4 जनवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi |वरिष्ठ पत्रकार
हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला स्थित एक सरकारी कॉलेज में पढ़ने वाली 19 वर्षीय दलित छात्रा की मौत ने राज्य के उच्च शिक्षा तंत्र, कॉलेज प्रशासन और पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। छात्रा की मृत्यु के बाद उसके परिजनों ने कॉलेज की तीन छात्राओं और एक प्रोफेसर पर मानसिक प्रताड़ना, रैगिंग और यौन उत्पीड़न जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं, जबकि प्रशासन और पुलिस शुरुआती स्तर पर किसी औपचारिक शिकायत से इनकार करता रहा है।
यह मामला अब केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं रह गया है, बल्कि शिक्षा संस्थानों में दलित छात्राओं की सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और शिकायत तंत्र की विश्वसनीयता पर राष्ट्रीय बहस का विषय बनता जा रहा है।
क्या है पूरा मामला?
धर्मशाला की रहने वाली यह छात्रा 26 दिसंबर 2025 को संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाई गई। परिवार का कहना है कि वह बीते लगभग दो महीनों से गंभीर मानसिक तनाव और अवसाद से जूझ रही थी और इस दौरान अलग-अलग अस्पतालों में उसका इलाज भी कराया गया।
छात्रा के पिता का आरोप है कि उनकी बेटी कॉलेज में पढ़ाई के दौरान लगातार डर, धमकियों और अपमान का सामना कर रही थी। उन्होंने दावा किया कि कुछ छात्राओं और एक प्रोफेसर द्वारा उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया, जिससे उसकी मानसिक स्थिति लगातार बिगड़ती चली गई।
परिजनों के आरोप: “उसे तोड़ा गया, डराया गया”
बीबीसी हिंदी से बातचीत में छात्रा के पिता ने कहा—
“मेरी बेटी पढ़ाई में कमजोर नहीं थी, लेकिन कॉलेज में उसके साथ जो हुआ, उसने उसे अंदर से तोड़ दिया। उसे धमकाया गया, मारा गया और मानसिक रूप से इस कदर दबाव में रखा गया कि वह डिप्रेशन में चली गई।”
परिवार का यह भी कहना है कि वे कई बार शिकायत करना चाहते थे, लेकिन किस स्तर पर और किससे संपर्क किया जाए, यह स्पष्ट नहीं था।
उनका आरोप है कि कॉलेज और प्रशासन की निष्क्रियता ने हालात को और गंभीर बना दिया।
किन धाराओं में दर्ज हुआ मामला?
पिता की शिकायत के आधार पर धर्मशाला पुलिस ने:
-
भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 75, 115(2), 3(5)
-
हिमाचल प्रदेश शैक्षणिक संस्थान (रैगिंग निषेध) अधिनियम, 2009 की धारा 3
के तहत एफआईआर दर्ज की है।
मामले में यौन उत्पीड़न और जानबूझकर चोट पहुंचाने जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं।
पुलिस और प्रशासन पर लापरवाही के आरोप
इस मामले को लेकर विपक्ष ने राज्य सरकार और पुलिस की भूमिका पर कड़े सवाल उठाए हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कहा—
“अगर पुलिस ने समय रहते इस मामले को गंभीरता से लिया होता, तो शायद यह दुखद स्थिति पैदा न होती।”
वहीं, कांगड़ा जिले के पुलिस अधीक्षक अशोक रत्तन का कहना है कि:
-
20 दिसंबर को मुख्यमंत्री हेल्पलाइन के माध्यम से एक शिकायत दर्ज हुई थी
-
उस शिकायत में न तो किसी प्रोफेसर का नाम था और न ही यौन उत्पीड़न का स्पष्ट आरोप
पुलिस के अनुसार, अब सामने आए नए आरोपों, सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और परिजनों के बयानों की फॉरेंसिक और कानूनी जांच की जा रही है।
वायरल वीडियो और फॉरेंसिक जांच
छात्रा की मौत के बाद सोशल मीडिया पर दो वीडियो सामने आए हैं, जिन्हें छात्रा से जुड़ा बताया जा रहा है।
पुलिस का कहना है कि:
-
वीडियो की प्रामाणिकता की जांच होगी
-
यदि वीडियो वास्तविक पाए जाते हैं, तो यह भी देखा जाएगा कि बयान किस परिस्थिति और दबाव में दिए गए
प्रोफेसर निलंबित, लेकिन मिली अंतरिम जमानत
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि आरोपों का सामना कर रहे प्रोफेसर को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाएगा।
सरकार ने इस संबंध में आदेश भी जारी कर दिए हैं।
हालांकि, इसी बीच आरोपी प्रोफेसर को 12 जनवरी तक अंतरिम जमानत मिल गई है। अदालत ने उन्हें जांच में पूरा सहयोग करने की शर्त पर यह राहत दी है।
कॉलेज प्रशासन का पक्ष
कॉलेज के प्रिंसिपल राकेश पठानिया का दावा है कि:
-
कॉलेज में रैगिंग रोकने के लिए कमेटी मौजूद है
-
छात्रा या उसके परिजनों की ओर से कोई लिखित या मौखिक शिकायत नहीं दी गई
प्रिंसिपल का यह भी कहना है कि छात्रा प्रथम वर्ष में असफल होने के कारण अगली कक्षा में प्रवेश न मिलने से मानसिक तनाव में थी।
हालांकि, इस दावे को छात्रा के पिता ने सिरे से खारिज करते हुए कहा—
“मेरी बेटी ने जो झेला, वह कॉलेज प्रशासन नहीं जानता या जानना नहीं चाहता। कॉलेज की छवि बचाने के लिए सच्चाई को हल्का किया जा रहा है।”
महिला आयोग और सरकार की सक्रियता
हिमाचल प्रदेश महिला आयोग ने मामले का स्वतः संज्ञान लिया है।
आयोग की अध्यक्ष विद्या नेगी ने एसपी को तलब कर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
सरकार ने यह भी बताया कि:
-
उच्च शिक्षा विभाग के अतिरिक्त निदेशक की अध्यक्षता में एक जांच समिति बनाई गई है
-
समिति को तीन दिनों में रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए हैं
सिर्फ एक मौत नहीं, सिस्टम पर सवाल
अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता शीतल व्यास के अनुसार, यह मामला केवल एक छात्रा की मौत तक सीमित नहीं है।
यह सवाल भी उठाता है कि:
-
कॉलेजों में छात्रों की मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को कितनी गंभीरता से लिया जाता है
-
शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया कितनी सुरक्षित, सरल और भरोसेमंद है
-
क्या दलित और कमजोर वर्ग के छात्रों को बराबरी का संरक्षण मिल पा रहा है?
