19 दिसम्बर 2025 |✍🏻 Z S Razzaqi | अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार
वैश्विक व्यापार में तेज़ी से बदलते समीकरणों और अमेरिका की कड़ी टैरिफ नीति के बीच भारत ने एक निर्णायक कूटनीतिक–आर्थिक कदम उठाया है। भारत ने ओमान के साथ व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA) पर हस्ताक्षर कर यह स्पष्ट कर दिया है कि वह वैश्विक अनिश्चितताओं का सामना केवल प्रतिक्रियात्मक नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीति के तहत करेगा।भारत–ओमान CEPA: केवल व्यापार समझौता नहीं, रणनीतिक साझेदारी
यह समझौता मस्कट में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ओमान के राष्ट्राध्यक्ष सुल्तान हैथम बिन तारिक की मौजूदगी में संपन्न हुआ। बीते छह महीनों में यह भारत का दूसरा बड़ा मुक्त व्यापार समझौता है, जो यह संकेत देता है कि नई दिल्ली वैश्विक व्यापार मंच पर तेज़ी से अपनी पकड़ मज़बूत कर रही है।
इस समझौते के तहत:
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ओमान भारत को 98.08% टैरिफ लाइनों पर शून्य शुल्क की सुविधा देगा
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भारत ने ओमान के लिए 77.79% टैरिफ लाइनों पर शुल्क में छूट देने का वादा किया है
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यह छूट भारत के लगभग 95% आयात को कवर करेगी
यह व्यवस्था भारतीय निर्यातकों के लिए पश्चिम एशिया के बाज़ारों में लगभग पूरी तरह बाधा-मुक्त प्रवेश सुनिश्चित करती है।
किन भारतीय सेक्टर्स को मिलेगा सबसे बड़ा फायदा?
इस CEPA से भारत के कई प्रमुख उद्योगों को सीधा लाभ मिलने की उम्मीद है:
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इंजीनियरिंग और मशीनरी उत्पाद
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टेक्सटाइल और रेडीमेड गारमेंट्स
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चमड़ा और लेदर गुड्स
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फार्मास्यूटिकल्स
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कृषि और फूड प्रोसेसिंग उत्पाद
विशेषज्ञों के अनुसार, ओमान को “गेटवे मार्केट” के रूप में इस्तेमाल कर भारतीय कंपनियाँ खाड़ी और अफ्रीकी बाज़ारों में भी अपनी पहुँच बढ़ा सकेंगी।
अमेरिकी टैरिफ के दबाव में भारत की वैकल्पिक रणनीति
अगस्त 2025 से संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर लगाए गए 50% आयात शुल्क ने भारत के कई श्रम-प्रधान उद्योगों को झटका दिया है। टेक्सटाइल, ऑटो कंपोनेंट्स, मेटल्स और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में निर्यात ऑर्डर्स पर सीधा असर पड़ा।
ऐसे माहौल में भारत मुक्त व्यापार समझौतों को एक रणनीतिक ढाल के रूप में इस्तेमाल कर रहा है, ताकि:
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निर्यात बाज़ारों का विविधीकरण हो
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किसी एक देश पर निर्भरता कम की जा सके
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वैश्विक आपूर्ति शृंखला में भारत की भूमिका मज़बूत हो
FTA: भारत की आर्थिक कूटनीति का नया आधार
मुक्त व्यापार समझौते अब भारत की आर्थिक नीति का केंद्रीय स्तंभ बन चुके हैं। इनका उद्देश्य केवल टैरिफ कम करना नहीं, बल्कि:
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वैश्विक निवेश को आकर्षित करना
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भारतीय कंपनियों को प्रतिस्पर्धी बनाना
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दीर्घकालिक रोज़गार सृजन सुनिश्चित करना
वर्तमान में भारत के पास:
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15 मुक्त व्यापार समझौते
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6 प्रेफरेंशियल ट्रेड एग्रीमेंट्स
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50 से अधिक देशों के साथ सक्रिय बातचीत
वार्ताएँ पूरी होने पर, चीन को छोड़कर लगभग सभी प्रमुख वैश्विक अर्थव्यवस्थाएँ भारत के व्यापार समझौता नेटवर्क में शामिल होंगी।
यूरोप, ओशिनिया और लैटिन अमेरिका पर भी भारत की नज़र
भारत केवल खाड़ी देशों तक सीमित नहीं है। यूरोपीय संघ, न्यूज़ीलैंड और चिली के साथ एफटीए पर उन्नत बातचीत चल रही है। हाल ही में भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुई बैठकों में कई अटकी हुई बाधाओं को दूर करने पर सहमति बनी है, जिससे आने वाले वर्ष में बड़ी घोषणा की उम्मीद की जा रही है।
रूस–यूक्रेन युद्ध, तेल आयात और अमेरिका-भारत रिश्ते
भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता में सबसे बड़ा तनाव बिंदु रहा है भारत द्वारा रूस से रियायती कच्चे तेल की खरीद। अमेरिका का तर्क है कि इससे रूस की युद्ध अर्थव्यवस्था को बल मिलता है, जबकि भारत इसे अपनी ऊर्जा सुरक्षा और महँगाई नियंत्रण से जोड़कर देखता है।
हालांकि हाल के हफ्तों में रिश्तों में नरमी के संकेत मिले हैं। प्रधानमंत्री मोदी और डोनाल्ड ट्रंप के बीच संवाद ने यह स्पष्ट किया है कि दोनों देश व्यापार और रणनीतिक साझेदारी को पूरी तरह पटरी से उतरने नहीं देना चाहते।
ओमान समझौता क्यों है भारत के लिए ‘गेम चेंजर’?
ओमान के साथ हुआ यह CEPA केवल एक व्यापारिक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि भारत की बदलती वैश्विक सोच का प्रतिबिंब है। यह समझौता:
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पश्चिम एशिया में भारत की आर्थिक पकड़ मज़बूत करता है
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अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव को संतुलित करता है
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भारत को वैश्विक व्यापार में अधिक आत्मनिर्भर और लचीला बनाता है
निष्कर्ष:-
तेज़ी से बदलते वैश्विक व्यापार परिदृश्य में भारत अब रक्षात्मक नहीं, बल्कि आक्रामक आर्थिक कूटनीति अपना रहा है। ओमान के साथ यह ऐतिहासिक समझौता इसी सोच का प्रमाण है—जहाँ भारत न केवल मौजूदा झटकों से खुद को बचा रहा है, बल्कि भविष्य के लिए नए अवसरों की मज़बूत नींव भी रख रहा है।
