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बारिश में भी नहीं थमा SIR के खिलाफ आक्रोश: जंतर-मंतर से राज्यों की सड़कों तक उठती आवाज, क्या चुनाव आयोग अब जनता के कठघरे में?

 

नई दिल्ली 28 सितम्बर  2026:

 Z S Razzaqi | Morning Dilli — India’s Window to the World

भारत में चुनाव केवल मतदान का दिन नहीं है। चुनाव उस पूरी प्रक्रिया का नाम है जिसमें मतदाता सूची तैयार होती है, नाम जुड़ते हैं, नाम हटते हैं, आपत्तियां दर्ज होती हैं और अंततः नागरिक अपने मताधिकार का इस्तेमाल करता है।

इसीलिए जब Special Intensive Revision (SIR) के नाम पर देश के अलग-अलग हिस्सों में मतदाता सूचियों के व्यापक पुनरीक्षण को लेकर सवाल उठते हैं, तो उसका असर केवल Election Commission के दफ्तरों तक सीमित नहीं रहता।

अब यह सवाल सड़कों पर दिखाई देने लगा है।

जंतर-मंतर से लेकर लखनऊ, पटना, चंडीगढ़, गुवाहाटी, बेंगलुरु, कोलकाता और दूसरे शहरों तक प्रदर्शन हुए हैं। भारी बारिश के बीच भी प्रदर्शनकारी सड़कों पर डटे रहे। कई जगह police barricading, water cannons और detentions की घटनाएं सामने आईं। 25 सितंबर को दिल्ली में जंतर-मंतर के आसपास प्रदर्शन कर रहे 50-60 लोगों को हिरासत में लिए जाने की रिपोर्ट सामने आई, जबकि Lucknow में भारी बारिश के बीच प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव के बाद सैकड़ों लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबर आई।

यह केवल राजनीतिक दलों के मंच से उठती आवाज नहीं रह गई है। नागरिक संगठनों, activists, students और civil society के हिस्सों ने भी electoral-roll transparency और voter rights को लेकर सवाल उठाने शुरू किए हैं।

यहीं से SIR विवाद का नया अध्याय शुरू होता है।


जंतर-मंतर पर बारिश, बैरिकेड और हिरासत—लेकिन सवाल वहीं खड़ा

25 सितंबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर SIR के खिलाफ नागरिकों का प्रदर्शन हुआ। प्रदर्शनकारियों के हाथों में “Suspend SIR forthwith” और CEC को हटाने की मांग वाले पोस्टर थे।

पुलिस की भारी मौजूदगी के बीच जंतर-मंतर की ओर जाने वाले रास्तों पर बैरिकेड लगाए गए। बाद में कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया। पुलिस के अनुसार लगभग 50-60 लोगों को अलग-अलग थानों में ले जाया गया और बाद में उन्हें छोड़ दिया गया।

प्रदर्शन में RTI activist अंजलि भारद्वाज, activist योगेंद्र यादव, AISA नेता नेहा बोरा और CPI नेता दीपंकर भट्टाचार्य समेत कई लोग मौजूद थे। अलग-अलग रिपोर्टों में प्रदर्शनकारियों की ओर से मतदाता सूची में पारदर्शिता, नाम हटाए जाने की प्रक्रिया और Election Commission से जवाबदेही की मांग दर्ज की गई।

यहां एक बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है।

बारिश, पुलिस की मौजूदगी और हिरासत के बावजूद प्रदर्शन का जारी रहना इस आंदोलन की राजनीतिक तीव्रता को दर्शाता है।

हालांकि यह कहना कि पूरे देश की जनता एक ही राजनीतिक रुख पर आ गई है, उपलब्ध प्रमाणों से आगे का निष्कर्ष होगा। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि SIR को लेकर सार्वजनिक और राजनीतिक विरोध अब कई शहरों और राज्यों में दिखाई दे रहा है।


