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इंदौर में राहुल गांधी का ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम: शिक्षा, बेरोज़गारी और सिस्टम पर गंभीर सवाल, छह लोगों के नियंत्रण का लगाया आरोप

इंदौर  20 सितम्बर  2026:

 Z S Razzaqi | Morning Dilli — India’s Window to the World


कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश के इंदौर में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के दौरान देश की शिक्षा व्यवस्था, बेरोज़गारी, भर्ती प्रक्रिया, पेपर लीक, सरकारी संस्थानों की कार्यप्रणाली और निजीकरण को लेकर केंद्र सरकार पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि देश के सिस्टम पर छह लोगों का नियंत्रण है और इसकी विभिन्न परतों के माध्यम से सत्ता, विचारधारा, संस्थानों तथा आर्थिक हितों का प्रभाव कायम किया जाता है।

राहुल गांधी ने कार्यक्रम को ‘सिस्टम बनाम स्टूडेंट्स’ के मुद्दे पर केंद्रित करते हुए कहा कि विद्यार्थियों की समस्याओं को केवल व्यक्तिगत कठिनाइयों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उन व्यवस्थागत कारणों को भी समझना होगा, जिनकी वजह से युवाओं को शिक्षा, रोजगार और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में युवा शामिल हुए। राहुल गांधी ने कुछ विद्यार्थियों को मंच पर बुलाकर उनकी समस्याएं सुनीं। छात्रों ने विश्वविद्यालयों में पारदर्शिता की कमी, लंबित भर्तियों, आरक्षण से जुड़े विवादों, संविदा नियुक्तियों और सरकारी पदों के खाली रहने जैसे मुद्दे उठाए।

राहुल गांधी ने अपने संबोधन में शिक्षा पर सरकारी खर्च, छात्रवृत्तियों, स्कूलों के बंद होने और छात्रावासों की उपलब्धता को लेकर भी कई आंकड़े पेश किए। इन दावों के बीच कार्यक्रम ने एक बार फिर शिक्षा व्यवस्था और युवाओं के भविष्य को लेकर राजनीतिक बहस को केंद्र में ला दिया है।

नोट: नीचे प्रस्तुत आंकड़े और आरोप राहुल गांधी के संबोधन तथा कार्यक्रम में छात्रों द्वारा कही गई बातों पर आधारित हैं। स्वतंत्र रूप से सत्यापित न होने वाले दावों को संबंधित वक्ताओं के हवाले से प्रस्तुत किया गया है।

‘सिस्टम पर छह लोगों का कब्ज़ा’: राहुल गांधी ने सत्ता और संस्थानों की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल

‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में राहुल गांधी ने देश की व्यवस्था को लेकर अपनी राजनीतिक समझ और आलोचना सामने रखते हुए आरोप लगाया कि सिस्टम की अलग-अलग परतों पर कुछ चुनिंदा लोगों का प्रभाव है। उनके मुताबिक, यही परतें मिलकर देश की नीतियों, संस्थानों और सामाजिक माहौल को प्रभावित करती हैं।

राहुल गांधी ने अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत और उद्योग जगत से जुड़े लोगों का उल्लेख करते हुए कहा कि सत्ता और विचारधारा के प्रभाव को समझे बिना विद्यार्थियों की समस्याओं का पूरा विश्लेषण नहीं किया जा सकता।

उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सिस्टम का संचालन करते हैं, जबकि अमित शाह की भूमिका छात्रों के आंदोलनों के दौरान बल प्रयोग से जुड़ी है। मोहन भागवत का उल्लेख करते हुए उन्होंने विचारधारा और शिक्षा संस्थानों के संदर्भ में सवाल उठाए।

राहुल गांधी ने यह भी आरोप लगाया कि सिस्टम में बैठे लोग विपक्षी नेताओं की जासूसी कराते हैं और उद्योगपति सरकार की Marketing में आर्थिक योगदान देते हैं।

ये आरोप राहुल गांधी के राजनीतिक संबोधन का हिस्सा थे। कार्यक्रम में इन दावों के समर्थन में विस्तृत दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत किए जाने का विवरण उपलब्ध सामग्री में नहीं है। इसलिए इन्हें स्थापित तथ्य के बजाय उनके आरोपों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

क्रिकेट प्रशासन का उदाहरण देकर उठाया सवाल

राहुल गांधी ने क्रिकेट प्रशासन का उदाहरण देते हुए सवाल किया कि देश में प्रतिष्ठित खिलाड़ियों की मौजूदगी के बावजूद प्रशासनिक पदों पर नियुक्तियों का आधार क्या होता है।

