भोपाल, 6 जून 2026।विस्तृत विश्लेषण |✍🏻 Z S Razzaqi |वरिष्ठ पत्रकार
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय का नाम बदलकर "वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय" किए जाने का प्रस्ताव विश्वविद्यालय की कार्य परिषद (Executive Council) की बैठक में पारित कर दिया गया है। अब इस प्रस्ताव को अंतिम स्वीकृति के लिए राज्यपाल के पास भेजा गया है।
प्रस्ताव सामने आने के बाद शैक्षणिक, सामाजिक और राजनीतिक हलकों में एक नई बहस छिड़ गई है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या देश के स्वतंत्रता संग्राम में असाधारण योगदान देने वाले एक महान क्रांतिकारी के नाम को इतिहास के पन्नों से धीरे-धीरे हटाने की कोशिश की जा रही है, या फिर यह केवल सांस्कृतिक पुनर्स्थापन का प्रयास है?
कौन थे मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली?
यदि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के उन नायकों की सूची बनाई जाए जिनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण था लेकिन जिन्हें इतिहास की मुख्यधारा में अपेक्षित स्थान नहीं मिला, तो मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली का नाम उनमें प्रमुखता से लिया जाएगा।
7 जुलाई 1854 को भोपाल में जन्मे मौलाना बरकतुल्लाह केवल एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे, बल्कि वे एक अंतरराष्ट्रीय स्तर के क्रांतिकारी, लेखक, पत्रकार, चिंतक और राष्ट्रवादी नेता थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन भारत को ब्रिटिश साम्राज्यवाद से मुक्त कराने के लिए समर्पित कर दिया था।
आज जब स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा होती है तो अक्सर महात्मा गांधी, भगत सिंह, सुभाषचंद्र बोस और चंद्रशेखर आज़ाद जैसे नाम सामने आते हैं, लेकिन बरकतुल्लाह उन शुरुआती नेताओं में थे जिन्होंने विदेशों में बैठकर ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ वैश्विक स्तर पर अभियान चलाया।
भारत की पहली निर्वासित सरकार के पहले प्रधानमंत्री
भारतीय इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण लेकिन अपेक्षाकृत कम चर्चित अध्याय 1 दिसंबर 1915 का है।
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में भारत की पहली अंतरिम अथवा निर्वासित सरकार (Provisional Government of India) की स्थापना की गई थी।
इस सरकार के राष्ट्रपति राजा महेंद्र प्रताप सिंह बने थे, जबकि मौलाना बरकतुल्लाह को उसका पहला प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया था।
यह वह दौर था जब भारत अभी भी ब्रिटिश शासन के अधीन था और विदेशी धरती पर बैठकर भारतीय क्रांतिकारी स्वतंत्र भारत की कल्पना को राजनीतिक स्वरूप देने का प्रयास कर रहे थे।
कई इतिहासकार इस घटना को आज़ाद हिंद सरकार और बाद के स्वतंत्रता आंदोलनों की वैचारिक नींव के रूप में देखते हैं।
गदर आंदोलन के प्रमुख स्तंभ
मौलाना बरकतुल्लाह का नाम गदर आंदोलन से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।
अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में उन्होंने लाला हरदयाल और तारकनाथ दास जैसे महान क्रांतिकारियों के साथ मिलकर गदर पार्टी की गतिविधियों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
गदर पार्टी का उद्देश्य भारत में ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकना था।
उस समय अमेरिका, कनाडा और अन्य देशों में रहने वाले भारतीयों को संगठित करना आसान नहीं था, लेकिन बरकतुल्लाह ने अपनी लेखनी, भाषणों और संगठन क्षमता के माध्यम से हजारों लोगों को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ा।
आठ भाषाओं के विद्वान
मौलाना बरकतुल्लाह केवल राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं थे बल्कि एक असाधारण विद्वान भी थे।
उन्हें उर्दू, हिंदी, अंग्रेज़ी, अरबी, फारसी, तुर्की, जापानी समेत लगभग आठ भाषाओं का ज्ञान था।
उन्होंने जापान के टोक्यो विश्वविद्यालय में हिंदुस्तानी भाषा (हिंदी-उर्दू) के प्रोफेसर के रूप में भी अध्यापन किया।
उस समय किसी भारतीय का विदेशी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बनना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि थी।
दुनिया भर में भटकता रहा एक क्रांतिकारी
