भारत और अमेरिका के बीच हाल में संपन्न हुए रणनीतिक समझौते को लेकर देश के राजनीतिक, कूटनीतिक और बौद्धिक गलियारों में असहजता लगातार बढ़ती जा रही है। पूर्व विदेश नीति विशेषज्ञों, विपक्षी दलों और यहां तक कि सरकार के प्रति सामान्यतः नरम रुख रखने वाले मीडिया के एक हिस्से का भी यह मानना है कि यह समझौता भारत के दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों के अनुरूप नहीं है, बल्कि इसे अमेरिकी राजनीतिक दबाव, विशेष रूप से पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रभाव में लिया गया निर्णय माना जा रहा है।
विश्लेषकों का कहना है कि यह समझौता भारत की उस पारंपरिक विदेश नीति से अलग दिखाई देता है, जो अब तक रणनीतिक स्वायत्तता, संतुलन और बहुपक्षीयता पर आधारित रही है। इस बार, आलोचकों के अनुसार, भारत ने अपने मजबूत कूटनीतिक रुख के बजाय रक्षात्मक स्थिति से बातचीत की।
विदेश नीति विशेषज्ञों की राय: रणनीतिक स्वायत्तता पर असर
कई पूर्व राजनयिकों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञों का कहना है कि यह समझौता भारत की बर्गेनिंग पावर को कमजोर करता नजर आता है।
उनके अनुसार, किसी भी वैश्विक शक्ति के साथ समझौता तभी संतुलित माना जा सकता है, जब उसमें दोनों पक्षों के लाभ स्पष्ट और समान रूप से परिलक्षित हों। मौजूदा समझौते में, विशेषज्ञों को भारत के लिए ऐसे ठोस और दीर्घकालिक लाभ स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं दे रहे हैं, जबकि अमेरिका को रणनीतिक और भू-राजनीतिक बढ़त मिलती प्रतीत हो रही है।
एक वरिष्ठ विदेश नीति विश्लेषक का कहना है,
“यह समझौता उस भारत की छवि से मेल नहीं खाता, जो खुद को एक स्वतंत्र वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है। इसमें जल्दबाज़ी और दबाव के संकेत दिखाई देते हैं।”
विपक्ष का आरोप: ‘डर और दबाव में लिया गया फैसला’
विपक्षी दलों ने इस समझौते को लेकर सरकार पर तीखा हमला बोला है। उनका आरोप है कि यह निर्णय राष्ट्रीय हितों की अनदेखी करते हुए भय और अंतरराष्ट्रीय दबाव के माहौल में लिया गया।
विपक्ष का दावा है कि एप्सटीन फाइल्स से जुड़े अंतरराष्ट्रीय खुलासों और अडानी समूह से संबंधित संभावित कानूनी व राजनीतिक जोखिमों ने सरकार को अमेरिका के सामने नरम रुख अपनाने के लिए विवश किया।
विपक्षी नेताओं का कहना है कि यह समझौता किसी सुविचारित रणनीति का परिणाम नहीं, बल्कि राजनीतिक असुरक्षा से उपजा निर्णय प्रतीत होता है।
एक वरिष्ठ विपक्षी नेता ने कहा,
“यह सौदा भारत की जरूरतों से नहीं, बल्कि नेतृत्व की मजबूरी से प्रेरित लगता है। देशहित से ज्यादा व्यक्तिगत और राजनीतिक दबाव इसमें झलकते हैं।”
सरकार समर्थक माने जाने वाले विश्लेषकों में भी असंतोष
इस पूरे विवाद में सबसे उल्लेखनीय पहलू यह है कि आलोचना केवल विपक्ष तक सीमित नहीं रही। कुछ ऐसे विश्लेषक और मीडिया मंच, जिन्हें आमतौर पर सरकार समर्थक माना जाता है, उन्होंने भी इस समझौते के कई प्रावधानों पर सवाल उठाए हैं।
इन विश्लेषकों का कहना है कि समझौते के आर्थिक, सामरिक और कूटनीतिक लाभों को लेकर सरकार की ओर से अब तक कोई स्पष्ट रोडमैप सामने नहीं आया है। इससे यह आशंका गहराती है कि भारत ने अमेरिका को अपेक्षाकृत अधिक रियायतें दी हैं, जबकि बदले में मिलने वाले लाभ अस्पष्ट हैं।
मीडिया और सार्वजनिक विमर्श में बढ़ती बेचैनी
राष्ट्रीय मीडिया और नीति-विश्लेषण मंचों पर इस समझौते को लेकर बहस तेज हो चुकी है। कई संपादकीय लेखों और चर्चाओं में यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या भारत ने इस बार स्वतंत्र निर्णय लेने की अपनी परंपरा से समझौता किया है।
कुछ टिप्पणीकारों का कहना है कि यह निर्णय आने वाले वर्षों में भारत की विदेश नीति को अधिक निर्भर और प्रतिक्रियात्मक बना सकता है, जो एक उभरती वैश्विक शक्ति के लिए चिंताजनक संकेत है।
सरकार की ओर से स्पष्ट जवाब का अभाव
अब तक सरकार की ओर से इन सभी आरोपों और आशंकाओं पर कोई विस्तृत और ठोस स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। न ही यह स्पष्ट किया गया है कि इस समझौते से भारत को रणनीतिक, सुरक्षा या आर्थिक स्तर पर कौन से ठोस और मापनीय लाभ प्राप्त होंगे।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक सरकार इस समझौते की शर्तों और इसके दूरगामी प्रभावों पर पारदर्शी तरीके से जवाब नहीं देती, तब तक यह विवाद शांत होने की संभावना कम है।
निष्कर्ष:-
कूटनीतिक समझौता या दबाव में लिया गया निर्णय?
कुल मिलाकर, भारत–अमेरिका के बीच हुआ यह समझौता अब केवल एक द्विपक्षीय कूटनीतिक दस्तावेज नहीं रह गया है। यह देश की विदेश नीति की दिशा, निर्णय प्रक्रिया और राजनीतिक नेतृत्व की प्राथमिकताओं पर एक बड़ी बहस का केंद्र बन चुका है।
आलोचकों के अनुसार, यह समझौता भारत की स्वतंत्र और आत्मविश्वासी वैश्विक छवि को मजबूत करने के बजाय उसे कमजोर करता प्रतीत होता है।
उनका मानना है कि यदि फैसले डर, दबाव या राजनीतिक असुरक्षा में लिए जाते हैं, तो उसकी कीमत अंततः देश को दीर्घकाल में चुकानी पड़ती है।