, जो दिसंबर 2022 में सामने आया था, लगभग तीन वर्षों बाद आधिकारिक रूप से समाप्त हो गया है।

राज्य सरकार ने 8 दिसंबर 2025 को विभागीय जांच के बाद स्पष्ट किया कि डॉ. रहमान के खिलाफ लगाए गए सभी आरोप निराधार थे और उन्हें पूर्ण क्लीन चिट दी जाती है।

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मामला कैसे शुरू हुआ

1 दिसंबर 2022 को गवर्नमेंट न्यू लॉ कॉलेज, इंदौर में कुछ छात्रों ने—जो स्वयं को ABVP से जुड़ा बता रहे थे—कॉलेज प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए।

इन आरोपों में कहा गया कि कॉलेज में

  • “लव जिहाद” को बढ़ावा दिया जा रहा है,

  • इस्लामी कट्टरवाद को प्रोत्साहित किया जा रहा है,

  • मुस्लिम प्रोफेसरों का पक्षपात किया जा रहा है।

हालांकि, उस समय इन आरोपों के समर्थन में कोई लिखित शिकायत, कोई जांच रिपोर्ट या ठोस साक्ष्य सामने नहीं आया


कॉलेज परिसर में विरोध और नारेबाज़ी

आरोपों के बाद कॉलेज परिसर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया।
प्रदर्शन के दौरान नारेबाज़ी, आरोप-प्रत्यारोप और व्यक्तिगत टिप्पणियाँ की गईं।
स्थिति इतनी बिगड़ी कि एक शैक्षणिक संस्थान का वातावरण तनावपूर्ण हो गया।


मीडिया कवरेज और राजनीतिक बयान

मामले ने स्थानीय और राज्य स्तरीय मीडिया में व्यापक कवरेज प्राप्त की।
कई टीवी चैनलों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर मामले को लेकर लगातार बहसें चलीं।

इसी दौरान तत्कालीन मध्य प्रदेश के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने सार्वजनिक रूप से बयान देते हुए कड़ी कार्रवाई की बात कही।
यह बयान ऐसे समय आया, जब न तो कोई FIR दर्ज हुई थी और न ही कोई आधिकारिक जांच रिपोर्ट सामने आई थी।


इस्तीफ़ा और कानूनी कार्रवाई

लगातार दबाव और सार्वजनिक विवाद के बीच
डॉ. इनामुर रहमान ने प्रिंसिपल पद से इस्तीफ़ा दे दिया।

इसके तुरंत बाद

  • डॉ. रहमान के खिलाफ FIR दर्ज की गई,

  • एक अन्य वरिष्ठ प्रोफेसर के खिलाफ भी मामला दर्ज हुआ,

  • कॉलेज प्रशासन के खिलाफ विभागीय जांच शुरू की गई।


डॉ. रहमान का पक्ष

डॉ. रहमान ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि
कॉलेज में कुछ छात्र बिना नियमित उपस्थिति के अटेंडेंस दर्ज कराने और बिना फीस परीक्षा में बैठने की मांग कर रहे थे।

उनका कहना था कि
नियमों को सख्ती से लागू करने के बाद ही उनके खिलाफ आरोप लगाए गए, और इन्हीं प्रशासनिक फैसलों को सांप्रदायिक रंग दे दिया गया।


मामला अदालत पहुँचा

मामला पहले हाई कोर्ट और फिर Supreme Court of India तक पहुँचा।

14 मई 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने डॉ. रहमान के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया।
अदालत ने पाया कि आरोपों के समर्थन में कोई ठोस आधार नहीं है।


सेवानिवृत्ति और विभागीय जांच का निष्कर्ष

मई 2024 में, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ही,
डॉ. रहमान अपनी आयु-सीमा पूरी होने पर सेवानिवृत्त हो गए।

इसके बाद भी विभागीय जांच जारी रही।
मार्च 2025 में जांच पूरी हुई और
8 दिसंबर 2025 को राज्य सरकार ने आधिकारिक आदेश जारी कर कहा कि—

  • सभी आरोप निराधार हैं

  • डॉ. रहमान को पूर्ण क्लीन चिट दी जाती है

  • निलंबन अवधि को ड्यूटी पीरियड माना जाएगा


उठते सवाल

हालांकि कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर डॉ. रहमान को राहत मिल चुकी है, लेकिन यह मामला कई अहम सवाल छोड़ जाता है—

  • दो वर्षों तक चली सार्वजनिक बदनामी की ज़िम्मेदारी कौन लेगा?

  • बिना जांच के बने मीडिया नैरेटिव की जवाबदेही कैसे तय होगी?

  • राजनीतिक बयानों से किसी व्यक्ति की छवि को पहुँचे नुकसान की भरपाई कैसे होगी?


निष्कर्ष:-

डॉ. इनामुर रहमान को न्यायिक और प्रशासनिक रूप से राहत मिल चुकी है, लेकिन यह मामला शिक्षा संस्थानों, मीडिया की भूमिका और राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर गंभीर बहस को जन्म देता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रकरण दिखाता है कि
किस तरह आरोप, सार्वजनिक दबाव और लंबी कानूनी प्रक्रिया किसी व्यक्ति के पेशेवर और व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित कर सकती है—भले ही अंत में वह निर्दोष ही क्यों न साबित हो।

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