15 फरवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | वरिष्ठ पत्रकार
पारंपरिक मॉडल से सह-निर्माण तक
शिक्षा का पारंपरिक मॉडल शिक्षक-केंद्रित रहा है, जहाँ पाठ्यक्रम, असाइनमेंट और मूल्यांकन की दिशा मुख्यतः संस्थान तय करते थे। किंतु जेन ज़ी के उदय और तकनीकी उन्नति के साथ विश्वविद्यालयों ने महसूस किया कि वास्तविक प्रभाव तभी संभव है, जब छात्र इस प्रक्रिया में बराबरी से भाग लें। “स्टूडेंट्स ऐज़ पार्टनर्स” का विचार इसी समझ से जन्मा—जहाँ छात्र पाठ्यक्रम-डिज़ाइन, प्रोजेक्ट्स और अकादमिक नीतियों के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।
यह दृष्टिकोण केवल प्रतीकात्मक सहभागिता नहीं, बल्कि एक व्यवहारिक रणनीति है। जब छात्र अपने अनुभव, अपेक्षाएँ और तकनीकी सहजता को संस्थागत ढाँचों से जोड़ते हैं, तो शिक्षा अधिक प्रासंगिक और परिणामकारी बनती है। विश्वविद्यालय अब सीखने को स्थिर पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उसे एक गतिशील, अनुभवात्मक प्रक्रिया के रूप में विकसित कर रहे हैं।
GenZ and AI: सहजता, गति और जिज्ञासा
जेन ज़ी के लिए AI किसी प्रयोगशाला की अवधारणा नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की वास्तविकता है। सूचना तक त्वरित पहुँच, सृजन के नए साधन और समस्या-समाधान के स्मार्ट तरीके—ये सब इस पीढ़ी की सोच और कार्यशैली का हिस्सा हैं। यही कारण है कि छात्र व्यवहार और संस्थागत व्यवस्था के बीच कभी-कभी एक disconnect दिखता है। कई छात्र स्वतंत्र रूप से एआई टूल्स का उपयोग कर रहे हैं, जबकि विश्वविद्यालयों की policies और support systems अभी भी अनुकूलन की प्रक्रिया में हैं।
इस अंतर का समाधान प्रतिबंधों में नहीं, बल्कि संवाद और संरचित मार्गदर्शन में निहित है। संस्थानों को समझना होगा कि तकनीक को नकारना न तो व्यावहारिक है और न ही शैक्षणिक दृष्टि से लाभकारी। आवश्यक यह है कि AI Literacy को औपचारिक रूप से पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए, ताकि छात्र तकनीक के उपयोग में दक्ष होने के साथ-साथ उसके सीमाओं और जोखिमों के प्रति भी सजग रहें।
सहयोगी अधिगम: कक्षा से वास्तविक दुनिया तक
विश्वविद्यालयों में सहयोगी अधिगम (collaborative learning) की प्रवृत्ति अब अधिक स्पष्ट है। अंतर्विषयक हैकाथॉन, डेटा–विश्लेषण प्रतियोगिताएँ और समस्या-आधारित प्रोजेक्ट्स छात्रों को वास्तविक चुनौतियों से जोड़ते हैं। ऐसे मंचों पर छात्र AI methods का उपयोग करते हुए जटिल data sets का अध्ययन करते हैं, समाधान तैयार करते हैं और उद्योग-संबंधित दृष्टिकोण विकसित करते हैं।
इस प्रक्रिया में छात्र केवल सैद्धांतिक ज्ञान अर्जित नहीं करते, बल्कि निर्णय-क्षमता, टीमवर्क और innovation जैसे कौशल भी विकसित करते हैं। वे सीखते हैं कि तकनीक का सार्थक उपयोग कैसे किया जाए, परिणामों का आलोचनात्मक मूल्यांकन कैसे हो, और व्यावहारिक संदर्भों में समाधान कैसे लागू किए जाएँ।
AI Ready Graduates: कौशल से आगे, दृष्टिकोण का विकास
AI-ready होने का अर्थ केवल तकनीकी दक्षता तक सीमित नहीं है। यह एक व्यापक मानसिकता का विकास है, जिसमें विश्लेषणात्मक सोच, नैतिक समझ और जिम्मेदार प्रयोग शामिल हैं। भविष्य के पेशेवरों के लिए यह आवश्यक है कि वे AI outputs को आँख मूँदकर स्वीकार न करें, बल्कि उनकी सत्यता, संदर्भ और संभावित त्रुटियों को समझें।