लखनऊ में बारिश के बीच सड़क पर उतरे प्रदर्शनकारी

दिल्ली के बाद उत्तर प्रदेश की राजधानी Lucknow में भी तस्वीर कम तीखी नहीं रही।

25 सितंबर को Congress के नेतृत्व में प्रदर्शनकारी Chief Electoral Officer के कार्यालय की ओर बढ़ रहे थे। भारी बारिश के बीच police ने barricades लगाकर रास्ता रोका। प्रदर्शनकारियों ने barricades पार करने की कोशिश की और इसके बाद पुलिस के साथ धक्का-मुक्की हुई।

कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेकर Eco Garden ले जाया गया। रिपोर्ट के अनुसार प्रदर्शन में महिलाएं भी मौजूद थीं और बारिश के बावजूद प्रदर्शन जारी रहा।

प्रदर्शनकारियों के नारों में “Vote Chor, Gaddi Chhod” जैसे राजनीतिक नारे शामिल थे। Congress नेताओं ने SIR और electoral process को लेकर गंभीर आरोप लगाए।

इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और न्यायिक जांच अलग प्रश्न है, लेकिन सड़क पर दिखाई दिया विरोध वास्तविक राजनीतिक घटना है।

बारिश ने प्रदर्शन को रोकने के बजाय उसकी तस्वीर को और तीखा कर दिया।


पटना और चंडीगढ़ में water cannon, दूसरे राज्यों में भी प्रदर्शन

SIR को लेकर विरोध केवल Delhi और Lucknow तक सीमित नहीं रहा।

25 सितंबर को कई राज्यों में Congress के प्रदर्शन हुए। Patna और Chandigarh में police द्वारा water cannons के इस्तेमाल की रिपोर्ट सामने आई। Kolkata सहित कई अन्य शहरों में भी प्रदर्शन हुए।

26 सितंबर को Congress ने देश के विभिन्न state capitals में CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन आयोजित किए। Indian Express के अनुसार कई जगह police और protesters के बीच टकराव भी हुआ।

इसका राजनीतिक महत्व इसलिए है क्योंकि एक ही दिन में अलग-अलग राज्यों में एक ही मुद्दे पर प्रदर्शन होना किसी सामान्य press conference से अलग तस्वीर पेश करता है।

यह बताता है कि SIR अब closed-door institutional controversy नहीं रहा।

यह सड़क की राजनीति का मुद्दा बन चुका है।


विवाद की जड़ आखिर है क्या?

इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में एक रिपोर्ट है जिसने Election Commission की internal functioning पर बड़ा सवाल खड़ा किया।

The Indian Express की investigation के अनुसार Election Commissioners Sukhbir Singh Sandhu और Vivek Joshi ने लगभग 10 महीनों में कम-से-कम 14 मौकों पर Election Commission से जुड़े फैसलों और प्रक्रियाओं पर लिखित objections दर्ज किए।

इनमें reportedly—

  • नए voters के registration,
  • voter deletion और restoration,
  • Form-6 में बदलाव,
  • electoral-roll database के centralisation,
  • software access और control,
  • तथा कुछ निर्णयों को लेकर internal process

जैसे मुद्दे शामिल थे।

यही रिपोर्ट सामने आने के बाद राजनीतिक विवाद अचानक और तीखा हो गया।

लेकिन यहां एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य भी है।

Election Commission ने इन आरोपों को उस रूप में स्वीकार नहीं किया है जिस रूप में विपक्ष उन्हें प्रस्तुत कर रहा है।

आयोग का कहना है कि उसके निर्णय collective और unanimous थे तथा internal notes या observations को institutional disagreement की असामान्य स्थिति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

यानी देश के सामने इस समय दो अलग narratives हैं—

एक narrative कहता है कि आयोग के भीतर गंभीर असहमति थी।

दूसरा narrative कहता है कि institutional decision-making में मतभेद या टिप्पणियां हो सकती हैं, लेकिन अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए।

अब असली सवाल यही है कि कौन सा दावा documents और records से कितना साबित होता है।


जनता का सवाल: “अगर सब ठीक है तो पूरा सच सामने क्यों नहीं?”