उन्होंने सचिन तेंदुलकर और कपिल देव जैसे दिग्गज क्रिकेटरों का उल्लेख करते हुए अमित शाह के बेटे जय शाह की क्रिकेट प्रशासन में भूमिका पर सवाल उठाया।

इस उदाहरण के जरिए राहुल गांधी ने संस्थाओं में नियुक्तियों, प्रभाव और जवाबदेही को लेकर अपनी आपत्ति जाहिर की। उनका तर्क था कि विद्यार्थियों के मन में यह सवाल उठता है कि संस्थाओं में निर्णय लेने की प्रक्रिया किस आधार पर संचालित होती है और योग्य लोगों की भूमिका क्या रह जाती है।

‘सिस्टम स्टूडेंट्स नहीं, अंधभक्त चाहता है’: युवाओं और विचारधारा पर तीखी टिप्पणी

राहुल गांधी ने विद्यार्थियों की समस्याओं को केवल परीक्षा, नौकरी और विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने शिक्षा और सामाजिक वातावरण के बीच संबंध पर भी अपनी बात रखी।

उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा व्यवस्था स्वतंत्र सोच रखने वाले विद्यार्थियों के बजाय विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध समर्थक तैयार करने पर अधिक जोर देती है।

राहुल गांधी ने अपने संबोधन में ‘अंधभक्त’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए कहा कि विद्यार्थियों को सवाल पूछने, असहमति जाहिर करने और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने का अधिकार होना चाहिए।

उन्होंने आरोप लगाया कि नफरत फैलाने वाली राजनीति से समाज में संवाद और आलोचनात्मक सोच कमजोर होती है। महिलाओं के प्रति अपमानजनक व्यवहार और असहमति रखने वालों को डराने की प्रवृत्ति पर भी उन्होंने टिप्पणी की।

यह राहुल गांधी की राजनीतिक आलोचना थी, जिसमें उन्होंने मौजूदा सामाजिक और वैचारिक माहौल को विद्यार्थियों की स्वतंत्रता के संदर्भ में देखा।

मध्य प्रदेश में भर्ती और आरक्षण का मुद्दा: छात्रों ने बताई अपनी परेशानियां

कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों ने मध्य प्रदेश में सरकारी भर्ती, लंबित नियुक्तियों और आरक्षण से जुड़े मामलों को लेकर अपनी समस्याएं सामने रखीं।

एक विद्यार्थी ने कहा कि राज्य के विश्वविद्यालय विद्यार्थियों की समस्याओं का उचित समाधान नहीं कर पा रहे हैं और वहां पारदर्शिता की कमी है।

एक अन्य छात्र ने आरोप लगाया कि मध्य प्रदेश में कई सरकारी पदों पर नियुक्तियां लंबित हैं। उसके मुताबिक, भर्ती प्रक्रिया में न्यायालय का हवाला देकर पदों को रोक दिया जाता है, जबकि उम्मीदवारों की उम्र बढ़ती जा रही है और वे बेरोज़गारी का सामना कर रहे हैं।

छात्र ने यह भी कहा कि अनेक पदों को नियमित भर्ती के बजाय संविदा यानी Contract के माध्यम से भरा जा रहा है।

इन शिकायतों से भर्ती प्रक्रिया की समय-सीमा, सरकारी विभागों में रिक्त पदों और उम्मीदवारों के भविष्य को लेकर युवाओं की चिंताएं सामने आईं।

OBC आरक्षण के 27 प्रतिशत मुद्दे पर क्या कहा गया?

कार्यक्रम में एक छात्र ने मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण को लेकर अपनी बात रखी।

उसने दावा किया कि मार्च 2019 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने OBC आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का निर्णय लिया था। छात्र के मुताबिक, इसके बाद आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया न्यायालय से जुड़े मामलों के कारण रुक गई।

उसने आरोप लगाया कि राज्य में लगभग 10 हजार पद लंबित हैं और सरकार न्यायालय का हवाला देकर नियुक्तियों को आगे नहीं बढ़ा रही है।

छात्र ने यह भी दावा किया कि संबंधित मामलों में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बावजूद सरकार ने अपेक्षित कार्रवाई नहीं की है।

