22 फरवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार
अमेरिकी राजनीति और वैश्विक व्यापार के परिदृश्य में एक बार फिर उथल-पुथल मच गई है। संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के कुछ ही दिनों बाद वैश्विक आयात पर लगने वाले टैरिफ को 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत करने की घोषणा कर दी। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब अमेरिकी शीर्ष अदालत ने ट्रंप प्रशासन द्वारा आपातकालीन शक्तियों के तहत लगाए गए व्यापक टैरिफ को असंवैधानिक करार दिया था। फैसले के बाद कारोबार जगत, आयातकों और कई विदेशी सरकारों के बीच पहले से वसूले गए अरबों डॉलर की संभावित वापसी को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है।
क्या है पूरा मामला?
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने छह-तीन के बहुमत से यह स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति को एकतरफा तरीके से टैरिफ तय करने या उनमें बदलाव करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि कराधान और शुल्क निर्धारण का मूलाधिकार अमेरिकी कांग्रेस के पास निहित है। अदालत ने ट्रंप प्रशासन द्वारा International Emergency Economic Powers Act (IEEPA) के तहत लगाए गए व्यापक आयात शुल्क को असंवैधानिक बताया, जिससे प्रशासन की टैरिफ रणनीति को बड़ा झटका लगा।
फैसले के तुरंत बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने एक वैकल्पिक कानूनी रास्ता अपनाते हुए Trade Act of 1974 की Section 122 का सहारा लिया और 10 प्रतिशत का सार्वभौमिक टैरिफ लागू करने के लिए कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए। अब उसी प्रावधान के तहत अधिकतम अनुमेय सीमा तक टैरिफ बढ़ाकर 15 प्रतिशत करने की घोषणा की गई है।
ट्रंप का रुख: “फौरन प्रभाव से”
राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच पर फैसले की आलोचना करते हुए टैरिफ बढ़ोतरी को “तत्काल प्रभाव” से लागू करने की बात कही। ट्रंप का तर्क है कि अमेरिकी उद्योगों की सुरक्षा, घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहन और व्यापार असंतुलन को सुधारने के लिए कठोर शुल्क नीति आवश्यक है। प्रशासन का दावा है कि वैधानिक ढांचे के भीतर रहते हुए नई टैरिफ संरचना तैयार की जा रही है।
हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि Section 122 के तहत लगाए गए टैरिफ 150 दिनों तक ही प्रभावी रहते हैं, जब तक कि कांग्रेस उन्हें विस्तार न दे। इस प्रावधान का पहले कभी किसी राष्ट्रपति द्वारा उपयोग न किए जाने के कारण आगे और कानूनी चुनौतियों की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
133 अरब डॉलर की वसूली और रिफंड की जटिलता
संघीय आंकड़ों के अनुसार, अमेरिकी ट्रेजरी ने आपातकालीन शक्तियों के तहत लगाए गए आयात शुल्क से $133 बिलियन (करीब 133 अरब डॉलर) से अधिक की वसूली की है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद एक हजार से अधिक मुकदमे दायर हो चुके हैं, जिनमें आयातकों ने रिफंड की मांग की है।
टैक्स और बजट नीति से जुड़े विश्लेषकों का मानना है कि बड़ी कंपनियों के लिए रिफंड प्रक्रिया अपेक्षाकृत व्यवस्थित हो सकती है, लेकिन छोटे और मध्यम उद्यमों (SMEs) के लिए यह मार्ग जटिल और समय-साध्य साबित हो सकता है। अदालत के आदेश, प्रशासनिक सत्यापन और वित्तीय समायोजन — इन सभी चरणों में लंबा समय लग सकता है।
वैश्विक व्यापार समझौतों पर असर
टैरिफ विवाद ने अमेरिका के हालिया द्विपक्षीय व्यापार समझौतों पर भी प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।
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अमेरिका-ताइवान समझौता: सामान्य टैरिफ दर को 20% से घटाकर 15% करने का प्रावधान, बदले में ताइवान द्वारा अमेरिकी ऊर्जा, विमानन और उपकरणों की बड़ी खरीद का वादा।
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अमेरिका-यूनाइटेड किंगडम समझौता: अधिकांश ब्रिटिश वस्तुओं पर 10% शुल्क, जबकि ऑटोमोबाइल, स्टील और एल्युमिनियम पर रियायती दरें।
नीति-विश्लेषकों का कहना है कि यदि सार्वभौमिक दरें और द्विपक्षीय समझौते परस्पर टकराते हैं, तो व्याख्या और अनुपालन को लेकर “कानूनी धुंध” की स्थिति बन सकती है। कुछ देशों के लिए यह अवसर भी बन सकता है, क्योंकि उच्च शुल्क दरें अस्थायी रूप से घट सकती हैं।
सहयोगी देशों और बाजारों की प्रतिक्रिया
टैरिफ बढ़ोतरी और अदालत के फैसले पर विश्वभर में मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं। यूरोपीय नीति-निर्माताओं ने सामूहिक रुख अपनाने के संकेत दिए हैं, जबकि एशियाई बाजारों में अनिश्चितता की भावना बनी हुई है। कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि व्यापार तनाव लंबा खिंचता है, तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं (global supply chains) और निवेश निर्णयों पर असर पड़ सकता है।
घरेलू राजनीति: चुनावी समीकरण और महंगाई का मुद्दा
अमेरिका में आगामी मध्यावधि चुनावों की पृष्ठभूमि में टैरिफ नीति राजनीतिक विमर्श का केंद्र बनती जा रही है। हालिया सर्वेक्षणों में अर्थव्यवस्था के प्रबंधन पर राष्ट्रपति की स्वीकृति दर में गिरावट दर्ज की गई है। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि उच्च आयात शुल्क उपभोक्ता कीमतों को बढ़ाते हैं, जिससे महंगाई और जीवन-यापन लागत पर दबाव पड़ता है।
डेमोक्रेटिक नेताओं का कहना है कि टैरिफ नीति अमेरिकी परिवारों और छोटे व्यवसायों पर अतिरिक्त बोझ डाल सकती है, जबकि प्रशासन का तर्क है कि दीर्घकाल में यह नीति घरेलू उत्पादन और रोजगार सृजन को गति देगी।
कानूनी भविष्य: क्या फिर अदालत का दरवाजा खटखटाया जाएगा?
Section 122 के तहत अधिकतम सीमा तक टैरिफ बढ़ाने के निर्णय ने संवैधानिक और वैधानिक बहस को नई दिशा दे दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रभावित उद्योग, आयातक या राज्य सरकारें इस प्रावधान की व्याख्या को चुनौती देती हैं, तो मामला फिर न्यायिक समीक्षा के दायरे में जा सकता है।
निष्कर्ष:-
अनिश्चितता के बीच निर्णायक नीति-दांव
टैरिफ को 15 प्रतिशत तक बढ़ाने का ट्रंप प्रशासन का कदम अमेरिकी व्यापार नीति के इतिहास में एक असाधारण अध्याय जोड़ता है। जहां एक ओर यह निर्णय घरेलू उद्योगों की सुरक्षा और राजकोषीय वसूली के दृष्टिकोण से अहम बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर संवैधानिक सीमाओं, रिफंड दावों और वैश्विक व्यापार संतुलन को लेकर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं।
आने वाले महीनों में कांग्रेस की भूमिका, अदालतों की व्याख्या और वैश्विक साझेदारों की प्रतिक्रिया — ये तीनों कारक तय करेंगे कि यह टैरिफ रणनीति टिकाऊ सिद्ध होती है या फिर अमेरिका को एक और कानूनी-आर्थिक मोड़ का सामना करना पड़ता है।
