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पश्चिम बंगाल SIR मामला: ईसीआई के सॉफ़्टवेयर पर सुप्रीम कोर्ट की सख़्त टिप्पणी, मामूली नाम-अंतर पर नोटिस भेजे जाने पर जताई चिंता

 नई दिल्ली।8 फरवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार  

पश्चिम बंगाल में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को एक अहम सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने चुनाव आयोग (ECI) द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे सॉफ़्टवेयर की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह सॉफ़्टवेयर अत्यधिक कठोर और सीमित मानकों पर काम कर रहा है, जिसके कारण नामों में मामूली और स्वाभाविक अंतर होने पर भी बड़ी संख्या में मतदाताओं को नोटिस जारी किए जा रहे हैं।

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“सॉफ़्टवेयर प्राकृतिक अंतर को स्वीकार नहीं कर रहा”

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने उदाहरण देते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल में ‘कुमार’ का मध्य नाम के रूप में इस्तेमाल आम सामाजिक प्रथा है। यदि किसी रिकॉर्ड में ‘कुमार’ छूट गया, तो केवल इसी आधार पर नोटिस भेजना तार्किक से अधिक तकनीकी रवैया दर्शाता है।

उन्होंने कहा—

“आपके सॉफ़्टवेयर में जो टूल्स लगाए गए हैं, वे स्वाभाविक भिन्नताओं को खत्म कर रहे हैं। उपनामों के भी अलग-अलग रूप होते हैं—रॉय, रे। बंगाल में ‘कुमार’ मध्य नाम के रूप में आम है। अब केवल ‘कुमार’ के न होने पर नोटिस भेजा जा रहा है। यह संभव है कि इसमें कोई तार्किक असंगति हो, लेकिन सॉफ़्टवेयर के प्रयोग से बहुत बड़ा जाल फैल रहा है, जिसमें अनावश्यक रूप से लोग फँस रहे हैं।”

आयु-अंतर और पारिवारिक विवरण पर भी सवाल

जस्टिस बागची ने केवल नामों तक सीमित न रहते हुए पारिवारिक डेटा और आयु-अंतर को लेकर भी चुनाव आयोग के सॉफ़्टवेयर पर प्रश्न उठाए। उन्होंने कहा कि यदि दादा-दादी और पोते-पोतियों की उम्र में 50 वर्ष का अंतर दिखता है, तो वह तार्किक विसंगति हो सकती है। लेकिन हर स्थिति में नोटिस जारी करना नीति-स्तरीय समस्या को जन्म देता है।

उन्होंने टिप्पणी की—

“20 वर्ष को प्रजनन आयु मानते हुए क्या 50 वर्ष का अंतर उचित विंडो है? कई मामलों में हमने देखा है कि लोगों के 50 पोते-पोतियाँ भी हैं। ऐसे मामलों में नोटिस देना समझ में आता है। लेकिन जब पाँच या छह बच्चों के मामलों में भी नोटिस भेजे जा रहे हैं, तो यह सॉफ़्टवेयर की कठोरता को दर्शाता है।”

ECI की दलील और अदालत की असहमति

चुनाव आयोग की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट डी.एस. नायडू ने दलील दी कि यदि किसी मतदाता का 2002 की मतदाता सूची से सही ढंग से मैपिंग हो जाती है, तो उससे कोई सवाल नहीं पूछा जाता। इस पर जस्टिस बागची ने तुरंत असहमति जताते हुए कहा—

“सवाल पूछे जा रहे हैं, सर। मैप किए गए लोगों को भी नोटिस भेजे जा रहे हैं।”

यह टिप्पणी इस बात का संकेत मानी जा रही है कि अदालत सॉफ़्टवेयर आधारित स्वचालित निर्णयों को बिना मानवीय विवेक के स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है।

समयसीमा बढ़ी, लेकिन SIR पर रोक नहीं

इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने की। पीठ ने दस्तावेज़ों की जाँच और आपत्तियाँ दर्ज करने की अंतिम तिथि 14 फरवरी से आगे बढ़ा दी, ताकि प्रभावित मतदाताओं को पर्याप्त अवसर मिल सके।

हालाँकि, CJI सूर्यकांत ने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत समय-समय पर आवश्यक निर्देश भले ही दे, लेकिन वह किसी भी राज्य में SIR प्रक्रिया के पूरा होने में बाधा नहीं बनने देगी

व्यापक संवैधानिक और लोकतांत्रिक सवाल

यह मामला केवल तकनीकी त्रुटियों तक सीमित नहीं है, बल्कि मताधिकार, न्यायसंगत प्रक्रिया और डिजिटल गवर्नेंस के संतुलन से भी जुड़ा है। अदालत की टिप्पणियाँ इस ओर संकेत करती हैं कि यदि सॉफ़्टवेयर मानवीय और सामाजिक वास्तविकताओं को नज़रअंदाज़ करता है, तो वह लोकतांत्रिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।

मामले का विवरण

यह सुनवाई निम्न याचिकाओं से जुड़ी है—

  • मोस्तारी बानो बनाम भारत निर्वाचन आयोग, W.P.(C) No. 1089/2025

  • जॉय गोस्वामी बनाम भारत निर्वाचन आयोग, W.P.(C) No. 126/2026

  • ममता बनर्जी बनाम भारत निर्वाचन आयोग, W.P.(C) No. 129/2026

  • सनातनी संगसद एवं अन्य बनाम भारत निर्वाचन आयोग, W.P.(C) No. 1216/2025


निष्कर्ष:-

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी चुनावी प्रक्रियाओं में तकनीक के विवेकपूर्ण उपयोग की आवश्यकता को रेखांकित करती है। अदालत ने संकेत दिया है कि दक्षता के नाम पर स्वाभाविक सामाजिक विविधताओं को नज़रअंदाज़ करना स्वीकार्य नहीं होगा। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि चुनाव आयोग अपने सॉफ़्टवेयर और प्रक्रियाओं में किस तरह के सुधार करता है, ताकि मतदाता अधिकारों की रक्षा और चुनावी शुद्धता—दोनों के बीच संतुलन कायम रह सके।

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