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बांग्लादेश की नई सत्ता और नई दिल्ली की रणनीति: भारत के लिए सबसे व्यवहारिक विकल्प क्यों हैं तारिक़ रहमान

बांग्लादेश 14 फरवरी 2026 |✍🏻 Z S Razzaqi | अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार

दक्षिण एशिया की राजनीति में बांग्लादेश का हर बड़ा चुनाव केवल घरेलू सत्ता-समीकरण नहीं बदलता, बल्कि पूरे क्षेत्र की कूटनीतिक धड़ कनों को भी प्रभावित करता है। हालिया चुनावी परिदृश्य में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की वापसी और तारिक़ रहमान के संभावित प्रधानमंत्री बनने की चर्चा ने नई दिल्ली के रणनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। दिलचस्प यह है कि जिन रिश्तों में कभी अविश्वास और वैचारिक दूरी की छाया रही, वही नेतृत्व आज भारत के लिए “सबसे अच्छा” नहीं तो कम से कम “सबसे व्यवहारिक विकल्प” क्यों माना जा रहा है?

यह प्रश्न केवल व्यक्तित्व या पार्टी-राजनीति तक सीमित नहीं, बल्कि बदलती भू-राजनीति, सुरक्षा चिंताओं, आर्थिक हितों और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन के जटिल संगम से जुड़ा है।


बदली हुई ज़मीन: परंपरागत धारणाओं से आगे

बांग्लादेश की राजनीति लंबे समय तक दो प्रमुख ध्रुवों — अवामी लीग और BNP — के बीच घूमती रही है। अतीत में नई दिल्ली की सहजता अक्सर अवामी लीग के साथ अधिक दिखाई देती थी, जबकि BNP को लेकर संदेह, विशेषकर सुरक्षा और क्षेत्रीय सहयोग के संदर्भ में, बार-बार उभरता रहा।

मगर राजनीति स्थिर नहीं होती। समय के साथ रणनीतिक प्राथमिकताएँ बदलती हैं, और देशों के बीच संबंध व्यक्तियों से अधिक नीतियों के आधार पर पुनर्परिभाषित होते हैं। आज भारत के सामने प्राथमिक प्रश्न यह है — किसके साथ स्थिर, पूर्वानुमेय और व्यावहारिक संवाद संभव है?


1. सुरक्षा और स्थिरता: साझा भूगोल की अनिवार्यता

भारत और बांग्लादेश का संबंध केवल पड़ोसी देशों का रिश्ता नहीं, बल्कि साझा सीमाओं, सांस्कृतिक संपर्कों और सुरक्षा ताने-बाने का संयोजन है।

भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की स्थिरता, सीमा-पार अपराध, अवैध तस्करी, और उग्रवादी नेटवर्क जैसे मुद्दे नई दिल्ली के लिए दीर्घकालिक प्राथमिकता रहे हैं। एक मज़बूत और वैध राजनीतिक सरकार से भारत को यह उम्मीद रहती है कि सुरक्षा सहयोग अधिक संस्थागत और भरोसेमंद होगा।

तारिक़ रहमान के हालिया सार्वजनिक बयानों में प्रत्यक्ष भारत-विरोधी तीखेपन की कमी को विश्लेषक एक संकेतात्मक बदलाव के रूप में देखते हैं — जहाँ संवाद और संतुलन की भाषा प्रमुख है।


2. कूटनीतिक यथार्थवाद: आदर्श से अधिक व्यवहारिकता

कूटनीति का एक स्थायी सिद्धांत है — देश उपलब्ध विकल्पों के भीतर सर्वाधिक स्थिर विकल्प चुनते हैं

नई दिल्ली के लिए महत्वपूर्ण यह नहीं कि ढाका में कौन सत्ता में है, बल्कि यह कि सरकार नीतिगत रूप से पूर्वानुमेय (predictable) हो, द्विपक्षीय संवाद में निरंतरता रखे और संवेदनशील मुद्दों पर टकराव की जगह समाधान खोजे।

BNP का “बांग्लादेश फर्स्ट” दृष्टिकोण सतह पर राष्ट्रवादी प्रतीत हो सकता है, पर इसका अर्थ अक्सर राष्ट्रीय हितों के भीतर संतुलित संबंधों से होता है। भारत के लिए यह मॉडल टकराव का नहीं, बल्कि व्यावहारिक संतुलन का संकेत हो सकता है।


3. आर्थिक समीकरण: संपर्क और व्यापार का नया अध्याय

भारत-बांग्लादेश संबंधों का सबसे तेज़ी से विकसित होता आयाम आर्थिक और कनेक्टिविटी सहयोग है।

