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अमेरिका–ईरान कूटनीति की परीक्षा: क्या बातचीत की यह सीमित खिड़की टकराव को रोक पाएगी?

 विश्लेषणात्मक विशेष रिपोर्ट | अंतरराष्ट्रीय राजनीति | फरवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | वरिष्ठ पत्रकार 

तेहरान में इस समय माहौल बदला-बदला सा है। सवाल अब यह नहीं रह गया है कि अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीति शुरू हुई है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या यह बातचीत इतनी तेज़, गंभीर और ठोस साबित होगी कि सैन्य टकराव की आशंका को स्थायी रूप से पीछे धकेल सके। 2026 की शुरुआत में खाड़ी क्षेत्र जिस तनावपूर्ण दौर से गुजर रहा है, उसमें कूटनीति के लिए समय बेहद सीमित माना जा रहा है।

ईरानी सत्ता प्रतिष्ठान के भीतर यह भावना मज़बूत होती जा रही है कि यदि राजनीतिक संवाद ने जल्द ठोस आकार नहीं लिया, तो हालात हाथ से निकल सकते हैं। इसी पृष्ठभूमि में ईरान और अमेरिका के बीच प्रस्तावित वार्ता को बेहद निर्णायक माना जा रहा है।


ओमान में प्रस्तावित बातचीत: उम्मीद और आशंका के बीच संतुलन

ईरान के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, अमेरिका-ईरान वार्ता का अगला दौर इसी सप्ताह ओमान में आयोजित किया जाना तय माना जा रहा है। ओमान पहले भी तेहरान और वॉशिंगटन के बीच “शांत मध्यस्थ” की भूमिका निभा चुका है, इसलिए यह स्थान दोनों पक्षों को अपेक्षाकृत सुरक्षित और गोपनीय मंच प्रदान करता है।

हालांकि, इस बातचीत में फिलहाल किसी भी अन्य क्षेत्रीय देश को शामिल नहीं किया जा रहा है। यह फैसला कई हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है, लेकिन ईरान का तर्क स्पष्ट है।


क्षेत्रीय देशों को फिलहाल बाहर रखने की ईरानी रणनीति

ईरानी अधिकारियों के अनुसार, इस चरण पर बहुत अधिक देशों की भागीदारी वार्ता को प्रभावी बनाने के बजाय उसे राजनीतिक प्रदर्शन में बदल सकती है। तेहरान को आशंका है कि ज्यादा पक्षों की मौजूदगी से मूल मुद्दों पर फोकस कमजोर पड़ जाएगा और बातचीत ठोस नतीजों के बजाय बयानबाज़ी तक सीमित रह जाएगी।

ईरान की प्राथमिकता यह है कि पहले अमेरिका के साथ द्विपक्षीय बातचीत का ढांचा स्थिर हो, न्यूनतम विश्वास बहाल हो और यह स्पष्ट हो जाए कि संवाद वास्तव में आगे बढ़ सकता है। इसके बाद ही क्षेत्रीय शक्तियों को शामिल करने पर विचार किया जाएगा।


मध्यस्थ देशों की सोच: गारंटर बनने की तैयारी

इसके उलट, खाड़ी और क्षेत्र के कुछ अहम देश इस पूरी प्रक्रिया को अलग नज़रिये से देख रहे हैं। वे खुद को अभी वार्ता के संचालक के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य में किसी भी समझौते के “गारंटर” के रूप में देख रहे हैं।

इन देशों के लिए अमेरिका-ईरान टकराव केवल दो राष्ट्रों का मामला नहीं है। किसी भी सैन्य संघर्ष की स्थिति में सबसे पहले अस्थिरता, तेल आपूर्ति पर असर और सुरक्षा संकट इन्हीं देशों को झेलना पड़ेगा। यही कारण है कि वे तनाव कम करने और टकराव रोकने में प्रत्यक्ष रणनीतिक हित रखते हैं।


2015 बनाम 2026: बदली हुई वैश्विक और क्षेत्रीय तस्वीर

2015 का परमाणु समझौता मुख्य रूप से हथियार नियंत्रण और प्रतिबंधों के इर्द-गिर्द घूमता था। तब हालात अपेक्षाकृत नियंत्रित थे और सैन्य टकराव की आशंका सीमित मानी जाती थी।

लेकिन 2026 में तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। आज का संकट केवल परमाणु कार्यक्रम तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें बैलिस्टिक मिसाइलें, ड्रोन, क्षेत्रीय प्रभाव, समुद्री सुरक्षा और प्रतिरोधक रणनीतियाँ भी शामिल हैं। क्षेत्रीय देश अब हाशिए पर खड़े दर्शक नहीं, बल्कि संभावित नुकसान के सीधे भागीदार बन चुके हैं।


