विश्लेषणात्मक विशेष रिपोर्ट | अंतरराष्ट्रीय राजनीति |7 फरवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | वरिष्ठ पत्रकार
डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर लगाए गए अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ़ को हटाने का हालिया फैसला पहली नज़र में राहत जैसा लगता है, लेकिन इसके पीछे की शर्तें और घटनाक्रम इस पूरी ब्रांडिंग की हवा निकालते नज़र आते हैं।
टैरिफ़ हटे, लेकिन भारत ने क्या-क्या गंवाया?
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा हस्ताक्षरित कार्यकारी आदेश में साफ़ लिखा है कि भारत ने यह प्रतिबद्धता जताई है कि वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रूस से तेल आयात बंद करेगा। यही नहीं, भारत ने अमेरिकी ऊर्जा उत्पादों की बड़े पैमाने पर खरीद, रक्षा सहयोग के अगले दस वर्षों के ढांचे और दीर्घकालिक व्यापार समझौतों पर भी सहमति जताई है।
यहां सवाल सिर्फ़ टैरिफ़ घटने का नहीं है। असली सवाल यह है कि—
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क्या भारत ने यह फैसला अपने रणनीतिक हितों के अनुसार लिया?
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या यह अमेरिकी दबाव में किया गया समझौता है?
रूसी तेल भारत के लिए सस्ता, सुलभ और रणनीतिक रूप से उपयोगी रहा है। इसी तेल ने बीते वर्षों में महंगाई को आंशिक रूप से नियंत्रित रखा और ऊर्जा सुरक्षा को सहारा दिया। अब जब भारत ने इस रास्ते से हटने का वादा किया है, तो इसका सीधा असर आम उपभोक्ता, उद्योग और आर्थिक संतुलन पर पड़ेगा।
विदेश नीति: स्वतंत्रता या अधीनता?
भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी पहचान दशकों तक रणनीतिक स्वायत्तता रही है। अमेरिका, रूस, यूरोप और एशिया—सबसे संतुलित रिश्ते रखना भारत की ताक़त थी। लेकिन ट्रंप प्रशासन के साथ हालिया घटनाक्रम यह संकेत देते हैं कि यह संतुलन अब धीरे-धीरे एकतरफा झुकाव में बदल रहा है।
ट्रंप बार-बार सार्वजनिक मंचों से भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर बयान देते हैं। वे यह तक कहते हैं कि मोदी ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से रूस से तेल न खरीदने का वादा किया। सवाल यह है कि—
क्या भारत जैसे संप्रभु देश की विदेश नीति अब निजी वादों और सार्वजनिक अमेरिकी बयानों से तय होगी?
और उससे भी बड़ा सवाल—
क्या भारत का नेतृत्व कभी इन बयानों को सार्वजनिक रूप से चुनौती देगा?
‘दोस्ती’ का भ्रम और असमान ताक़त का रिश्ता
डोनाल्ड ट्रंप प्रधानमंत्री मोदी को “अपने सबसे अच्छे दोस्तों” में से एक बताते हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में दोस्ती नहीं, हित और दबाव काम करते हैं। ट्रंप का व्यवहार यह दिखाता है कि इस रिश्ते में बराबरी नहीं है।
टैरिफ़ बढ़ाना, फिर घटाना
शर्तें थोपना, फिर उसे “डील” कहना
और भारत की तरफ़ से लगभग हर बार चुप्पी
यह सब एक ऐसे रिश्ते की ओर इशारा करता है, जहां निर्णय एक तरफ़ से लिए जा रहे हैं और दूसरी तरफ़ से स्वीकार किए जा रहे हैं।
500 अरब डॉलर की खरीद: दूरदर्शिता या मजबूरी?
अमेरिका से अगले पाँच वर्षों में लगभग 500 अरब डॉलर के ऊर्जा उत्पाद, विमान, टेक्नोलॉजी और कोकिंग कोल खरीदने की योजना को सरकार रणनीतिक साझेदारी बता सकती है। लेकिन आर्थिक विशेषज्ञों के लिए यह चिंता का विषय है।
भारत पहले से—
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व्यापार घाटे
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घरेलू उद्योगों पर दबाव
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रोज़गार संकट
जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे में इतनी बड़ी आयात प्रतिबद्धता क्या वाकई आर्थिक विवेक का फैसला है, या यह अंतरराष्ट्रीय दबाव में उठाया गया कदम?
पढ़ा-लिखा वर्ग और उसकी खामोशी
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे विडंबनापूर्ण पहलू यह है कि वह वर्ग, जो कभी कांग्रेस सरकार की मामूली कूटनीतिक घटनाओं पर उबल पड़ता था, आज लगभग पूरी तरह शांत है।
आज न सवाल हैं,
न बहस,
न नैतिक आक्रोश।
शायद इसलिए क्योंकि आज सवाल सत्ता से पूछे जाने हैं, विपक्ष से नहीं।
छवि बनाम वास्तविकता
यह प्रकरण साफ़ दिखाता है कि प्रचार से बनी छवियाँ अंतरराष्ट्रीय राजनीति में टिकती नहीं हैं। अगर भारत सचमुच एक मज़बूत वैश्विक शक्ति है, तो उसे अमेरिका सहित हर देश से बराबरी की भाषा में बात करनी होगी।
विश्वगुरु होने का मतलब है—
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दबाव में न झुकना
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अपने निर्णय खुद लेना
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और ज़रूरत पड़ने पर सबसे ताक़तवर देश को भी “न” कहने का साहस रखना
अगर यह साहस नहीं है, तो फिर बची हुई चीज़ सिर्फ़ एक अच्छी तरह पैक की गई छवि है—हकीकत नहीं।
निष्कर्ष:
सवाल जो टाले नहीं जा सकते
ट्रंप द्वारा टैरिफ़ हटाने की खबर राहत से ज़्यादा चेतावनी है। यह चेतावनी है कि भारत की विदेश नीति किस दिशा में जा रही है, और यह सवाल भी कि क्या देश की गरिमा और स्वायत्तता छवि-निर्माण की भेंट चढ़ रही है।
