दिल्ली 29 जून 2026 ।विस्तृत विश्लेषण |✍🏻 Z S Razzaqi |वरिष्ठ पत्रकार
प्रस्तावना: एक सैन्य अभियान जिसने सिर्फ सीमा नहीं, राजनीति को भी हिला दिया
भारत और पाकिस्तान के बीच 2025 में हुआ संघर्ष, जिसे भारत ने “ऑपरेशन सिंदूर” नाम दिया, केवल एक सैन्य अभियान नहीं था बल्कि यह दक्षिण एशिया की सुरक्षा नीति, कूटनीति, मीडिया नैरेटिव और भारतीय राजनीति के लिए भी एक महत्वपूर्ण घटना बन गया।
अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान समर्थित आतंकी नेटवर्क पर कार्रवाई का फैसला किया। इस हमले में 26 नागरिकों की मौत हुई, जिसने पूरे देश में गुस्से और आक्रोश की भावना पैदा की। भारत सरकार ने इस हमले को सीमा पार आतंकवाद से जोड़ते हुए जवाबी कार्रवाई का ऐलान किया।
7 मई 2025 को भारतीय सेना ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में कथित आतंकी ठिकानों को निशाना बनाते हुए सैन्य अभियान शुरू किया। भारत ने इसे आतंकवाद के खिलाफ सीमित, सटीक और नियंत्रित कार्रवाई बताया, जबकि पाकिस्तान ने इसे आक्रामक सैन्य कार्रवाई करार दिया।
इसके बाद चार दिनों तक दोनों देशों के बीच मिसाइल हमले, ड्रोन ऑपरेशन, हवाई संघर्ष और सीमा पर भारी गोलाबारी देखने को मिली।
लेकिन ऑपरेशन सिंदूर की कहानी केवल मिसाइलों और सैन्य रणनीति तक सीमित नहीं रही। इसके साथ एक दूसरा युद्ध भी शुरू हुआ — सूचना और राजनीतिक नैरेटिव का युद्ध।
ऑपरेशन सिंदूर: सेना की कार्रवाई या सरकार की राजनीतिक कहानी?
किसी भी युद्ध या सैन्य अभियान के दौरान सरकार अपनी जनता के सामने घटनाओं का एक आधिकारिक पक्ष रखती है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी केंद्र सरकार ने इसे भारत की मजबूत सुरक्षा नीति और आतंकवाद के खिलाफ कठोर जवाब के रूप में प्रस्तुत किया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी नेताओं ने इसे भारत की नई सुरक्षा नीति का प्रतीक बताया, जहां भारत आतंकवादी हमलों के बाद केवल कूटनीतिक विरोध तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि जरूरत पड़ने पर सीमा पार जाकर कार्रवाई करेगा।
हालांकि, विपक्ष और सरकार के आलोचकों ने सवाल उठाया कि क्या सैन्य उपलब्धियों को राजनीतिक प्रचार में बदला जा रहा है?
आलोचकों का कहना है कि सेना की बहादुरी और बलिदान पूरे देश की संपत्ति है, इसे किसी राजनीतिक दल की उपलब्धि के रूप में पेश करना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है।
राजनाथ सिंह के संसद बयान पर विवाद: क्या जनता को पूरी जानकारी मिली?
ऑपरेशन सिंदूर को लेकर सबसे बड़ा राजनीतिक विवाद तब खड़ा हुआ जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में बयान देते हुए कहा कि इस अभियान में किसी भारतीय सैनिक की जान नहीं गई।
सरकार समर्थक नेताओं ने इस बयान को भारतीय सेना की रणनीतिक सफलता बताया और कहा कि सेना ने बिना बड़े नुकसान के अपने लक्ष्य हासिल किए।
लेकिन विपक्ष और कई आलोचकों ने इस दावे पर सवाल उठाए।
उनका कहना है कि युद्ध जैसी परिस्थितियों में सबसे महत्वपूर्ण चीज पारदर्शिता होती है। यदि सरकार सैन्य घटनाओं से जुड़े आंकड़े जनता के सामने रखती है तो उसमें पूर्ण स्पष्टता होनी चाहिए।
विपक्ष ने आरोप लगाया कि बीजेपी सरकार ने ऑपरेशन सिंदूर को अपनी राजनीतिक छवि मजबूत करने के लिए इस्तेमाल किया और जनता के सामने केवल वही जानकारी रखी जो सरकार के पक्ष में जाती थी।
आलोचकों का तर्क है कि सैनिकों की सुरक्षा और सम्मान सर्वोपरि है, लेकिन लोकतंत्र में जनता को यह जानने का अधिकार भी है कि देश की सेना ने किन परिस्थितियों का सामना किया।
बीजेपी सरकार पर विपक्ष का हमला: राष्ट्रवाद की राजनीति बनाम जवाबदेही
ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय राजनीति में एक बार फिर राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा केंद्र में आ गया।
बीजेपी ने इसे अपनी मजबूत सुरक्षा नीति की सफलता बताया। पार्टी समर्थकों का कहना है कि पहले की सरकारों की तुलना में मौजूदा सरकार ने आतंकवाद के खिलाफ अधिक आक्रामक नीति अपनाई है।
