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आख़िर मोदी सरकार क्यों बचाना चाहती है SEBI चीफ को?

 भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) की प्रमुख माधबी पुरी बुच को संसद की लोक लेखा समिति (PAC) ने पूछताछ के लिए तलब किया है। आगामी 24 अक्टूबर को होने वाली इस पेशी में यह देखना दिलचस्प होगा कि बुच खुद पेश होती हैं या किसी प्रतिनिधि को अपना पक्ष रखने के लिए भेजती हैं।


क्या हैं आरोप?
अमेरिकी रिसर्च फर्म हिंडनबर्ग द्वारा किए गए हालिया खुलासों में SEBI प्रमुख माधबी पुरी बुच पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। आरोपों के मुताबिक, बुच ने अदानी समूह की कथित वित्तीय अनियमितताओं और शेल कंपनियों से जुड़े मामलों में आंखें मूंद रखी थीं। ये वही SEBI है जो भारत की वित्तीय व्यवस्था पर निगरानी रखता है। ऐसे में इसकी प्रमुख पर इतने गंभीर आरोपों के बावजूद जांच एजेंसियों और मंत्रालयों की निष्क्रियता कई सवाल खड़े करती है।

सरकार की भूमिका पर उठते सवाल
मामला तब और पेचीदा हो गया जब विपक्ष के नेतृत्व वाली PAC ने माधबी पुरी बुच को बुलाने का निर्णय लिया। PAC की इस पहल पर खुद इसके सदस्य और झारखंड के गोड्डा से भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने अड़ंगा डालने की कोशिश की। यह घटना मोदी सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करती है कि क्या वह SEBI प्रमुख को बचाने की कोशिश कर रही है?

वित्तीय व्यवस्था पर असर
एक ऐसा संस्थान जो देश की वित्तीय प्रणाली का प्रहरी है, उसकी प्रमुख पर लगे इन आरोपों से देश के आर्थिक ढांचे पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे में यह समझना ज़रूरी हो जाता है कि PAC की कार्यवाही और इस मामले की जांच किस दिशा में जाती है।

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