नई दिल्ली | 4 मई 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | वरिष्ठ पत्रकार
करीब 80,000 करोड़ रुपये की लागत वाली इस महत्वाकांक्षी परियोजना ने देश की राजनीति को भी दो धड़ों में बांट दिया है।
विपक्ष का हमला: “यह प्रोजेक्ट नहीं, प्रकृति और इंसानियत के खिलाफ़ अपराध”
लोकसभा में विपक्ष के नेता Rahul Gandhi ने ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर सीधा हमला बोलते हुए इसे “देश की प्राकृतिक और जनजातीय विरासत के खिलाफ़ सबसे बड़ा घोटाला” बताया। अपने दौरे के दौरान उन्होंने दावा किया कि इस परियोजना के लिए लाखों पेड़ों को काटने की तैयारी की जा रही है।
राहुल गांधी के शब्दों में,
“सरकार इसे विकास कहती है, लेकिन जो ज़मीन पर हो रहा है वह विनाश है—सदियों पुराने वर्षावनों को मिटाया जा रहा है, और उन लोगों को उजाड़ा जा रहा है जिनकी पहचान ही इन जंगलों से जुड़ी है।”
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि स्थानीय समुदायों से न तो सहमति ली गई और न ही उन्हें इस परियोजना के प्रभावों के बारे में पारदर्शी जानकारी दी गई।
सरकार का जवाब: “भारत की समुद्री ताक़त और सुरक्षा का आधार”
वहीं Narendra Modi सरकार इस परियोजना को भारत के भविष्य के लिए निर्णायक कदम मानती है। सरकार का कहना है कि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट सिर्फ़ एक आर्थिक योजना नहीं, बल्कि हिंद महासागर में भारत की रणनीतिक उपस्थिति को मजबूत करने का माध्यम है।
बीजेपी नेताओं के मुताबिक:
यह परियोजना मलक्का स्ट्रेट के पास भारत की स्थिति को मजबूत करेगी
अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए भारत को एक बड़ा ट्रांसशिपमेंट हब बनाएगी
चीन की “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” रणनीति का जवाब देगी
सरकार का दावा है कि इस परियोजना से आने वाले दशकों में निवेश, रोज़गार और इंफ्रास्ट्रक्चर का बड़ा विस्तार होगा।
क्या है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट?
यह परियोजना अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के दक्षिणी छोर पर स्थित ग्रेट निकोबार द्वीप में विकसित की जा रही है।
प्रमुख घटक:
एक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट
एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
एक पावर प्लांट
एक ग्रीनफील्ड टाउनशिप
यह पूरी योजना लगभग 166 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली होगी और इसे वैश्विक समुद्री व्यापार मार्गों से जोड़ने के उद्देश्य से तैयार किया गया है।
कॉरपोरेट कनेक्शन पर उठते सवाल
इस परियोजना के साथ-साथ देश में एक बार फिर बड़े उद्योगपतियों की भूमिका पर बहस तेज़ हो गई है, खासकर Gautam Adani और उनके समूह को लेकर।
विपक्ष का आरोप है कि पिछले कुछ वर्षों में:
कई एयरपोर्ट्स का संचालन निजी कंपनियों को सौंपा गया
बंदरगाह और लॉजिस्टिक्स सेक्टर में बड़े कॉरपोरेट समूहों की हिस्सेदारी बढ़ी
सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्तियों के निजीकरण की गति तेज़ हुई
आलोचकों का कहना है कि इससे “आर्थिक शक्ति का केंद्रीकरण” हो रहा है और प्राकृतिक संसाधनों तक सीमित लोगों की पहुंच बन रही है।
हालांकि सरकार इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहती है कि यह आर्थिक सुधार और निजी निवेश को बढ़ावा देने की नीति का हिस्सा है।
पर्यावरणीय खतरा: लाखों पेड़ और जैव विविधता दांव पर
ग्रेट निकोबार द्वीप दुनिया के सबसे समृद्ध जैव-विविधता वाले क्षेत्रों में से एक है। विशेषज्ञों के अनुसार:
यहां लाखों पेड़ मौजूद हैं
दुर्लभ प्रजातियों के जीव-जंतु पाए जाते हैं
यह क्षेत्र समुद्री कछुओं के प्रजनन के लिए महत्वपूर्ण है
पर्यावरणविदों का कहना है कि इस परियोजना से:
बड़े पैमाने पर वनों की कटाई होगी
पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित हो सकता है
जलवायु पर दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है
कुछ अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने तो यहां तक चेतावनी दी है कि यह परियोजना कुछ जनजातियों के अस्तित्व के लिए “डेथ सेंटेंस” साबित हो सकती है।
आदिवासी समुदायों का संकट: पहचान और अस्तित्व की लड़ाई
ग्रेट निकोबार द्वीप पर कई विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह रहते हैं, जिनमें:
शॉम्पेन
निकोबारी
जारवा (अंडमान क्षेत्र में)
इन समुदायों की जीवनशैली पूरी तरह जंगल और प्रकृति पर आधारित है।
स्थानीय लोगों की मुख्य चिंताएं:
विस्थापन का खतरा
सांस्कृतिक पहचान का नुकसान
बाहरी आबादी के आने से सामाजिक और स्वास्थ्य संकट
कई आदिवासी नेताओं का आरोप है कि उनसे बिना पर्याप्त संवाद और सहमति के यह परियोजना लागू की जा रही है।
रणनीतिक महत्व: क्यों अहम है यह प्रोजेक्ट?
ग्रेट निकोबार का स्थान बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह:
मलक्का स्ट्रेट के पास स्थित है (दुनिया का सबसे व्यस्त समुद्री मार्ग)
हिंद महासागर में व्यापार और सुरक्षा के लिहाज से केंद्रीय बिंदु है
विशेषज्ञों का मानना है कि:
यह परियोजना भारत को वैश्विक व्यापार में बड़ा खिलाड़ी बना सकती है
चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने में मदद कर सकती है
विकास बनाम विनाश: असली बहस क्या है?
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट ने देश के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है:
👉 क्या आर्थिक विकास के लिए पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों की कीमत चुकाना सही है?
👉 क्या रणनीतिक मजबूती के नाम पर स्थानीय समुदायों को पीछे छोड़ा जा सकता है?
👉 क्या विकास और संरक्षण के बीच संतुलन संभव है?
निष्कर्ष:-
पारदर्शिता और संतुलन ही समाधान
यह स्पष्ट है कि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट सिर्फ़ एक इंफ्रास्ट्रक्चर योजना नहीं, बल्कि भारत के विकास मॉडल की परीक्षा है।
आने वाले समय में सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी:
पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित करना