बरकतुल्लाह का जीवन आराम और स्थायित्व का नहीं बल्कि संघर्ष और त्याग का जीवन था।
भारत की स्वतंत्रता के लिए वे इंग्लैंड, अमेरिका, जापान, जर्मनी, तुर्की और रूस जैसे देशों में लगातार यात्रा करते रहे।
वे ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की कोशिश करते रहे।
उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि भारत की आजादी केवल देश के भीतर नहीं, बल्कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में भी लड़ी जा रही थी।
लेनिन से समर्थन मांगने वाले शुरुआती भारतीयों में शामिल
बहुत कम लोग जानते हैं कि मौलाना बरकतुल्लाह उन शुरुआती भारतीय नेताओं में शामिल थे जिन्होंने सोवियत संघ के नेता व्लादिमीर लेनिन से मुलाकात कर भारत की स्वतंत्रता के लिए समर्थन मांगा था।
यह उस समय की बात है जब विश्व राजनीति तेजी से बदल रही थी और औपनिवेशिक शक्तियों के खिलाफ नए विचार उभर रहे थे।
बरकतुल्लाह ने हर मंच पर भारत की स्वतंत्रता का मुद्दा उठाया।
पत्रकारिता को बनाया हथियार
आजादी की लड़ाई में उन्होंने केवल राजनीतिक गतिविधियों पर भरोसा नहीं किया।
उन्होंने "इस्लामिक फ्रेटर्निटी" और "अल-इस्लाम" जैसी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन किया और इनके माध्यम से ब्रिटिश शासन की नीतियों की तीखी आलोचना की।
उनकी लेखनी इतनी प्रभावशाली थी कि ब्रिटिश सरकार उन्हें खतरनाक राष्ट्रवादी मानने लगी।
स्थिति यहां तक पहुंच गई कि अंग्रेज सरकार ने उनके भारत लौटने पर प्रतिबंध लगा दिया।
स्वतंत्र भारत देखने का सपना अधूरा रह गया
भारत को स्वतंत्र देखने की तीव्र इच्छा उनके जीवन का सबसे बड़ा सपना थी।
लेकिन दुर्भाग्यवश 20 सितंबर 1927 को अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में उनका निधन हो गया।
उन्हें कैलिफोर्निया के सैक्रामेंटो में दफनाया गया।
वे उस भारत को नहीं देख सके जिसके लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था।
1988 में मिला था सम्मान
स्वतंत्रता के बाद धीरे-धीरे उनके योगदान को मान्यता मिलने लगी।
वर्ष 1988 में भोपाल विश्वविद्यालय का नाम बदलकर बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय रखा गया था।
यह केवल एक नाम परिवर्तन नहीं था बल्कि भोपाल की धरती पर जन्मे उस महान क्रांतिकारी को श्रद्धांजलि थी जिसने पूरी दुनिया में भारत की स्वतंत्रता का संदेश पहुंचाया।
अब नाम बदलने पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
अब जब विश्वविद्यालय का नाम बदलकर "वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय" करने का प्रस्ताव सामने आया है तो अनेक शिक्षाविद, इतिहासकार और सामाजिक कार्यकर्ता यह प्रश्न उठा रहे हैं कि क्या किसी नए नाम को अपनाने के लिए एक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी का नाम हटाना आवश्यक है जिसने राष्ट्र के लिए अपना संपूर्ण जीवन न्योछावर कर दिया?
बहस का केंद्र केवल एक विश्वविद्यालय का नाम नहीं है। यह स्मृति, इतिहास और राष्ट्रीय विरासत का प्रश्न भी है।
कई लोगों का मानना है कि सभ्य समाज अपने इतिहास को जोड़ता है, मिटाता नहीं। नए प्रतीकों का सम्मान किया जा सकता है, लेकिन उन व्यक्तित्वों को विस्मृत नहीं किया जाना चाहिए जिन्होंने राष्ट्र निर्माण की नींव रखी।
इतिहास के साथ कैसा व्यवहार होना चाहिए?
भारत जैसे विशाल और बहुलतावादी देश में नामकरण और पुनर्नामकरण की बहस नई नहीं है। समय-समय पर शहरों, संस्थानों और सड़कों के नाम बदले जाते रहे हैं।
लेकिन जब किसी संस्थान का नाम ऐसे व्यक्ति पर रखा गया हो जिसने स्वतंत्रता संग्राम में असाधारण योगदान दिया हो, तब निर्णय केवल प्रशासनिक नहीं रह जाता, बल्कि वह ऐतिहासिक और नैतिक विमर्श का विषय भी बन जाता है।
मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली का जीवन इस बात की याद दिलाता है कि भारत की आजादी अनेक विचारों, भाषाओं, समुदायों और बलिदानों का परिणाम थी। ऐसे में उनके नाम से जुड़े किसी भी निर्णय पर स्वाभाविक रूप से व्यापक चर्चा होना लोकतांत्रिक समाज की स्वस्थ परंपरा का हिस्सा है।
आज प्रश्न केवल यह नहीं है कि विश्वविद्यालय का नाम क्या होगा। प्रश्न यह भी है कि आने वाली पीढ़ियों को हम अपने स्वतंत्रता संग्राम के नायकों की कौन-सी विरासत सौंपना चाहते हैं।