लेकिन विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि बीजेपी सरकार अक्सर राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करती है।
आलोचकों का कहना है कि सैनिकों की कुर्बानी और सेना की कार्रवाई को चुनावी भाषणों का हिस्सा बनाना उचित नहीं है।
उनका आरोप है कि सरकार हर बड़े सुरक्षा घटनाक्रम को अपनी राजनीतिक उपलब्धि के रूप में पेश करती है, जबकि वास्तविक सवाल — जैसे सैन्य नुकसान, रणनीतिक परिणाम और दीर्घकालिक सुरक्षा प्रभाव — पीछे छूट जाते हैं।
युद्ध के समय सूचना नियंत्रण: लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा सवाल
आधुनिक युद्ध केवल हथियारों से नहीं लड़े जाते। आज के दौर में सूचना भी एक हथियार बन चुकी है।
हर देश अपनी जनता और दुनिया के सामने अपनी स्थिति मजबूत दिखाने की कोशिश करता है। भारत और पाकिस्तान दोनों ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अपने-अपने दावे पेश किए।
लेकिन लोकतांत्रिक देशों में सरकार की जिम्मेदारी केवल जीत का दावा करना नहीं होती, बल्कि जनता के प्रति जवाबदेही बनाए रखना भी होती है।
यही कारण है कि राजनाथ सिंह के बयान को लेकर बहस सिर्फ एक बयान तक सीमित नहीं रही बल्कि यह सवाल बन गया कि:
क्या राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर जानकारी सीमित की जा सकती है?
या फिर लोकतंत्र में जनता को हर महत्वपूर्ण तथ्य जानने का अधिकार होना चाहिए?
सैन्य विश्लेषण: भारत की रणनीति और पाकिस्तान की प्रतिक्रिया
सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार ऑपरेशन सिंदूर दक्षिण एशिया में बदलते युद्ध के स्वरूप को दिखाता है।
भारत ने लंबी दूरी के हथियारों, आधुनिक निगरानी प्रणाली और एयर डिफेंस क्षमता का इस्तेमाल किया।
वहीं पाकिस्तान ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए अपनी सैन्य क्षमता और हवाई रक्षा प्रणाली का प्रदर्शन किया।
यह संघर्ष इस बात का उदाहरण बना कि भविष्य के युद्ध केवल पारंपरिक सेनाओं के बीच नहीं होंगे बल्कि ड्रोन, साइबर क्षमता, मिसाइल तकनीक और सूचना युद्ध भी उतने ही महत्वपूर्ण होंगे।
अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण: सीमित युद्ध और परमाणु जोखिम
भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु हथियार संपन्न देश हैं। इसलिए दुनिया की नजर इस संघर्ष पर थी।
अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने चिंता जताई कि दोनों देशों के बीच छोटा सैन्य संघर्ष भी बड़े क्षेत्रीय संकट में बदल सकता है।
यही कारण रहा कि संघर्ष के दौरान अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक प्रयास तेज हुए और अंततः दोनों देशों के बीच तनाव कम हुआ।
ऑपरेशन सिंदूर का राजनीतिक प्रभाव
ऑपरेशन सिंदूर ने बीजेपी सरकार को सुरक्षा और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर राजनीतिक लाभ दिया।
लेकिन इसके साथ ही आलोचकों ने यह सवाल भी उठाया कि क्या राष्ट्रीय सुरक्षा को राजनीतिक बहस से ऊपर रखा जाना चाहिए?
एक लोकतंत्र में मजबूत सेना के साथ-साथ मजबूत संस्थाएं और पारदर्शिता भी जरूरी होती है।
यदि सरकार सेना की उपलब्धियों का श्रेय लेती है तो उसे सवालों के जवाब देने की जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी चाहिए।
निष्कर्ष:-
इतिहास ऑपरेशन सिंदूर को कैसे याद करेगा?
ऑपरेशन सिंदूर भारत की सुरक्षा नीति के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय रहेगा।
यह अभियान जहां एक ओर भारत की सैन्य क्षमता और आतंकवाद के खिलाफ नीति को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर यह लोकतांत्रिक जवाबदेही, राजनीतिक नैरेटिव और सूचना की पारदर्शिता पर भी बड़े सवाल छोड़ जाता है।
सेना किसी पार्टी की नहीं, पूरे देश की होती है।
इसलिए किसी भी सैन्य अभियान की असली सफलता केवल दुश्मन को जवाब देने में नहीं, बल्कि जनता का विश्वास बनाए रखने में भी होती है।
ऑपरेशन सिंदूर का अंतिम मूल्यांकन केवल युद्ध के मैदान में नहीं होगा, बल्कि इस बात से भी होगा कि सरकार ने इस पूरे घटनाक्रम में कितनी ईमानदारी, पारदर्शिता और जिम्मेदारी दिखाई।
