नई दिल्ली | 26 फरवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार
कांग्रेस महासचिव (संचार) जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री के वक्तव्य पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि भारत की विदेश नीति ऐतिहासिक रूप से संतुलन, संवाद और मानवीय मूल्यों पर आधारित रही है। उनके अनुसार, भारत की पहचान एक ऐसे राष्ट्र की रही है जो जटिल अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में न्यायपूर्ण और टिकाऊ समाधान की वकालत करता है।
Knesset में प्रधानमंत्री का संदेश: आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता
प्रधानमंत्री मोदी ने 25 फरवरी 2026 को Knesset को संबोधित करते हुए क्षेत्रीय शांति प्रयासों का उल्लेख किया और “आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक एकता” पर बल दिया। उन्होंने कहा कि:
“आतंकवाद कहीं भी हो, शांति के लिए खतरा है। कोई भी कारण निर्दोष नागरिकों की हत्या को उचित नहीं ठहरा सकता।”
प्रधानमंत्री ने 7 अक्टूबर 2023 को हुए हमास के हमलों में मारे गए लोगों के प्रति संवेदना भी व्यक्त की और आतंकवाद के प्रति भारत की “शून्य-सहिष्णुता” नीति दोहराई। उन्होंने क्षेत्र में “न्यायसंगत और स्थायी शांति” की आवश्यकता पर जोर दिया।
कांग्रेस की आपत्ति: “नैतिक संतुलन” का प्रश्न
कांग्रेस का तर्क है कि भारत की विदेश नीति लंबे समय से बहुपक्षीय संवाद, अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवीय सरोकारों के बीच संतुलन पर आधारित रही है। पार्टी नेताओं के अनुसार, किसी भी पक्ष के प्रति अत्यधिक झुकाव भारत की ऐतिहासिक भूमिका के विपरीत माना जा सकता है।
जयराम रमेश ने अपने बयान में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री Jawaharlal Nehru का संदर्भ देते हुए 1947 के एक पत्राचार को याद किया। उन्होंने कहा कि नेहरू ने उस दौर में यह स्वीकार किया था कि पश्चिम एशिया का प्रश्न अत्यंत जटिल और भावनात्मक है, जिसमें सभी पक्षों के प्रति सहानुभूति और न्यायसंगत समाधान आवश्यक है।
नेहरू-आइंस्टीन पत्राचार का उल्लेख
कांग्रेस नेता ने 1947 में Albert Einstein और जवाहरलाल नेहरू के बीच हुए पत्राचार का हवाला देते हुए कहा कि नेहरू ने अपने उत्तर में यह स्पष्ट किया था कि:
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समस्या बहुआयामी है और दोनों पक्षों की चिंताओं को समझना आवश्यक है
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स्थायी समाधान संवाद और सहमति से ही संभव है
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संघर्ष की जड़ें औपनिवेशिक नीतियों और राजनीतिक असंतुलन से भी जुड़ी रही हैं
कांग्रेस का दावा है कि यह ऐतिहासिक दृष्टिकोण भारत की विदेश नीति के “नैतिक संतुलन” को दर्शाता है।
इज़रायली मानवाधिकार कार्यकर्ता की टिप्पणी का हवाला
जयराम रमेश ने अपने सार्वजनिक वक्तव्य में एक इज़रायली मानवाधिकार वकील की आलोचनात्मक टिप्पणियों का भी उल्लेख किया, जिसमें प्रधानमंत्री के संबोधन पर असहमति जताई गई थी। कांग्रेस का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विविध प्रतिक्रियाएँ यह संकेत देती हैं कि पश्चिम एशिया जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भाषणों और कूटनीतिक संकेतों का व्यापक प्रभाव पड़ता है।
विदेश नीति और घरेलू राजनीति का संगम
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विदेश नीति से जुड़े वक्तव्य अक्सर घरेलू राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन जाते हैं। भारत-इज़रायल संबंध हाल के वर्षों में रणनीतिक, तकनीकी और सुरक्षा सहयोग के कारण मज़बूत हुए हैं, जबकि भारत ने परंपरागत रूप से फ़िलिस्तीनी मुद्दे पर भी समर्थन व्यक्त किया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत की चुनौती यह है कि वह अपने दीर्घकालिक रणनीतिक हितों, क्षेत्रीय स्थिरता और मानवीय मूल्यों के बीच संतुलन बनाए रखे।
निष्कर्ष:-
प्रधानमंत्री मोदी का Knesset संबोधन भारत-इज़रायल संबंधों के संदर्भ में महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटना के रूप में देखा जा रहा है। वहीं, कांग्रेस की आलोचना यह दर्शाती है कि विदेश नीति के संकेत और भाषाई अभिव्यक्तियाँ भारत की वैश्विक छवि तथा घरेलू राजनीतिक बहस दोनों को प्रभावित करती हैं।
पश्चिम एशिया की जटिल परिस्थितियों के बीच भारत की भूमिका और रुख पर राजनीतिक व कूटनीतिक चर्चाएँ आगे भी जारी रहने की संभावना है।
