नई दिल्ली | 8 फरवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार
“सीस्मिक मॉनिटरिंग को चकमा देने की कोशिश” — अमेरिकी अधिकारी
थॉमस डी’नैन्नो के अनुसार, चीन ने अपने परमाणु परीक्षणों में ‘डिकपलिंग’ तकनीक का इस्तेमाल किया। यह एक ऐसी विधि है, जिससे परमाणु विस्फोट के भूकंपीय संकेतों को कमजोर किया जाता है, ताकि अंतरराष्ट्रीय निगरानी एजेंसियाँ परीक्षण को आसानी से दर्ज न कर सकें।
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म X पर लिखा कि चीन ने न केवल परमाणु विस्फोटक परीक्षण किए, बल्कि सैकड़ों टन क्षमता (yield) वाले परीक्षणों की तैयारी भी की, जो वैश्विक सुरक्षा के लिहाज़ से अत्यंत चिंताजनक है।
गलवान की पृष्ठभूमि में परमाणु परीक्षण का आरोप
22 जून 2020 का यह कथित परीक्षण उस समय हुआ, जब भारत और चीन के बीच गलवान घाटी में हुए संघर्ष को केवल एक सप्ताह ही बीता था। इस संघर्ष में भारत के 20 जवान शहीद हुए थे, जबकि खुफिया रिपोर्टों के अनुसार 30 से अधिक चीनी सैनिकों की भी मौत हुई थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह दावा सही है, तो यह चीन की सैन्य-रणनीतिक सोच में परमाणु दबाव और शक्ति प्रदर्शन की एक खतरनाक प्रवृत्ति को दर्शाता है।
वैश्विक सुरक्षा ढांचे पर सवाल
डी’नैन्नो ने मौजूदा परमाणु हथियार नियंत्रण व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि आज की वैश्विक परिस्थितियाँ 2010 जैसी नहीं रहीं, जब न्यू स्टार्ट (New START) संधि पर हस्ताक्षर हुए थे।
उनके अनुसार:
-
अमेरिका की लगभग सभी तैनात परमाणु क्षमताएँ न्यू स्टार्ट के दायरे में थीं
-
रूस के विशाल भंडार का केवल एक हिस्सा ही इस संधि के तहत आया
-
चीन का एक भी परमाणु हथियार न्यू स्टार्ट के अंतर्गत नहीं था
यह असंतुलन अब वैश्विक परमाणु स्थिरता के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका है।
अमेरिका की नई रणनीति और “नया परमाणु आर्किटेक्चर”
अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि रूस द्वारा बार-बार संधि उल्लंघन, वैश्विक परमाणु भंडार में तेज़ बढ़ोतरी और न्यू स्टार्ट की खामियों ने अमेरिका को मजबूर किया है कि वह एक नए परमाणु सुरक्षा ढांचे की मांग करे।
उनके शब्दों में,
“आज की दुनिया को ऐसे ढांचे की ज़रूरत है जो वर्तमान खतरों को संबोधित करे, न कि बीते दौर की वास्तविकताओं को।”
ट्रंप के संकेत और परमाणु परीक्षण की वापसी का इशारा
इससे पहले, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी अक्टूबर 2025 में संकेत दे चुके थे कि अमेरिका रूस और चीन के साथ “बराबरी के आधार” पर परमाणु परीक्षण पर विचार कर सकता है। हालांकि, उस समय उन्होंने परीक्षण की प्रकृति या दायरे पर कोई स्पष्ट विवरण नहीं दिया था।
डी’नैन्नो के हालिया बयान को ट्रंप के उन्हीं संकेतों की ठोस और विस्तृत पुष्टि के रूप में देखा जा रहा है।
चीन ने वार्ता से किया इनकार
अमेरिका ने न्यू स्टार्ट संधि की समाप्ति के बाद अमेरिका-रूस-चीन के बीच त्रिपक्षीय परमाणु वार्ता का प्रस्ताव रखा है। लेकिन चीन ने साफ शब्दों में कहा है कि वह “इस चरण में” किसी भी परमाणु निरस्त्रीकरण वार्ता में शामिल नहीं होगा।
विश्लेषकों का मानना है कि चीन का यह रुख वैश्विक शक्ति संतुलन को और अधिक अस्थिर कर सकता है।
भारत के लिए क्या मायने रखता है यह खुलासा?
भारत-चीन सीमा विवाद के संदर्भ में यह दावा बेहद संवेदनशील माना जा रहा है। यदि चीन ने वास्तव में गलवान संघर्ष के तुरंत बाद परमाणु परीक्षण किया, तो यह केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र के लिए रणनीतिक चेतावनी है।
यह खुलासा आने वाले समय में भारत की रक्षा नीति, कूटनीतिक रणनीति और वैश्विक मंचों पर उसकी भूमिका को भी प्रभावित कर सकता है।
निष्कर्ष:-
गलवान संघर्ष के साए में चीन द्वारा कथित परमाणु परीक्षण का यह आरोप वैश्विक राजनीति और सुरक्षा व्यवस्था के लिए एक गंभीर मोड़ साबित हो सकता है। अमेरिका के इस खुलासे ने न केवल चीन की सैन्य नीतियों पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि यह भी साफ कर दिया है कि परमाणु हथियारों का युग अभी समाप्त नहीं हुआ है—बल्कि और अधिक जटिल होता जा रहा है।