सड़क पर दिखाई दे रहा गुस्सा केवल इस बात से नहीं जुड़ा कि SIR हो रहा है।

लोगों की चिंता का दूसरा हिस्सा है—

नाम किस आधार पर हटाया जा रहा है?

किसे notice मिल रहा है?

किसी गरीब, बुजुर्ग, migrant worker या first-time voter का नाम गलती से हट जाए तो वह उसे कैसे वापस लाएगा?

क्या हर व्यक्ति को अपने exclusion का स्पष्ट कारण पता चलेगा?

क्या electoral database में होने वाले बदलावों का audit trail उपलब्ध है?

क्या political parties और independent observers इन प्रक्रियाओं को verify कर सकते हैं?

यही वे सवाल हैं जिनके कारण SIR का मुद्दा भावनात्मक होता जा रहा है।

क्योंकि एक ordinary citizen के लिए electoral roll में उसका नाम सिर्फ एक database entry नहीं है।

वह उसकी लोकतांत्रिक मौजूदगी का प्रमाण है।


13 करोड़ से ज्यादा नामों का आंकड़ा और पैदा हुआ भय

SIR की व्यापकता ने विवाद को और बड़ा बनाया है।

सितंबर में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में draft electoral rolls से 13 करोड़ से अधिक entries बाहर हुईं—हालांकि इन सभी को final deletion मानना सही नहीं होगा, क्योंकि claims और objections की प्रक्रिया इसके बाद भी मौजूद रहती है।

यहीं पत्रकारिता और राजनीतिक प्रचार के बीच अंतर जरूरी हो जाता है।

13 करोड़ draft exclusions को सीधे “13 करोड़ वोट चोरी” कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।

लेकिन दूसरी ओर यह कहना भी पर्याप्त नहीं कि “ये सिर्फ technical corrections हैं।”

13 करोड़ से अधिक लोगों की electoral status में बदलाव जैसी विशाल प्रक्रिया अपने आप में transparency की मांग करती है।

अगर इतने बड़े पैमाने पर नाम draft rolls से बाहर हुए हैं, तो नागरिकों को स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए कि—

  • कितने नाम मृत मतदाताओं के थे?
  • कितने duplicate थे?
  • कितने permanently shifted voters थे?
  • कितने documents की कमी के कारण बाहर हुए?
  • कितने genuine voters बाद में वापस जोड़े गए?
  • कितने claims rejected हुए?
  • और rejection के खिलाफ कितनी appeals स्वीकार हुईं?

इन सवालों का granular data ही SIR पर वास्तविक public audit का आधार बन सकता है।


First-time voters के लिए सबसे बड़ा प्रश्न

SIR विवाद में Form-6 एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनकर सामने आया है।

Form-6 नए मतदाताओं के electoral roll में inclusion के लिए इस्तेमाल होता है।

यदि पहली बार voting age तक पहुंचे युवा से पुराने electoral-roll records से संबंधित अतिरिक्त information मांगी जाती है, तो सवाल यह उठता है कि उसके लिए उस historical information को उपलब्ध कराना कितना आसान होगा।

आयोग और उसके समर्थक इसे verification और electoral-roll integrity की जरूरत के रूप में देखते हैं।

आलोचक इसे potential administrative barrier के रूप में देखते हैं।

इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच निर्णायक चीज राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि वास्तविक data और field-level experience होना चाहिए।


Supreme Court ने SIR को पूरी तरह खारिज नहीं किया—लेकिन safeguards का सवाल कायम है

यह भी साफ होना चाहिए कि Supreme Court ने बिहार SIR को unconstitutional घोषित नहीं किया है।