इस मुद्दे पर जरूरी तथ्यात्मक अंतर: छात्र द्वारा मंच से लगाए गए आरोप और न्यायालय के वास्तविक आदेश दो अलग-अलग बातें हैं। आरक्षण से जुड़े किसी मामले में नियुक्तियां किस कारण रुकी हैं, यह जानने के लिए संबंधित सरकारी आदेश, न्यायालय के आदेश और भर्ती अधिसूचनाओं की अलग-अलग जांच जरूरी है। उपलब्ध सामग्री में इन दस्तावेजों का पूरा विवरण नहीं है।

शिक्षा बजट पर राहुल गांधी के सवाल: खर्च में कटौती का दावा

राहुल गांधी ने केंद्र सरकार की शिक्षा नीति और बजटीय प्राथमिकताओं पर सवाल उठाते हुए दावा किया कि पिछले वर्षों में शिक्षा पर सरकारी खर्च में कमी आई है।

उन्होंने अपने संबोधन में वर्ष 2004, 2014 और उसके बाद के बजट का उल्लेख करते हुए शिक्षा पर खर्च के अनुपात में बदलाव की बात कही।

राहुल गांधी के अनुसार:

  • वर्ष 2004 में शिक्षा के लिए बजट में 2.6 प्रतिशत राशि निर्धारित की जाती थी।

  • वर्ष 2014 तक यह अनुपात बढ़कर 4.6 प्रतिशत हो गया था।

  • उनके दावे के मुताबिक, पिछले दस वर्षों में यह घटकर 2.6 प्रतिशत रह गया।

  • उन्होंने शिक्षा पर 7.7 लाख करोड़ रुपये की कटौती का भी आरोप लगाया।

इन आंकड़ों के आधार पर राहुल गांधी ने सवाल उठाया कि यदि देश की युवा आबादी को भविष्य की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है, तो शिक्षा पर सार्वजनिक निवेश को पर्याप्त प्राथमिकता क्यों नहीं दी जा रही है।

हालांकि, शिक्षा बजट के प्रतिशत और कुल खर्च की तुलना करते समय यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि आंकड़े किस बजट मद, किस वर्ष और किस आधार पर निकाले गए हैं। केंद्र सरकार का शिक्षा बजट, केंद्र और राज्यों का संयुक्त व्यय तथा GDP के अनुपात में शिक्षा पर खर्च अलग-अलग मापदंड हैं। इनका परस्पर अंतर समझे बिना किसी एक आंकड़े से पूरी तस्वीर सामने नहीं आती।

छात्रवृत्तियों में कटौती का आरोप

राहुल गांधी ने दावा किया कि सरकार ने लगभग 1.5 करोड़ विद्यार्थियों की छात्रवृत्तियां काट दी हैं।

यह आरोप उन विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण है, जिनकी उच्च शिक्षा और पढ़ाई जारी रखने की क्षमता छात्रवृत्तियों पर निर्भर करती है।

छात्रवृत्तियों के संदर्भ में किसी भी व्यापक दावे की पुष्टि के लिए योजना-वार लाभार्थियों की संख्या, बजट आवंटन, वास्तविक वितरण और पात्रता नियमों में हुए बदलावों का अध्ययन जरूरी है।

राहुल गांधी ने इस मुद्दे को शिक्षा तक समान पहुंच और आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के अवसरों से जोड़ते हुए उठाया।

शिक्षकों के 10 लाख पद खाली होने का दावा

राहुल गांधी ने शिक्षा व्यवस्था में शिक्षकों की कमी का मुद्दा उठाते हुए दावा किया कि देशभर में शिक्षकों के लगभग 10 लाख पद खाली पड़े हैं।

उन्होंने इस स्थिति को सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता और विद्यार्थियों को मिलने वाली सुविधाओं से जोड़ा।

यदि सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों के पद लंबे समय तक खाली रहते हैं, तो इसका असर कक्षाओं के संचालन, विषयवार शिक्षण, विद्यार्थियों पर शिक्षकों के अनुपात और स्कूलों की शैक्षणिक गतिविधियों पर पड़ सकता है।

हालांकि, देशभर में रिक्त शिक्षकों के पदों की वास्तविक संख्या जानने के लिए राज्यवार और विद्यालय स्तर के आंकड़ों की जरूरत होती है। स्वीकृत पद, कार्यरत शिक्षक और वास्तविक रिक्तियां अलग-अलग श्रेणियां हैं।

राहुल गांधी के दावे के संदर्भ में इन आंकड़ों का स्वतंत्र सत्यापन शिक्षा व्यवस्था की मौजूदा स्थिति को समझने के लिए महत्वपूर्ण होगा।

एक लाख सरकारी स्कूल बंद होने का दावा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश का उल्लेख

