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ज़ा संघर्ष में विदेशी पासपोर्ट धारक सैनिक? नए आँकड़ों से अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही पर सवाल

 15 फरवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार 

गाज़ा में जारी संघर्ष ने न केवल मानवीय त्रासदी और भू-राजनीतिक तनाव को गहरा किया है, बल्कि एक और जटिल प्रश्न को केंद्र में ला खड़ा किया है—विदेशी या द्वि-नागरिकता रखने वाले सैनिकों की भूमिका और उनकी संभावित कानूनी जवाबदेही। हालिया खुलासों और मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टों ने यह संकेत दिया है कि इज़राइली सेना में बड़ी संख्या में ऐसे सैनिक हैं, जिनके पास अमेरिका और यूरोपीय देशों समेत अन्य पश्चिमी राष्ट्रों के पासपोर्ट भी हैं। इस परिघटना ने अंतरराष्ट्रीय क़ानून, युद्ध अपराध और राष्ट्रीय न्याय-प्रणालियों के बीच संबंधों पर नई बहस छेड़ दी है।

विदेशी नागरिकों के आँकड़े क्या बताते हैं?

इज़राइल के सूचना-अधिकार क़ानून के तहत प्राप्त जानकारी के आधार पर कुछ नागरिक संगठनों और वकीलों ने दावा किया है कि इज़राइली सेना में हजारों सैनिक ऐसे हैं, जिनके पास एक से अधिक नागरिकताएँ हैं। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार:

  • बड़ी संख्या में सैनिक अमेरिकी पासपोर्ट धारक बताए गए हैं।

  • फ्रांस, रूस, यूक्रेन, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों के द्वि-नागरिक भी उल्लेखनीय संख्या में बताए गए हैं।

  • लैटिन अमेरिकी देशों—ब्राज़ील, अर्जेंटीना, मैक्सिको, कोलंबिया—से जुड़े द्वि-नागरिकों की मौजूदगी का भी उल्लेख है।

इज़राइली सेना ने स्पष्ट किया है कि बहु-नागरिकता रखने वाले सैनिकों को देश-वार वर्गीकरण में एक से अधिक बार गिना जा सकता है, जिससे कुल संख्या का आकलन जटिल हो जाता है। फिर भी, इन आँकड़ों ने यह प्रश्न उठाया है कि विदेशी पासपोर्ट धारकों की भागीदारी किस हद तक है और उसका कानूनी अर्थ क्या हो सकता है।

अंतरराष्ट्रीय क़ानून में जवाबदेही का सिद्धांत

अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून के तहत युद्ध अपराधों के लिए व्यक्तिगत आपराधिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत स्थापित है। क़ानून विशेषज्ञों का मत है कि:

  • द्वि-नागरिकता अपने-आप में आपराधिक उत्तरदायित्व को समाप्त नहीं करती।

  • यदि किसी व्यक्ति पर युद्ध अपराध का आरोप सिद्ध होता है, तो उसकी राष्ट्रीयता से परे कार्रवाई संभव है।

  • कई देशों के घरेलू क़ानून विदेशी संघर्षों में सैन्य सेवा को सीमित या नियंत्रित करते हैं, जिससे अतिरिक्त कानूनी जोखिम उत्पन्न हो सकते हैं।

इतिहास में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद नाज़ी जर्मनी और जापान के सैन्य अधिकारियों पर विभिन्न न्यायाधिकरणों द्वारा मुक़दमे चलाए जाने के उदाहरण अक्सर दिए जाते हैं, जहाँ राष्ट्रीय क़ानूनों से परे अंतरराष्ट्रीय मानदंड लागू हुए।

राष्ट्रीय न्याय-प्रणालियाँ और संभावित मुक़दमे

कुछ यूरोपीय देशों में मानवाधिकार संगठनों और कानूनी संस्थाओं ने ऐसे मामलों को आगे बढ़ाने के प्रयास किए हैं, जिनमें विदेशी या द्वि-नागरिकता रखने वाले सैनिकों पर आरोप लगाए गए। इनमें हत्या, जबरन विस्थापन और मानवीय कर्मियों पर हमलों जैसे आरोप शामिल बताए जाते हैं।

