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West Bengal SIR पर सुप्रीम कोर्ट में आमने-सामने ममता बनर्जी और चुनाव आयोग, लोकतंत्र पर बड़ा सवाल

 नई दिल्ली।2 फरवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | वरिष्ठ पत्रकार      

पश्चिम बंगाल में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को लेकर उठे विवाद ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में एक अहम मोड़ ले लिया, जब राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं अदालत में उपस्थित होकर चुनाव आयोग की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका पर अपनी बात रखती नजर आईं। मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया।

ममता बनर्जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पश्चिम बंगाल में लागू की जा रही SIR प्रक्रिया पारदर्शिता से रहित, जल्दबाज़ी में की गई और संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है, जिसके चलते लाखों वास्तविक मतदाताओं के मताधिकार पर खतरा पैदा हो गया है। उन्होंने इसे केवल एक प्रशासनिक कवायद नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक ढांचे पर सीधा प्रहार करार दिया।

“58 लाख नाम हटाए गए, अपील का मौका तक नहीं” — ममता बनर्जी

मुख्यमंत्री ने अदालत को बताया कि राज्य में करीब 58 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए, जिनमें से अधिकांश को अपील या आपत्ति दर्ज कराने का अवसर तक नहीं मिला। उन्होंने आरोप लगाया कि यह प्रक्रिया विशेष रूप से चुनाव से ठीक पहले लागू की गई, जिससे इसकी मंशा पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

ममता बनर्जी ने यह भी कहा कि जिन लोगों को “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी (LD)” की श्रेणी में डाला गया, उनकी सूची अब तक सार्वजनिक पोर्टल पर अपलोड नहीं की गई, जबकि अदालत पहले ही ऐसा करने के निर्देश दे चुकी थी। इससे प्रभावित मतदाताओं को न तो जानकारी मिली और न ही जवाब देने का प्रभावी अवसर।

महिलाओं और गरीब तबकों पर असमान असर का आरोप

मुख्यमंत्री ने विशेष रूप से महिलाओं और प्रवासी श्रमिकों के मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि विवाह के बाद नाम या उपनाम बदलने, या रोज़गार के कारण स्थान परिवर्तन करने जैसे सामान्य सामाजिक कारणों को भी “डिस्क्रेपेंसी” बताकर नाम काट दिए गए।
उन्होंने कहा, “ऐसी महिलाएं, जो ससुराल गईं, उनके नाम सिर्फ़ इसलिए हटा दिए गए क्योंकि उपनाम बदला — यह न केवल असंवेदनशील है बल्कि महिला विरोधी भी है।”

माइक्रो ऑब्ज़र्वर्स पर गंभीर सवाल

ममता बनर्जी ने अदालत को बताया कि बड़ी संख्या में माइक्रो ऑब्ज़र्वर्स, जिनमें कई अन्य राज्यों से नियुक्त किए गए हैं, को ऐसी शक्तियां दी गईं जो वैधानिक रूप से इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) के अधिकार क्षेत्र में आती हैं।
उनका आरोप था कि ये माइक्रो ऑब्ज़र्वर्स कार्यालय में बैठे-बैठे नाम हटाने का निर्णय ले रहे हैं, जबकि ज़मीनी स्तर पर BLO और स्थानीय अधिकारियों को दरकिनार किया जा रहा है।

CJI की टिप्पणी: “वास्तविक मतदाता बाहर नहीं होने चाहिए”

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि अदालत का प्राथमिक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी वास्तविक और योग्य मतदाता मतदाता सूची से बाहर न हो। उन्होंने माना कि स्थानीय भाषा, सामाजिक परिस्थितियों और तकनीकी सहायता (AI आधारित टूल्स) के कारण भी त्रुटियां संभव हैं, जिनका समाधान निकालना ज़रूरी है।

पीठ ने यह भी संकेत दिया कि माइक्रो ऑब्ज़र्वर्स की भूमिका सीमित की जा सकती है और दस्तावेज़ों पर अधिकृत BLO के हस्ताक्षर अनिवार्य किए जाएंगे। अदालत ने मामले को अन्य संबंधित याचिकाओं के साथ सोमवार को फिर से सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।


पुरानी मतदाता सूची से चुनाव कराने की मांग

ममता बनर्जी ने अदालत से आग्रह किया कि जब तक SIR प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और भरोसेमंद नहीं बनती, तब तक पिछले वर्ष तैयार की गई मौजूदा मतदाता सूची के आधार पर ही चुनाव कराए जाएं। उनका कहना था कि लोकतंत्र में चुनाव प्रक्रिया का भरोसा सबसे अहम है, और किसी भी प्रशासनिक प्रयोग की कीमत आम नागरिक नहीं चुका सकता।

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