Court ने Election Commission की electoral rolls revise करने की power को स्वीकार किया है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि SIR के तहत होने वाली हर individual deletion स्वतः सही मानी जाएगी।

मतदाता को अपना नाम challenge करने, documents देने और गलत exclusion के खिलाफ remedy प्राप्त करने का रास्ता उपलब्ध रहना आवश्यक है।

यही कारण है कि Supreme Court की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है।

SIR की वैधता और SIR के हर individual implementation decision की correctness—दो अलग प्रश्न हैं।


विपक्ष ने सड़क को राजनीतिक मंच बना दिया

SIR विवाद के बाद विपक्षी दलों ने CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को अपने राजनीतिक अभियान का प्रमुख हिस्सा बना लिया है।

Congress ने 25 सितंबर को कई राज्यों की राजधानियों में प्रदर्शन किए।

Delhi में Indian Youth Congress ने Raisina Road से Jantar Mantar तक मार्च किया। Patna और Chandigarh में water cannon इस्तेमाल किए जाने की रिपोर्ट आई। Lucknow में भारी बारिश के बीच protesters और police के बीच टकराव हुआ।

INDIA bloc के भीतर भी SIR और Election Commission को लेकर आगे की संयुक्त रणनीति पर चर्चा की जा रही है; 30 सितंबर को संभावित बैठक की रिपोर्ट सामने आई है।

इसका अर्थ यह नहीं कि विपक्ष एकमत हो चुका है या सरकार पर राजनीतिक संकट निश्चित है।

लेकिन इतना जरूर है कि SIR अब विपक्ष के लिए संसद से सड़क तक mobilising issue बन गया है।


क्या यह सिर्फ विपक्ष का आंदोलन है?

यहीं रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील सवाल आता है।

राजनीतिक दलों द्वारा आयोजित demonstrations और व्यापक नागरिक असंतोष को एक ही चीज मानना ठीक नहीं होगा।

लेकिन जंतर-मंतर के प्रदर्शन में activists, civil society figures और ordinary citizens की मौजूदगी इस बहस को केवल party politics तक सीमित नहीं रहने देती। Times of India ने ऐसे नागरिकों की प्रतिक्रियाएं दर्ज कीं जिन्होंने voter-list correction और deletion की transparency को लेकर चिंता व्यक्त की।

दूसरी तरफ BJP और केंद्र सरकार की ओर से यह कहा गया है कि Election Commission के खिलाफ लगाए जा रहे आरोपों के लिए concrete proof प्रस्तुत नहीं किया गया है।

यानी देश इस समय दो विपरीत दावों के बीच खड़ा है।

एक तरफ सड़क पर सवाल हैं।

दूसरी तरफ आयोग का जवाब है कि प्रक्रिया में कोई वैसा institutional breakdown नहीं हुआ जैसा आरोप लगाया जा रहा है।

अब लोकतंत्र की कसौटी यही होगी कि इस टकराव का फैसला नारे नहीं, records और independent scrutiny करें।


“सरकारी गवाह” बनने की चर्चा—अभी सिर्फ राजनीतिक अटकल

इसी माहौल में CEC ज्ञानेश कुमार के संभावित “approver” या “सरकारी गवाह” बनने जैसी बातें भी राजनीतिक चर्चाओं में सामने आई हैं।

लेकिन उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड में ऐसी किसी औपचारिक प्रक्रिया या बयान की पुष्टि नहीं है।

इसलिए इसे खबर का तथ्य बनाना गलत होगा।

हां, यह सवाल जरूर महत्वपूर्ण है कि यदि Election Commission के भीतर किसी निर्णय पर गंभीर recorded disagreement था, तो उस disagreement का पूरा institutional record क्या है।