तेज़ हुई ईरानी कूटनीति: मॉस्को से इस्तांबुल और तेहरान तक

बीते कुछ दिनों में ईरान ने अपनी कूटनीतिक गतिविधियों को असाधारण रूप से तेज़ किया है।
ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रमुख अली लारीजानी ने 30 जून को मॉस्को जाकर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की। इस मुलाकात को अमेरिका को एक स्पष्ट संदेश के तौर पर भी देखा गया कि तेहरान के पास रणनीतिक विकल्प मौजूद हैं।

इसके बाद ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने इस्तांबुल में अहम क्षेत्रीय नेताओं के साथ विचार-विमर्श किया। इन बैठकों का उद्देश्य संभावित समझौते के लिए समर्थन जुटाना और क्षेत्रीय चिंताओं को समझना था।

इसी क्रम में क़तर के प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल थानी का तेहरान दौरा हुआ। इसके तुरंत बाद अली लारीजानी ने संकेत दिया कि एक “संरचित और व्यवस्थित वार्ता ढांचा” आकार ले रहा है।


आंशिक नहीं, व्यापक समझौते की तैयारी

सूत्रों के अनुसार, इस बार की कोशिशें किसी अस्थायी या सीमित समझौते तक सिमटी नहीं हैं। इसके बजाय एक ऐसे रोडमैप पर काम हो रहा है जो दीर्घकालिक और व्यापक समाधान की ओर ले जाए।

ईरान की मंशा स्पष्ट है—वह ऐसा समझौता नहीं चाहता जो केवल कुछ महीनों या किसी एक अमेरिकी राष्ट्रपति के कार्यकाल तक टिके। 2018 में अमेरिका के JCPOA से हटने का अनुभव अब भी ईरानी नेतृत्व के मन में गहरा है।


ट्रंप का बयान और अमेरिकी ‘रणनीतिक अस्पष्टता’

वॉशिंगटन, हालांकि, पूरी तरह पत्ते नहीं खोल रहा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का हालिया बयान—“ईरान हमसे बात कर रहा है, देखते हैं कुछ बनता है या नहीं, वरना फिर आगे जो होगा, वह होगा”—कूटनीति और दबाव का मिला-जुला संकेत देता है।

विश्लेषकों के मुताबिक, अमेरिका जानबूझकर अनिश्चितता बनाए रखना चाहता है ताकि बातचीत में अधिकतम दबाव बनाए रखा जा सके। यह रणनीतिक अस्पष्टता वॉशिंगटन की सौदेबाज़ी की ताकत को बढ़ाती है।


क्या युद्ध का खतरा टल गया है?

फिलहाल युद्ध की आशंका पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, लेकिन वह कुछ हद तक पीछे जरूर हटी है। ईरान के अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम भंडार को कम करने या स्थानांतरित करने जैसे कदम तनाव घटाने में मदद कर सकते हैं, लेकिन वे मूल विवादों का समाधान नहीं हैं।

असल टकराव अब भी ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम, उसकी क्षेत्रीय प्रतिरोधक नीति और अमेरिका की दीर्घकालिक सुरक्षा चिंताओं को लेकर बना हुआ है।


असली मोलभाव कहाँ है?

अब साफ़ हो चुका है कि बातचीत का केंद्र क्या होगा।
अमेरिका केवल जोखिम प्रबंधन वाला समझौता नहीं चाहता, जबकि ईरान किसी अस्थायी या आसानी से पलटे जा सकने वाले करार के लिए तैयार नहीं है। दोनों पक्ष यह परख रहे हैं कि क्या स्थायी सुरक्षा गारंटियों के बदले गहरी संरचनात्मक रियायतें दी जा सकती हैं।

यही वह बिंदु है जहाँ वास्तविक और कठिन बातचीत होनी है। बाकी सब—स्थान, प्रारूप और भागीदारी—द्वितीयक मुद्दे हैं।


निष्कर्ष:

 खुली खिड़की, लेकिन समय बेहद कम

फिलहाल कूटनीति चल रही है, बंदूकें खामोश हैं और युद्ध टला हुआ है। लेकिन यह स्थिति स्थायी नहीं है। बातचीत की खिड़की खुली जरूर है, पर बेहद संकरी है।

यह तय आने वाले दिनों में होगा कि क्या अमेरिका और ईरान इस मौके को ठोस समझौते में बदल पाते हैं, या फिर यह अवसर भी अतीत की तरह इतिहास के पन्नों में खो जाएगा।
दुनिया की निगाहें अब ओमान की उस मेज़ पर टिकी हैं, जहाँ शायद युद्ध और शांति के बीच की रेखा खींची जानी है।





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