  • सीमा-पार व्यापार

  • सड़क और रेल संपर्क

  • बंदरगाहों तक पहुँच

  • ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स साझेदारी

भारत के लिए बांग्लादेश केवल एक बाज़ार नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर भारत की आर्थिक जीवनरेखा के रूप में उभर रहा है। यदि नई BNP सरकार इन परियोजनाओं को बाधित करने के बजाय आगे बढ़ाती है, तो नई दिल्ली के लिए यह स्पष्ट लाभकारी स्थिति होगी।


4. चीन-कारक: प्रतिस्पर्धा नहीं, संतुलन की रणनीति

दक्षिण एशिया में चीन की बढ़ती उपस्थिति भारत की सामरिक सोच का केंद्रीय तत्व है। बांग्लादेश ने हाल के वर्षों में बीजिंग के साथ अवसंरचनात्मक और आर्थिक सहयोग को बढ़ाया है।

नई दिल्ली के लिए वास्तविक लक्ष्य यह नहीं कि ढाका चीन से दूरी बनाए, बल्कि यह कि रणनीतिक संतुलन कायम रहे। यदि तारिक़ रहमान के नेतृत्व में सरकार बहुध्रुवीय विदेश नीति अपनाती है, तो भारत इसे संतुलित कूटनीतिक व्यवहार के रूप में देख सकता है।


5. विवाद और प्रत्यर्पण: संभावित नरमी की उम्मीद

भारत और बांग्लादेश के बीच कुछ मुद्दे समय-समय पर तनाव के स्रोत रहे हैं। कूटनीतिक हलकों में यह धारणा है कि नई सरकार यदि विवादित राजनीतिक प्रश्नों को प्रतीकात्मक स्तर तक सीमित रखे और उन्हें व्यापक द्विपक्षीय एजेंडे पर हावी न होने दे, तो संबंधों में स्थिरता बनी रह सकती है।

हालाँकि, यह पूर्णतः अनुमान का क्षेत्र है, पर भारत के नीति-निर्माता अक्सर ऐसे परिदृश्य को जोखिम-न्यूनन दृष्टिकोण से देखते हैं।


6. अल्पसंख्यक सुरक्षा: धारणा, राजनीति और वास्तविकता

भारत में बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति एक संवेदनशील राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा है। नई दिल्ली के लिए यह केवल मानवीय प्रश्न नहीं, बल्कि घरेलू राजनीतिक विमर्श से भी जुड़ा है।

नई BNP सरकार के लिए यहाँ विश्वसनीयता की परीक्षा होगी। यदि वह आंतरिक सामाजिक संतुलन को सुदृढ़ करते हुए ठोस प्रशासनिक कदम दिखाती है, तो यह द्विपक्षीय विश्वास को मज़बूत कर सकता है।


7. अतीत बनाम वर्तमान: क्या बदल रही है राजनीतिक भाषा?

राजनीति में स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होते — केवल स्थायी हित होते हैं। तारिक़ रहमान और BNP के साथ भारत के रिश्तों में अतीत की जटिलताएँ रही हैं, पर वर्तमान में जो महत्वपूर्ण है वह है नीतिगत संकेत और व्यावहारिक व्यवहार

नई दिल्ली के लिए केंद्रीय प्रश्न यही है:
क्या नया नेतृत्व सहयोग, संतुलन और संस्थागत संवाद की दिशा में आगे बढ़ेगा?


भारत की रणनीतिक सोच: क्यों “सबसे व्यवहारिक विकल्प”?

नई दिल्ली के दृष्टिकोण से तारिक़ रहमान का नेतृत्व आकर्षक इसलिए माना जा रहा है क्योंकि:

  • क्षेत्रीय स्थिरता की संभावना

  • संवाद-उन्मुख सार्वजनिक रुख़

  • आर्थिक सहयोग की गुंजाइश

  • सुरक्षा समन्वय की उम्मीद

  • शक्ति-संतुलन में लचीलापन

यह आकलन आदर्शवाद पर नहीं, बल्कि व्यावहारिक कूटनीतिक गणनाओं पर आधारित है।


निष्कर्ष:-

 वास्तविक परीक्षा अभी शेष

चुनावी नतीजे और बधाई संदेश केवल प्रारंभिक संकेत होते हैं। किसी भी द्विपक्षीय रिश्ते की दिशा अंततः नीतिगत निर्णयों, प्रशासनिक प्राथमिकताओं और राजनीतिक इच्छाशक्ति से तय होती है।

तारिक़ रहमान भारत के लिए “सबसे अच्छा विकल्प” हैं या नहीं — यह भविष्य की घटनाएँ तय करेंगी। पर वर्तमान भू-राजनीतिक संदर्भ में उन्हें “सबसे व्यवहारिक विकल्प” मानने की सोच नई दिल्ली की रणनीतिक यथार्थवाद का प्रतिबिंब अवश्य है।

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