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स्वर्गीय ख़लीलुर्रहमान ख़ान की याद में संभल में सजी अदब की महफ़िल

 सम्भल। 5 फरवरी 2026  |✍🏻 Z S Razzaqi | वरिष्ठ पत्रकार   

शायरी, शख़्सियत और स्मृतियों से सराबोर रहा भव्य मुशायरा

उर्दू अदब की रवायत, संवेदनशीलता और सामाजिक चेतना को समर्पित एक यादगार शाम उस समय सजी, जब स्वर्गीय ख़लीलुर्रहमान ख़ान की स्मृति में एक शानदार और भावनात्मक मुशायरे का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम न सिर्फ़ एक साहित्यिक आयोजन था, बल्कि उस शख़्सियत को श्रद्धांजलि भी, जिसने अपने जीवन में उर्दू ज़बान, शायरी और सामाजिक सौहार्द को मज़बूत करने में अहम भूमिका निभाई।

इस भव्य मुशायरे का आयोजन उत्तर प्रदेश उर्दू अकेडमी और आयेशा विकास समिति के तत्वाधान में किया गया, जिसमें शहर के अलावा दूर-दराज़ के इलाक़ों से आए शायरों, साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों और अदब-परस्त श्रोताओं ने बड़ी संख्या में शिरकत की। कार्यक्रम स्थल पर मौजूद हर व्यक्ति इस एहसास के साथ बैठा था कि वह सिर्फ़ शायरी नहीं सुन रहा, बल्कि उर्दू अदब की ज़िंदा परंपरा का हिस्सा बन रहा है।

अध्यक्षता और संचालन ने बढ़ाई गरिमा

मुशायरे की अध्यक्षता प्रसिद्ध शायर और साहित्यकार ज़हीर अहमद ने की। अपने विचारों में उन्होंने स्वर्गीय ख़लीलुर्रहमान ख़ान के साहित्यिक योगदान को याद करते हुए कहा कि वे सिर्फ़ एक शायर या आयोजक नहीं थे, बल्कि उर्दू अदब के सच्चे संरक्षक थे।

मंच पर मौजूद सभी मुख्य अतिथि एवं गड़मानिये 

मंच संचालन का दायित्व वरिष्ठ शायर सैयद हाशिम मुरादाबादी ने निभाया, जिन्होंने अपने संतुलित, शालीन और प्रभावी संचालन से पूरे कार्यक्रम को एक लय में बाँधे रखा।

मुख्य और विशिष्ट अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राकेश कुमार वशिष्ट (पूर्व महासचिव बार एसोसिएशन एंड लाइब्रेरी ) रहे। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि साहित्य और शायरी समाज को सोचने, जोड़ने और बेहतर बनाने का काम करती है, और ऐसे आयोजन सामाजिक एकता के लिए बेहद ज़रूरी हैं।मुशायरे के संरक्षक पूर्व मंत्री श्री अकील उर रेहमान खान व  मैनेजर श्री नाज़िरखान रहे ,इस मौके पर पूर्व चेयर पर्सन श्रीमती तरन्नुम अक़ील जी ने ख़लील उर रेहमान खान की मशहूर हिंदी कविता "होली" सुनाई जिसने श्रोताओं को भाव विभोर करदिया इसके अलावा अनेक विशिष्ट अतिथियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और साहित्यप्रेमियों की उपस्थिति ने आयोजन की गरिमा को और बढ़ा दिया।

शायरी ने रच दिया जादू

मुशायरे में प्रस्तुत शायरी ने ज़िंदगी, समाज, मोहब्बत, दर्द, उम्मीद और समकालीन हालात को बेहद असरदार ढंग से सामने रखा। शायरों के अशआर पर बार-बार दाद, तालियाँ और “वाह-वाह” की गूंज सुनाई देती रही।
श्रोताओं की तवज्जो आख़िरी शेर तक बनी रही, जो इस बात का प्रमाण थी कि पेश की गई शायरी दिल और दिमाग—दोनों पर असर कर रही थी।

मुशायरे में मौजूद रहे शायर एवं पत्रकार 

इस मुशायरे में जिन शायरों ने अपने कलाम से ख़ास पहचान छोड़ी, उनमें
हमीद क़ासमी, मीर शाह हुसैन आरिफ, डॉ. शाक़िर हुसैन इस्लाही,तारिक़ लखनवी,बुज़ुर्ग शायर सुल्तान कलीम खान, जावेद साहब, इमरान आज़मी, आसिफ़ ज़हीरी, नसीम मुज़फ़्फ़र, अकबर आबदी सहित कई वरिष्ठ और उभरते शायर शामिल रहे। हर शायर का अंदाज़ अलग था, लेकिन मक़सद एक—उर्दू शायरी की रूह को ज़िंदा रखना।

सम्मान समारोह और श्रद्धांजलि

कार्यक्रम के अंतिम चरण में आयोजकों की ओर से सभी अतिथियों और शायरों को स्मृति-चिह्न भेंट कर सम्मानित किया गया। स्वर्गीय ख़लीलुर्रहमान ख़ान को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि उनका नाम उर्दू अदब के इतिहास में हमेशा इज़्ज़त के साथ लिया जाएगा।

स्मति चिन्ह देते हुए मुशायरे के मैनेजर श्री नाज़िर खान जी, प्राप्त करते हुए श्रीमिति तरन्नुम अकील व अन्य 

उर्दू अदब की रौशनी से रोशन रहा सम्भल

यह मुशायरा महज़ एक रस्मी या औपचारिक आयोजन भर नहीं था, बल्कि यह उस सच्चाई की ज़िंदा और मुखर मिसाल बनकर सामने आया कि उर्दू ज़बान और उसकी शायरी आज भी लोगों के दिलों में पूरी शिद्दत, एहसास और आत्मीयता के साथ ज़िंदा है। सम्भल की इस अदबी शाम ने यह साबित कर दिया कि जब शायरी शब्दों की सजावट तक सीमित न होकर इंसानी जज़्बात, सामाजिक सरोकार और ज़मीन से जुड़ी सच्चाइयों को अपने भीतर समेट लेती है, तो वह सिर्फ़ सुनी नहीं जाती—महसूस की जाती है।

श्रोताओं की मोहक तस्वीर 

इस महफ़िल में पेश किए गए अशआर और नज़्में न सिर्फ़ तालियों और दाद की हक़दार बनीं, बल्कि उन्होंने श्रोताओं के ज़ेहन में गहरी छाप छोड़ी। यह आयोजन इस बात का गवाह रहा कि सच्चे जज़्बात से निकले हुए शब्द वक़्त की सीमाओं को पार कर पीढ़ियों तक असर छोड़ते हैं। सम्भल की यह अदबी महफ़िल उर्दू अदब की उस रौशन परंपरा का प्रतीक बन गई, जो हर दौर में नए सिरे से सांस लेती है और समाज को सोचने, समझने और जोड़ने का काम करती है।



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