राहुल गांधी ने निजीकरण और सरकारी शिक्षा व्यवस्था में बदलाव का मुद्दा उठाते हुए दावा किया कि देश में एक लाख सरकारी स्कूल बंद हो गए हैं।

उन्होंने कहा कि उनके अनुसार इन स्कूलों में से 55 प्रतिशत स्कूल मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में बंद हुए हैं।

यह दावा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी स्कूल ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के लिए शिक्षा का प्रमुख माध्यम हैं।

सरकारी विद्यालयों के बंद होने, दूसरे विद्यालयों में विलय, विद्यार्थियों के कम नामांकन और स्कूलों के प्रशासनिक पुनर्गठन के बीच अंतर करना जरूरी है। किसी विद्यालय का बंद होना और उसका दूसरे विद्यालय में विलय होना प्रशासनिक रूप से अलग परिस्थितियां हो सकती हैं।

इसलिए राहुल गांधी द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों का सही आकलन करने के लिए स्कूल शिक्षा विभाग के वर्षवार रिकॉर्ड, UDISE+ के आंकड़ों और राज्यवार विद्यालयों की स्थिति का मिलान आवश्यक है।

निजीकरण और सरकारी शिक्षा की पहुंच

राहुल गांधी ने शिक्षा में निजीकरण को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि जब सरकार सार्वजनिक शिक्षा पर पर्याप्त निवेश नहीं करती, तो विद्यार्थियों पर आर्थिक और शैक्षणिक जोखिम बढ़ जाता है।

उनकी आलोचना का केंद्र यह था कि सरकारी संस्थानों की भूमिका कमजोर होने पर शिक्षा की लागत परिवारों पर अधिक पड़ सकती है।

यह बहस केवल सरकारी स्कूलों की संख्या तक सीमित नहीं है। इसमें शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षकों की उपलब्धता, स्कूलों तक पहुंच, फीस, छात्रवृत्ति और सामाजिक समानता जैसे पहलू भी शामिल हैं।

छात्रावासों की कमी पर भी उठाया सवाल

राहुल गांधी ने उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे विद्यार्थियों के सामने आवास की समस्या का उल्लेख करते हुए दावा किया कि हर 100 विद्यार्थियों में से केवल 14 को ही छात्रावास में जगह मिल पाती है।

उन्होंने इस मुद्दे को विद्यार्थियों की शिक्षा तक पहुंच और आर्थिक कठिनाइयों से जोड़कर देखा।

दूसरे शहरों में पढ़ने जाने वाले छात्रों के लिए हॉस्टल की उपलब्धता एक महत्वपूर्ण आवश्यकता होती है। छात्रावासों की कमी के कारण विद्यार्थियों को निजी किराये के मकान, परिवहन और भोजन पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ सकता है।

हालांकि, राहुल गांधी के प्रस्तुत अनुपात की पुष्टि के लिए यह जानना जरूरी है कि इसमें किन संस्थानों, किस प्रकार के छात्रावासों और किस विद्यार्थी समूह को शामिल किया गया है।

कार्यक्रम से पहले सुरक्षा व्यवस्था को लेकर विवाद

इंदौर में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम से पहले सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी राजनीतिक विवाद सामने आया।

उपलब्ध समाचार विवरण के अनुसार, पुलिस ने कार्यक्रम के आयोजन के लिए 31 तरह की शर्तें रखी थीं। इनमें भीड़ नियंत्रण, बैरिकेडिंग, प्रवेश और निकासी की व्यवस्था तथा आयोजकों की जिम्मेदारियों से जुड़े प्रावधान शामिल थे।

कार्यक्रम की सुरक्षा के संदर्भ में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की 1991 में हुई हत्या और उसके बाद सुरक्षा व्यवस्था से संबंधित सुझावों का भी उल्लेख किया गया।

पुलिस की ओर से सुरक्षा प्रबंधों में किसी भी तरह की लापरवाही नहीं बरतने पर जोर दिए जाने की बात सामने आई।

राजनीतिक नेताओं के बड़े सार्वजनिक कार्यक्रमों में सुरक्षा, भीड़ प्रबंधन और आयोजन संबंधी जिम्मेदारियां महत्वपूर्ण होती हैं। लेकिन सुरक्षा के नाम पर रखी गई शर्तें कितनी आवश्यक थीं और उनका प्रभाव आयोजन पर क्या पड़ा, इसका आकलन करने के लिए संबंधित आदेश की पूरी जानकारी जरूरी है।