कई विश्वविद्यालय अब ‘लाइव रिसर्च’ जैसे प्रयोगों को पाठ्यक्रम में शामिल कर रहे हैं। छात्र वही deep-learning models और analytical frameworks प्रयोग करते हैं, जिनका उपयोग अग्रणी शोधकर्ता करते हैं। इससे शिक्षा और शोध के बीच की दूरी कम होती है, तथा छात्र अकादमिक प्रक्रिया के भीतर वास्तविक योगदानकर्ता बनते हैं।
नैतिकता और उत्तरदायित्व: तकनीक का संतुलन
AI के व्यापक उपयोग के साथ नैतिक प्रश्न भी अनिवार्य रूप से उभरते हैं—जैसे डेटा गोपनीयता, algorithmic bias, और पारदर्शिता। विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी केवल तकनीक सिखाने तक सीमित नहीं, बल्कि उसके responsible use की संस्कृति विकसित करने की भी है। छात्र यह समझें कि AI एक सहायक माध्यम है, न कि अंतिम सत्य का स्रोत।
इसी संदर्भ में वैचारिक विविधता का सम्मान भी महत्वपूर्ण है। कुछ छात्र पर्यावरणीय या नैतिक कारणों से AI उपयोग पर आपत्ति कर सकते हैं। संतुलित institutional policies इस विविधता को स्वीकारते हुए विकल्प प्रदान करती हैं, जिससे नवाचार और व्यक्तिगत मान्यताओं के बीच सामंजस्य बना रहे।
अकादमिक ईमानदारी: पारदर्शिता की नई दिशा
AI के प्रसार ने मूल्यांकन प्रणालियों को पुनर्विचार के लिए प्रेरित किया है। पारंपरिक plagiarism detection से आगे बढ़ते हुए अब अधिक पारदर्शी मॉडल उभर रहे हैं, जहाँ छात्रों को AI use की स्पष्ट जानकारी और सीमाएँ दी जाती हैं। “रिकॉर्डिंग एवं रिपोर्टिंग ऑफ एआई यूज़” जैसे frameworks भय और भ्रम को कम करते हैं, तथा ईमानदारी की संस्कृति को मजबूत बनाते हैं।
इस दृष्टिकोण का उद्देश्य नियंत्रण नहीं, बल्कि clarity और trust स्थापित करना है। जब छात्र जानते हैं कि तकनीक का उपयोग कब और कैसे स्वीकार्य है, तो वे अधिक जिम्मेदारी और आत्मविश्वास के साथ प्रयोग कर पाते हैं।
शिक्षक और संस्थान: बदलती भूमिकाएँ
AI-enabled learning के युग में शिक्षक की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। शिक्षक केवल विषय विशेषज्ञ नहीं, बल्कि मार्गदर्शक, प्रेरक और नैतिक दिशा-दर्शक के रूप में उभरते हैं। संस्थानों को शिक्षकों के लिए निरंतर training और professional development के अवसर सुनिश्चित करने होंगे, ताकि वे नई तकनीकों को शिक्षण में प्रभावी ढंग से समाहित कर सकें।
इसी प्रकार, विश्वविद्यालयों को अपने infrastructure, governance और academic design को तकनीकी परिवर्तनों के अनुरूप अद्यतन रखना होगा। सीखने का अनुभव तभी सार्थक होगा, जब तकनीक, मानव मार्गदर्शन और संस्थागत समर्थन एक-दूसरे के पूरक बनें।
निष्कर्ष:-
साझेदारी से सशक्त भविष्य
उच्च शिक्षा का भविष्य अब एकतरफा संप्रेषण में नहीं, बल्कि साझेदारी, संवाद और सह-निर्माण में निहित है। जेन ज़ी के छात्र, जो तकनीक के साथ स्वाभाविक सहजता रखते हैं, विश्वविद्यालयों के लिए केवल शिक्षार्थी नहीं, बल्कि नवाचार के सहयात्री हैं। जब वे शिक्षकों और शोधकर्ताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करते हैं, तो शिक्षा केवल ज्ञानार्जन नहीं रहती—वह भविष्य-निर्माण की एक सशक्त प्रक्रिया बन जाती है।
AI एक साधन है, दिशा नहीं। दिशा निर्धारित करती है मानवीय समझ, आलोचनात्मक सोच और नैतिक दृष्टि। यदि विश्वविद्यालय इन मूल्यों के साथ तकनीक को संतुलित करते हैं, तो वे ऐसे स्नातक तैयार कर सकते हैं, जो न केवल AI का कुशल उपयोग करें, बल्कि उसके विकास और प्रभाव को भी जिम्मेदारी से आकार दें।

