नई दिल्ली | 8 फरवरी 2026 |✍🏻ज़िआउस सहर रज़ज़ाक़ी | अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार
जब दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र अपने ही मतपत्र पर संदेह करने लगे, तब संकट राजनीतिक नहीं रहता
वह संवैधानिक बन जाता है।
भारत स्वयं को विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में प्रस्तुत करता है—यह दावा केवल जनांकीय विशालता तक सीमित नहीं है, बल्कि एक गहन सैद्धांतिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है कि यहाँ प्रत्येक नागरिक का मत समान मूल्य रखता है और चुनावी प्रक्रिया निष्पक्ष, स्वायत्त तथा पारदर्शी होगी। किंतु पिछले कुछ वर्षों, विशेषकर 2019 के आम चुनावों के बाद से लेकर हालिया राज्य एवं राष्ट्रीय चुनावों के दौरान, सार्वजनिक प्रवचन में जिस प्रकार के गंभीर आरोप, डिजिटल साक्ष्य, दस्तावेज़ीकृत शिकायतें और संस्थागत प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं, उन्होंने लोकतंत्र की इस आधारशिला पर गहरे संदेह के बादल उत्पन्न कर दिए हैं।
यह केवल राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि भारतीय गणतंत्र की संवैधानिक नैतिकता का संकट है।
चुनावी प्रक्रिया पर बढ़ते संदेह: तकनीकी अविश्वास से संरचनात्मक आशंका तक
भारत में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) को लेकर विवाद नया नहीं है, किंतु इसकी प्रकृति मौलिक रूप से परिवर्तित हुई है। प्रारंभिक आपत्तियाँ तकनीकी जाँच और पारदर्शिता के स्तर पर केंद्रित थीं। 2010 में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष 'सुब्रमण्यम स्वामी बनाम भारत निर्वाचन आयोग' मामले में ही न्यायालय ने टिप्पणी की थी कि "EVMs एक सौ प्रतिशत सुरक्षित नहीं कही जा सकतीं"। इसके परिणामस्वरूप VVPAT (वोटर वेरिफ़ायबल पेपर ऑडिट ट्रेल) प्रणाली की शुरुआत हुई, जिसे न्यायालय ने "मतदाताओं के विश्वास को बढ़ाने वाला कदम" बताया।
परंतु समस्या यहाँ भी समाप्त नहीं हुई। विपक्षी दलों एवं नागरिक समाज द्वारा 100% VVPAT पर्चियों की मैचिंग की माँग लगातार उठती रही है, जिसे चुनाव आयोग ने प्रशासनिक और व्यावहारिक कठिनाइयों का हवाला देकर अस्वीकार किया है। गणितीय रूप से, वर्तमान में प्रति विधानसभा क्षेत्र मात्र पाँच बूथों के VVPAT पर्चों की जाँच की जाती है—एक सांख्यिकीय नमूना जो पूर्ण विश्वास कायम करने में अनेक विशेषज्ञों के अनुसार अपर्याप्त है।
हाल के चुनावों में, सोशल मीडिया पर EVMs के साथ छेड़छाड़ के आरोपों वाले वीडियोज़, बूथ कैप्चरिंग के दावे और मतगणना प्रक्रिया में अनियमितताओं के आरोप व्यापक रूप से वायरल हुए। इनकी सत्यता पर विवाद हो सकता है, किंतु लोकतंत्र का मूलभूत सिद्धांत यह है कि सार्वजनिक संदेह को केवल दमन या उपेक्षा से नहीं, बल्कि पूर्ण पारदर्शिता और वैज्ञानिक सत्यापन से दूर किया जाता है। जब तक स्वतंत्र तकनीकी विशेषज्ञों को EVM के हार्डवेयर और सॉफ़्टवेयर की पूर्ण ऑडिट करने की अनुमति नहीं दी जाती, तब तक यह विवाद जारी रहेगा।
"एक मतदाता, अनेक पहचान": मतदाता सूची—लोकतंत्र की रीढ़ या उसकी अकिलीज़ एड़ी?