व्यक्ति के भविष्य की अटकल से ज्यादा जरूरी दस्तावेजों का वर्तमान सत्य है।


NDA के सहयोगी दलों पर भी बढ़ा दबाव

SIR विवाद ने NDA के भीतर भी राजनीतिक सवाल पैदा किए हैं।

Chirag Paswan ने सार्वजनिक रूप से कहा कि यदि Election Commission जैसी independent constitutional body पर सवाल उठ रहे हैं तो CEC की जिम्मेदारी है कि वह जनता के सामने अपना पक्ष स्पष्ट करे।

यह बयान अपने आप में समर्थन वापसी का संकेत नहीं है।

इसी तरह JD(U) या TDP के NDA से अलग होने की कोई पुष्ट घोषणा उपलब्ध नहीं है।

इसलिए “सरकार गिरने वाली है” जैसी headline इस समय तथ्य से आगे जाएगी।

लेकिन यह भी सच है कि जब चुनावी संस्था पर जनता का भरोसा सवालों में आए, तो गठबंधन की राजनीति पर भी दबाव पैदा होना स्वाभाविक है।

राजनीतिक दलों को अंततः यह तय करना होगा कि वे institutional credibility के सवाल पर कितना दबाव बनाते हैं और किस सीमा तक सरकार या Election Commission से सार्वजनिक जवाब मांगते हैं।


सड़क पर बढ़ता आंदोलन: क्या यह किसी बड़े जनआंदोलन की शुरुआत है?

इस प्रश्न का उत्तर अभी इतिहास ही देगा।

लेकिन कुछ संकेत स्पष्ट हैं।

पहला—विरोध दिल्ली तक सीमित नहीं है।

दूसरा—विभिन्न राज्यों में एक ही समय पर demonstrations हुए हैं।

तीसरा—इसमें political workers के साथ activists और civil-society groups की भागीदारी दिखाई दे रही है।

चौथा—कुछ संगठनों ने आगे भी nationwide mobilisation की घोषणा की है। CJP ने 2 अक्टूबर से nationwide protest की चेतावनी दी है, जबकि अन्य विपक्षी और नागरिक समूह भी अगले चरण की गतिविधियों पर विचार कर रहे हैं।

पांचवां—Parliament और Supreme Court दोनों इस controversy के अगले institutional arenas बनते दिखाई दे रहे हैं।

इसलिए फिलहाल इसे “एक आंदोलन समाप्त हो गया” कहना भी जल्दबाजी होगी और “देशव्यापी क्रांति शुरू हो गई” कहना भी।

इतना जरूर है कि SIR controversy ने सड़क, संसद और न्यायपालिका—तीनों को एक ही राजनीतिक-संवैधानिक बहस में जोड़ दिया है।


बारिश में खड़े लोग क्या कह रहे हैं?

किसी लोकतांत्रिक आंदोलन की वास्तविक ताकत केवल मंच से दिए गए भाषणों से नहीं मापी जाती।

कभी-कभी तस्वीर ज्यादा बोलती है।

दिल्ली में बैरिकेड।

Lucknow में बारिश।

Patna और Chandigarh में water cannon।

Guwahati में detention।

Bengaluru में slogans और placards।

और अलग-अलग राज्यों में एक ही मांग—मतदाता सूची की प्रक्रिया पर जवाब चाहिए।

यह कहना उचित नहीं होगा कि इन सभी लोगों की राजनीतिक सोच एक जैसी है।

लेकिन उनके बीच एक साझा चिंता दिखाई देती है:

अगर मेरा वोट लोकतंत्र की ताकत है, तो मेरे नाम का फैसला इतनी बड़ी administrative exercise में कितनी पारदर्शिता से हो रहा है?

यही सवाल SIR विवाद को राजनीतिक बहस से नागरिक अधिकारों की बहस में बदल देता है।


और यहीं से असली लड़ाई शुरू होती है

CEC का इस्तीफा हो या न हो—यह एक राजनीतिक और संवैधानिक प्रश्न है।

SIR रुके या जारी रहे—यह कानूनी और प्रशासनिक प्रश्न है।

Opposition का आंदोलन कितना आगे जाए—यह राजनीतिक रणनीति का प्रश्न है।

लेकिन इन सबके नीचे एक ऐसा प्रश्न है जिसका जवाब किसी पार्टी के पास नहीं, बल्कि Election Commission और लोकतांत्रिक संस्थाओं के पास होना चाहिए।

क्या हर पात्र मतदाता सुरक्षित है?

