नई दिल्ली, 19 अप्रैल 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | वरिष्ठ पत्रकार
महिला आरक्षण का इतिहास: वादों से वास्तविकता तक
भारत में महिला आरक्षण का विचार नया नहीं है। इसकी शुरुआत 1990 के दशक में हुई, जब एच. डी. देवगौड़ा की सरकार ने 1996 में पहली बार इसे संसद में पेश किया। इसके बाद 2010 में मनमोहन सिंह सरकार के दौरान यह राज्यसभा से पारित भी हुआ, लेकिन लोकसभा में सामाजिक न्याय के मुद्दों—विशेष रूप से OBC और दलित आरक्षण—को लेकर सहमति नहीं बन सकी।
BJP ने विपक्ष में रहते हुए महिला आरक्षण का समर्थन किया, लेकिन 2014 में सत्ता में आने के बाद लगभग नौ वर्षों तक इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं दिखाई। आखिरकार 2023 में नरेंद्र मोदी सरकार ने विशेष सत्र बुलाकर संविधान (128वां संशोधन) विधेयक पेश किया, जिसे ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ नाम दिया गया।
यह विधेयक लोकसभा में भारी बहुमत (454-2) और राज्यसभा में सर्वसम्मति से पारित हुआ। इसमें संसद और राज्य विधानसभाओं में 33% महिला आरक्षण का प्रावधान किया गया—लेकिन इसके लागू होने को 2026 की जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन से जोड़ दिया गया। यानी वास्तविक लागू होने की समयसीमा 2029 या उससे आगे खिसक गई।
2026: जब रणनीति बदली और विवाद गहराया
अप्रैल 2026 में केंद्र सरकार ने एक नया दांव खेलते हुए तीन महत्वपूर्ण विधेयक पेश किए:
- संविधान (131वां संशोधन) विधेयक
- परिसीमन संशोधन विधेयक
- केंद्र शासित प्रदेश कानून संशोधन विधेयक
इन विधेयकों का उद्देश्य 2023 के कानून में बदलाव करते हुए महिला आरक्षण को तत्काल लागू करने का दावा करना था। लेकिन इसके साथ ही लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर संभावित रूप से 850 तक करने और परिसीमन को नए सिरे से लागू करने की योजना भी सामने आई।
यहीं से विवाद की असली शुरुआत हुई।
विपक्ष का आरोप: “नारी शक्ति के नाम पर राजनीतिक गणित”
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और INDIA गठबंधन के अन्य दलों ने इस कदम को सीधे-सीधे राजनीतिक रणनीति बताया। उनका तर्क था कि:
- परिसीमन 2011 या 2026 की जनगणना के आधार पर होगा
- इससे उत्तर भारत के राज्यों—जैसे उत्तर प्रदेश और बिहार—में सीटें बढ़ेंगी
- दक्षिण भारत के राज्यों—जैसे तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक—की हिस्सेदारी घट सकती है
चूंकि दक्षिण भारत में BJP की राजनीतिक स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर है, इसलिए विपक्ष ने इसे सत्ता संतुलन को अपने पक्ष में मोड़ने का प्रयास बताया।
विपक्ष का स्पष्ट रुख था:
“महिला आरक्षण लागू करो, लेकिन उसे परिसीमन से जोड़कर राजनीतिक लाभ मत उठाओ।”
संसद में हार: 12 साल में पहली बड़ी चुनौती
लोकसभा में इस विधेयक को पास करने के लिए दो-तिहाई बहुमत (लगभग 352 वोट) की आवश्यकता थी, लेकिन सरकार को केवल 298 वोट ही मिले, जबकि 230 सांसदों ने विरोध किया। इस प्रकार विधेयक गिर गया।
यह घटना BJP के 12 वर्षों के शासनकाल में पहली बड़ी संसदीय हार के रूप में देखी जा रही है।
अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सांसदों से ‘अंतरात्मा की आवाज’ पर वोट करने की अपील की, लेकिन विपक्ष पूरी तरह एकजुट रहा।
सियासी नैरेटिव की जंग: “महिला विरोधी कौन?”
विधेयक गिरने के तुरंत बाद BJP ने आक्रामक प्रचार अभियान शुरू किया:
- “विपक्ष ने महिलाओं के अधिकारों का विरोध किया”
- “नारी शक्ति का अपमान हुआ”
वहीं विपक्ष ने पलटवार करते हुए कहा कि उन्होंने महिला आरक्षण का नहीं, बल्कि परिसीमन से जुड़े राजनीतिक एजेंडे का विरोध किया है।
संसद परिसर में BJP की महिला सांसदों द्वारा प्रदर्शन भी किया गया, जिसने इस मुद्दे को और अधिक राजनीतिक रंग दे दिया।
असली सवाल: महिला सशक्तिकरण या चुनावी रणनीति?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पूरा विवाद केवल महिला आरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे 2029 के आम चुनावों की तैयारी छिपी हुई है।
यदि परिसीमन लागू होता:
- उत्तर भारत में सीटें बढ़तीं
- BJP को अपने मजबूत क्षेत्रों में अतिरिक्त लाभ मिलता
- दक्षिण भारत की राजनीतिक आवाज कमजोर होती
इस परिदृश्य में महिला आरक्षण एक राजनीतिक ‘टूल’ के रूप में इस्तेमाल होता दिख रहा है।
निष्कर्ष:-
लोकतंत्र के दो चेहरे
महिला आरक्षण का मुद्दा भारत के लोकतंत्र की आत्मा से जुड़ा हुआ है। लेकिन 2026 की यह घटना एक गहरा सवाल खड़ा करती है—
क्या महिला सशक्तिकरण वास्तव में प्राथमिकता है, या यह केवल सत्ता की राजनीति का एक प्रभावी हथियार बन चुका है?
सच्चाई यह है कि 2023 का कानून पहले से मौजूद है और उसे लागू करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है, न कि नए संवैधानिक प्रयोगों की।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि:
भारत की आधी आबादी अब केवल वादों से संतुष्ट नहीं होगी—उसे वास्तविक प्रतिनिधित्व चाहिए, और वह भी बिना किसी राजनीतिक शर्त के।