संविधान का अनुच्छेद 326 सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की गारंटी देता है। किंतु मताधिकार का प्रयोग मतदाता सूची में नाम होने पर ही निर्भर करता है। विपक्षी दलों, स्वतंत्र शोधकर्ताओं और मीडिया रिपोर्टों द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों के अनुसार:
1.दोहरी प्रविष्टियाँ: एक ही व्यक्ति का नाम, फोटो और जनसांख्यिकीय विवरण अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में दर्ज पाए गए।
2.लक्षित विलोपन: विशिष्ट सामाजिक-आर्थिक या धार्मिक समुदायों के मतदाताओं के नामों को सूची से हटाए जाने के व्यवस्थित पैटर्न के दावे।
3.बूथ स्तर के अधिकारियों (BLOs) पर दबाव: स्थानीय प्रशासन द्वारा राजनीतिक रूप से निर्देशित सूची सुधार के आरोप।
चुनाव आयोग ने इनमें से अधिकांश आरोपों को "निराधार" या "तकनीकी त्रुटियाँ" बताकर खारिज किया है। किंतु समस्या यह है कि इन आरोपों की जाँच के लिए कोई स्वतंत्र, बहु-हितधारक संस्थागत तंत्र मौजूद नहीं है। मतदाता सूची का रखरखाव पूर्णतः कार्यपालिका के अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा किया जाता है, जिसमें न्यायिक या बाह्य पर्यवेक्षण का अभाव है।
जब OBC, अल्पसंख्यक या विस्थापित समुदायों को लगता है कि उनके मताधिकार को सूक्ष्म तरीक़ों से कमज़ोर किया जा रहा है, तो यह केवल प्रशासनिक ख़ामी नहीं, बल्कि संवैधानिक उल्लंघन का प्रश्न बन जाता है। मतदाता सूची की शुद्धता पर संदेह लोकतंत्र की नींव को कमज़ोर करता है।
संस्थागत निष्क्रियता: न्यायपालिका का 'संयम' या 'संवैधानिक विफलता'?
भारत का सर्वोच्य न्यायालय "संविधान का संरक्षक" और "लोकतंत्र का अंतिम प्रहरी" माना जाता है। इतिहास में अनेक अवसरों पर—1975 के आपातकाल के बाद की बहाली, चुनावी सुधारों (लिली थॉमस मामला), या मौलिक अधिकारों की व्याख्या (केसवानंद भारती)—न्यायपालिका ने लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की है।
किंतु वर्तमान संदर्भ में, जब चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सार्वजनिक अविश्वास इतने व्यापक स्तर पर है, तब सर्वोच्च न्यायालय की प्रतिक्रिया कई विधि विशेषज्ञों और नागरिकों को न्यायिक संयम की बजाय न्यायिक परिहार प्रतीत होती है। उदाहरणार्थ:
- EVM-VVPAT संबंधी याचिकाओं का निपटारा अक्सर तकनीकी आधार पर किया गया है, बिना गहन संवैधानिक विमर्श के।- मतदाता सूची अनियमितताओं के मामलों में न्यायालय ने चुनाव आयोग के आश्वासनों को पर्याप्त माना है।
- चुनाव प्रक्रिया पर व्यापक सार्वजनिक संदेह के बावजूद, सर्वोच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेकर कोई व्यापक जाँच या दिशानिर्देश जारी नहीं किए।
प्रश्न यह उठता है: क्या न्यायिक संयम की सैद्धांतिक सीमाएँ लोकतंत्र की मूलभूत चिंताओं से ऊपर हैं? क्या जब चुनावी प्रक्रिया स्वयं ही संदेह के घेरे में हो, तब न्यायपालिका की निष्क्रियता उसकी संवैधानिक ज़िम्मेदारी के अनुरूप है?
संस्थागत स्वायत्तता का क्षरण: धारणा बनाम वास्तविकता
लोकतंत्र की सफलता केवल कानूनी ढाँचे पर नहीं, बल्कि स्वतंत्र संस्थानों की विश्वसनीयता पर निर्भर करती है। चुनाव आयोग, न्यायपालिका और मीडिया—ये तीनों स्तंभ जनता के विश्वास से ही सशक्त होते हैं। वर्तमान में, इन संस्थानों के संबंध में जनधारणा गंभीर रूप से प्रभावित हुई है:
1.चुनाव आयोग: निर्णय लेने में एकरूपता का अभाव, पदेन आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल, और मीडिया से सीमित संवाद।
2.न्यायपालिका: चुनावी मामलों में हस्तक्षेप करने में अनावश्यक देरी या संकोच।
3.मीडिया: चुनावी प्रक्रिया की गहन पड़ताल के बजाय सतही रिपोर्टिंग।
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि संस्थागत दबाव प्रत्यक्ष नहीं, बल्कि सूक्ष्म होते हैं—पदोन्नति, स्थानांतरण, संसाधनों का आवंटन, या सामाजिक प्रतिष्ठा के माध्यम से। जब जनता को लगने लगे कि संवैधानिक संस्थाएँ राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति अत्यधिक सहानुभूतिशील हैं, तो लोकतंत्र का नैतिक आधार ही कमज़ोर हो जाता है।
अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य: भारतीय लोकतंत्र की वैश्विक छवि
भारत का लोकतंत्र केवल उसके 1.4 अरब नागरिकों के प्रति ही उत्तरदायी नहीं, बल्कि वैश्विक लोकतांत्रिक समुदाय के प्रति भी है। संयुक्त राष्ट्र, इंटर-पार्लियामेंटरी यूनियन, और प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन चुनावी निष्पक्षता को एक मौलिक मानवाधिकार मानते हैं।
पिछले कुछ वर्षों में, अंतरराष्ट्रीय मीडिया और थिंक टैंक्स ने भारत में चुनावी प्रक्रिया, मीडिया की स्वतंत्रता और विपक्ष पर दबाव के बारे में बार-बार प्रश्न उठाए हैं। इन आलोचनाओं को केवल "विदेशी हस्तक्षेप" कहकर खारिज करना समस्या का समाधान नहीं है। वास्तविकता यह है कि भारत की लोकतांत्रिक साख उसकी संप्रभुता का एक अंग है, और उसकी रक्षा करना हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है।
एक रास्ता आगे: संवैधानिक पुनर्स्थापना के लिए ठोस सुझाव
यह विमर्श किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की संवैधानिक अखंडता को सुदृढ़ करने के लिए है। कुछ आवश्यक सुधारात्मक उपाय:
1. EVMs पर पूर्ण विश्वास बहाली:
- 100% VVPAT पर्चों की मैचिंग का पायलट प्रोजेक्ट कम से कम 25 निर्वाचन क्षेत्रों में।
- एक स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय तकनीकी समिति द्वारा EVM के सॉफ़्टवेयर और हार्डवेयर का समय-समय पर ऑडिट।
- चुनाव आयोग द्वारा EVM सुरक्षा प्रोटोकॉल का सार्वजनिक डेमो।
2. मतदाता सूची की संवैधानिक सुरक्षा:
- मतदाता सूची के संशोधन पर न्यायिक पर्यवेक्षण समिति का गठन।
- नाम हटाए जाने पर मतदाता को त्वरित सुनवाई और अपील का अधिकार।
- मतदाता सूची डेटा का ओपन-सोर्स फॉर्मेट में सार्वजनिक उपलब्धता (निजता कानूनों के अधीन)।
3. चुनाव आयोग की संरचनात्मक स्वायत्तता:
- चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए संसदीय समिति द्वारा सहमति अनिवार्य करना।
- चुनाव आयोग के आदेशों के विरुद्ध न्यायिक अपील का प्रावधान।
- चुनाव अधिकारियों के स्थानांतरण/पदोन्नति में पारदर्शिता।
4. सर्वोच्च न्यायालय की सक्रिय भूमिका:
- चुनावी प्रक्रिया से संबंधित महत्वपूर्ण मामलों में त्वरित सुनवाई।
- चुनावी विवादों के लिए विशेष संवैधानिक पीठ का गठन।
- "लोकतांत्रिक मूलभूत ढाँचे" के सिद्धांत के तहत चुनावी प्रक्रिया की समीक्षा।
5. नागरिक समाज की भागीदारी:
- स्वतंत्र नागरिक पर्यवेक्षकों को पूर्ण पहुँच प्रदान करना।
- चुनावी शिकायत निवारण के लिए त्वरित मोबाइल आधारित तंत्र।
- चुनावी साक्षरता को शैक्षिक पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना।
निष्कर्ष:
यह लड़ाई लोकतंत्र की है, सत्ता की नहीं
भारत का लोकतंत्र केवल नियमित चुनाव कराने से नहीं, बल्कि उन चुनावों की निष्पक्षता में नागरिकों के अटूट विश्वास से जीवित रहता है। जब यह विश्वास कमज़ोर होता है, तो लोकतंत्र एक औपचारिकता मात्र रह जाता है—एक खोल बिना सार के।
सर्वोच्च न्यायालय से, जिसे संविधान ने अंतिम संरक्षक बनाया है, अपेक्षा है कि वह इस ऐतिहासिक क्षण की गंभीरता को पहचाने। न्यायिक संयम तब तक एक गुण है जब तक लोकतंत्र का मूलभूत ढाँचा सुरक्षित है। किंतु जब उस ढाँचे पर ही प्रश्नचिह्न लगने लगें, तो न्यायिक हस्तक्षेप संवैधानिक अनिवार्यता बन जाता है।
भारत को केवल "विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र" की उपाधि से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। उसे "विश्व के सबसे मज़बूत, पारदर्शी और विश्वसनीय लोकतंत्र" का लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए। यह केवल संस्थागत सुधारों, न्यायिक साहस और नागरिक जागरूकता के समन्वय से ही संभव है। आज का संकट एक अवसर भी है—भारतीय लोकतंत्र को नई ऊँचाइयों पर ले जाने का, ताकि वह भावी पीढ़ियों के लिए एक जीवंत, सशक्त और न्यायपूर्ण विरासत बन सके।
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