क्या हर deletion का कारण सार्वजनिक और समझने योग्य है?

क्या हर genuine voter को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर मिल रहा है?

क्या electoral database के software और access का स्वतंत्र audit संभव है?

क्या Election Commission के internal objections और उनके जवाब जनता की जांच के लिए उपलब्ध कराए जा सकते हैं?

और क्या नागरिक बिना राजनीतिक संरक्षण के अपना नाम वापस electoral roll में जुड़वा सकता है?

अगर इन सवालों के जवाब स्पष्ट हैं, तो उन्हें सार्वजनिक करने में संकोच नहीं होना चाहिए।

और अगर कहीं कमी है, तो उसे सुधारने में भी संकोच नहीं होना चाहिए।


चुनाव आयोग के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती: भरोसा

Election Commission की सबसे बड़ी पूंजी उसका administrative power नहीं, public trust है।

एक सरकार चुनाव हार सकती है।

एक विपक्ष चुनाव जीत सकता है।

एक राजनीतिक गठबंधन टूट सकता है।

लेकिन यदि जनता को चुनावी प्रक्रिया पर भरोसा नहीं रहा, तो नुकसान किसी एक दल का नहीं होता।

नुकसान पूरे democratic system का होता है।

इसीलिए इस समय सवाल केवल यह नहीं है कि “कौन सही है—CEC या Opposition?”

बड़ा सवाल है—

क्या Election Commission ऐसा पारदर्शी evidence सामने रख सकता है जिससे आम नागरिक स्वयं तय कर सके कि SIR की प्रक्रिया कितनी निष्पक्ष, कितनी सुरक्षित और कितनी जवाबदेह है?

यही वह बिंदु है जहां राजनीतिक बयानबाजी समाप्त और institutional accountability शुरू होती है।


निष्कर्ष:

 बारिश थम सकती है, लेकिन सवाल नहीं

जंतर-मंतर की सड़क पर बारिश रुक सकती है।

Lucknow की सड़कें फिर सूख सकती हैं।

Patna और Chandigarh के water cannon वापस जा सकते हैं।

हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारी अपने घर लौट सकते हैं।

लेकिन मतदाता सूची का सवाल वहीं रहेगा।

अगर किसी नागरिक को यह डर है कि उसका नाम electoral roll से हट सकता है, तो उसे आश्वस्त करने का सबसे प्रभावी तरीका पुलिस की बैरिकेडिंग नहीं, बल्कि पारदर्शी प्रक्रिया है।

अगर विपक्ष के आरोप गलत हैं, तो documents और data उन्हें गलत साबित कर सकते हैं।

अगर आयोग की प्रक्रिया सही है, तो complete audit trail, deletion reasons और grievance-redressal statistics उसके पक्ष में सबसे मजबूत प्रमाण बन सकते हैं।

और अगर कहीं वास्तविक administrative या institutional गलती हुई है, तो उसे स्वीकार कर सुधारना ही संवैधानिक संस्थाओं की शक्ति होगी।

SIR विवाद का अगला अध्याय इसलिए केवल संसद में नहीं लिखा जाएगा।

वह मतदाता सूची के उस छोटे से कॉलम में भी लिखा जाएगा जहां किसी आम नागरिक का नाम मौजूद है या नहीं।

और शायद यही वजह है कि बारिश में भी सड़कों पर खड़े लोग सिर्फ एक CEC के खिलाफ नारे नहीं लगा रहे—वे उस सवाल का जवाब मांग रहे हैं जो लोकतंत्र की बुनियाद से जुड़ा है:


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