पवन खेड़ा ने सरकार पर लगाए आरोप

कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कार्यक्रम से जुड़ी सुरक्षा शर्तों को लेकर टिप्पणी की।

उन्होंने आरोप लगाया कि ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के एक शहर से दूसरे शहर जाने के साथ इसे रोकने के लिए राजनीतिक दबाव और बहाने सामने आ रहे हैं।

पवन खेड़ा ने राजीव गांधी की हत्या का संदर्भ दिए जाने और कोचिंग सेंटरों पर विद्यार्थियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी से संबंधित शपथपत्र पर हस्ताक्षर कराने के कथित दबाव का भी उल्लेख किया।

उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार विद्यार्थियों के एकजुट होकर अपनी समस्याएं उठाने की संभावना से चिंतित है।

ये पवन खेड़ा के राजनीतिक आरोप हैं। सुरक्षा संबंधी शर्तों का वास्तविक स्वरूप, उनका कानूनी आधार और आयोजकों पर उनके प्रभाव की पुष्टि के लिए पुलिस के आधिकारिक दस्तावेजों तथा संबंधित पक्षों के वक्तव्यों का मिलान जरूरी है।

‘सिस्टम बनाम स्टूडेंट्स’: कार्यक्रम का व्यापक राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ

‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में राहुल गांधी ने शिक्षा, बेरोज़गारी, सरकारी भर्ती और संस्थागत जवाबदेही को एक व्यापक राजनीतिक विमर्श से जोड़ने की कोशिश की।

उनके संबोधन में तीन प्रमुख मुद्दे उभरकर सामने आए।

1. शिक्षा और अवसर

बजट, छात्रवृत्तियां, सरकारी स्कूल, शिक्षक और छात्रावासों की उपलब्धता को लेकर उठाए गए सवाल।

2. रोजगार और भर्ती

खाली सरकारी पदों, लंबित नियुक्तियों, संविदा भर्ती और OBC आरक्षण से जुड़े विद्यार्थियों के सवाल।

3. संस्थागत जवाबदेही

सरकारी संस्थानों की कार्यप्रणाली, पारदर्शिता, राजनीतिक प्रभाव और विद्यार्थियों की स्वतंत्र आवाज का सवाल।

कार्यक्रम का संदेश यह था कि विद्यार्थियों की समस्याओं को अलग-अलग घटनाओं के बजाय शिक्षा, रोजगार और संस्थागत व्यवस्था के व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

दूसरी ओर, कार्यक्रम में पेश किए गए अनेक आंकड़ों और आरोपों की पुष्टि संबंधित सरकारी रिकॉर्ड, बजट दस्तावेजों, भर्ती सूचनाओं और न्यायालय के आदेशों से होना आवश्यक है। राजनीतिक भाषण में प्रस्तुत दावे और स्वतंत्र रूप से सत्यापित तथ्य के बीच अंतर बनाए रखना ही इस बहस को तथ्यपरक बनाता है।

निष्कर्ष:-

 युवाओं के सवालों का जवाब आंकड़ों और जवाबदेही से

इंदौर का ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम शिक्षा और रोजगार को लेकर युवाओं की चिंताओं को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाने का प्रयास था। राहुल गांधी ने अपने संबोधन में देश के सिस्टम पर छह लोगों के नियंत्रण का आरोप लगाते हुए सत्ता, संस्थानों और विचारधारा के संबंधों पर सवाल उठाए।

कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने भर्ती प्रक्रिया, OBC आरक्षण, विश्वविद्यालयों की पारदर्शिता और सरकारी नौकरियों के इंतजार से जुड़ी परेशानियां सामने रखीं। शिक्षा बजट, छात्रवृत्ति, शिक्षक रिक्तियों और सरकारी स्कूलों के बंद होने के संबंध में भी कई दावे किए गए।

इन मुद्दों पर सार्थक निष्कर्ष के लिए केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप पर्याप्त नहीं हैं। जरूरत है कि संबंधित आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं, भर्ती और आरक्षण से जुड़े मामलों की स्थिति स्पष्ट हो तथा शिक्षा पर सरकारी खर्च और सुविधाओं की उपलब्धता का पारदर्शी आकलन किया जाए।

युवाओं के भविष्य से जुड़े इन सवालों का महत्व किसी एक राजनीतिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं है। इनका जवाब शिक्षा संस्थानों की कार्यप्रणाली, रोजगार के अवसरों और सार्वजनिक नीतियों की वास्तविक स्थिति में तलाशना होगा।

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