ब्रिटेन, जर्मनी, बेल्जियम और फ्रांस में दायर याचिकाएँ या प्रारंभिक जाँचें यह दर्शाती हैं कि राष्ट्रीय न्याय-प्रणालियाँ अंतरराष्ट्रीय अपराधों के आरोपों पर विचार कर सकती हैं, बशर्ते साक्ष्य और अधिकार-क्षेत्र (jurisdiction) के मानदंड पूरे हों।

अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों की भूमिका


अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ)

दक्षिण अफ्रीका द्वारा दायर याचिका में यह आरोप लगाया गया कि गाज़ा में सैन्य कार्रवाइयाँ जनसंहार-निरोधक संधि के दायरे में जाँच के योग्य हैं। अंतिम निर्णय में समय लग सकता है, किंतु अंतरिम आदेशों ने मानवीय सहायता और नागरिक सुरक्षा पर वैश्विक ध्यान केंद्रित किया।

अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC)

रोम संविधि के पक्षकार देशों के लिए ICC एक अतिरिक्त परत प्रदान करता है। फ़िलिस्तीन 2015 से सदस्य है, जिससे अदालत के अधिकार-क्षेत्र का प्रश्न और प्रासंगिक हो जाता है। ICC व्यक्तिगत आपराधिक उत्तरदायित्व के मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है, यदि आवश्यक शर्तें पूरी हों।

स्वैच्छिक सेवा बनाम अनिवार्य भर्ती

कानूनी बहस में एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि द्वि-नागरिक, जो विदेश में रहते हैं, अक्सर इज़राइल की अनिवार्य सैन्य सेवा से मुक्त होते हैं। ऐसे में उनकी भर्ती स्वैच्छिक मानी जा सकती है, जो कुछ न्याय-प्रणालियों में उत्तरदायित्व के आकलन को प्रभावित कर सकती है। वकीलों का तर्क है कि स्वैच्छिक सेवा का तत्व आरोपों की गंभीरता के संदर्भ में अलग ढंग से देखा जा सकता है।

डिजिटल साक्ष्य और ट्रैकिंग की नई प्रवृत्ति

सोशल मीडिया ने इस विमर्श को एक नया आयाम दिया है। मानवाधिकार समूह सार्वजनिक रूप से उपलब्ध वीडियो, तस्वीरों और प्रोफ़ाइलों का विश्लेषण कर संभावित साक्ष्य एकत्र कर रहे हैं। यह तरीका:

  • पहचान और घटनाओं के समय-रेखा निर्धारण में सहायक हो सकता है,

  • किंतु साक्ष्य की प्रामाणिकता और न्यायालय में स्वीकार्यता पर प्रश्न भी उठाता है।

कई विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि डिजिटल सामग्री को न्यायिक मानकों के अनुरूप सत्यापित करना अनिवार्य है।

व्यावहारिक चुनौतियाँ

युद्ध अपराधों के आरोपों पर मुक़दमा चलाना सिद्धांततः संभव होते हुए भी व्यवहार में कठिन है:

  1. अधिकार-क्षेत्र और प्रत्यर्पण – अभियुक्त को अदालत के समक्ष लाना जटिल प्रक्रिया है।

  2. प्रत्यक्ष साक्ष्य – संघर्ष-क्षेत्र से विश्वसनीय, प्रथम-हाथ साक्ष्य जुटाना कठिन।

  3. राजनीतिक संवेदनशीलता – अभियोजन एजेंसियाँ कूटनीतिक दबावों के प्रति सतर्क रहती हैं।

बदलती वैश्विक राय और आगे की राह

विश्लेषकों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय जनमत, मीडिया कवरेज और कूटनीतिक समीकरण भविष्य की कानूनी कार्रवाइयों की दिशा तय करने में भूमिका निभा सकते हैं। यदि वैश्विक स्तर पर जवाबदेही की माँग और सशक्त होती है, तो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अधिक सक्रियता देखी जा सकती है।

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