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संभल का सद्भावना मेला बना सियासी तंगनज़री का शिकार? नेज़ा मेले पर रोक को लेकर उठे गंभीर सवाल

 23 मई 2026 | विस्तृत विश्लेषण |✍🏻 Z S Razzaqi |वरिष्ठ पत्रकार 

उत्तर प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक फैसलों को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। संभल का ऐतिहासिक “सद्भावना मेला” यानी नेज़ा मेला, जो वर्षों से सांप्रदायिक सौहार्द, सूफी परंपरा और साझा संस्कृति की पहचान माना जाता रहा है, अब प्रशासनिक रोक और कथित भेदभावपूर्ण रवैये की वजह से चर्चा के केंद्र में आ गया है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे संदेशों और स्थानीय लोगों की नाराज़गी ने इस पूरे मामले को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।

बहस केवल एक मेले की अनुमति तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि अब सवाल इस बात पर उठने लगे हैं कि क्या उत्तर प्रदेश में प्रशासनिक निर्णय धार्मिक पहचान देखकर लिए जा रहे हैं? क्या सत्ता को खुश करने के लिए कुछ अधिकारी सामाजिक संतुलन और संवैधानिक मूल्यों तक को दरकिनार कर रहे हैं?

500 वर्षों पुरानी परंपरा पर सवाल

बताया जा रहा है कि बहराइच स्थित सालार मसूद गाज़ी की दरगाह पर लगने वाले पारंपरिक मेले की अनुमति न देने के फैसले ने मुस्लिम समुदाय के एक बड़े वर्ग में असंतोष पैदा कर दिया है। लोगों का आरोप है कि जहां एक ओर कुछ धार्मिक आयोजनों को खुली छूट और प्रशासनिक संरक्षण मिलता दिखाई देता है, वहीं मुस्लिम समुदाय से जुड़े आयोजनों पर लगातार सख्ती, निगरानी और रोक लगाने जैसी स्थितियां पैदा की जा रही हैं।

इसी संदर्भ में संभल के नेज़ा मेले का मुद्दा भी जोर पकड़ रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल रहा है, जहां हर समुदाय के लोग शामिल होते रहे हैं। इसके बावजूद प्रशासनिक रवैया ऐसा दिखाई दे रहा है मानो इस परंपरा को धीरे-धीरे खत्म करने की कोशिश की जा रही हो।

“सद्भावना” के मेले को संदेह की नज़र से क्यों?

नेज़ा मेला वर्षों से संभल की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा माना जाता रहा है। इस मेले में सूफी परंपराओं, कव्वाली, लोक संस्कृति और आपसी भाईचारे की झलक देखने को मिलती रही है। लेकिन हाल के वर्षों में ऐसे आयोजनों को लेकर जिस तरह का प्रशासनिक दबाव, अनुमति संबंधी अड़चनें और निगरानी बढ़ी है, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि प्रशासन अब सांस्कृतिक आयोजनों को भी धार्मिक चश्मे से देखने लगा है। उनका कहना है कि यदि किसी आयोजन का संबंध मुस्लिम समाज से होता है, तो उसे तुरंत “कानून व्यवस्था” और “संवेदनशीलता” के दायरे में डाल दिया जाता है, जबकि अन्य आयोजनों को सहज रूप से अनुमति मिल जाती है।

यही वजह है कि अब यह मुद्दा केवल संभल या बहराइच तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि यह देश के संवैधानिक ढांचे और समान नागरिक अधिकारों पर भी बहस का विषय बनता जा रहा है।

क्या अधिकारियों पर सत्ता को खुश करने का दबाव?

इस पूरे विवाद के बीच सबसे गंभीर आरोप प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका को लेकर लगाए जा रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि कुछ अधिकारी निष्पक्ष प्रशासन की बजाय “राजनीतिक संदेश” देने में अधिक रुचि दिखा रहे हैं। आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि सत्ता के प्रति अपनी वफादारी साबित करने के लिए कुछ अधिकारी एक समुदाय विशेष के धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों पर अत्यधिक कठोरता दिखा रहे हैं।

सोशल मीडिया पर वायरल पोस्टों में यह तक कहा जा रहा है कि “एक समुदाय को दबाकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की जा रही है।” हालांकि प्रशासन की ओर से अभी तक इन आरोपों पर कोई विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

दरगाह कमेटियों और स्थानीय नेतृत्व की चुप्पी पर भी सवाल

मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू दरगाह कमेटियों और स्थानीय नेतृत्व की चुप्पी को लेकर उठ रहा है। कई लोग सवाल कर रहे हैं कि जब वर्षों पुरानी परंपराओं पर रोक लगाई जा रही है और जायरीन को परेशान किए जाने के आरोप लग रहे हैं, तब संबंधित कमेटियां और प्रभावशाली लोग खुलकर सामने क्यों नहीं आ रहे?

कुछ स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यह खामोशी डर, राजनीतिक दबाव या समझौते की ओर इशारा करती है। वहीं कई लोग यह भी मानते हैं कि यदि किसी निर्णय से असहमति है, तो लोकतांत्रिक और कानूनी रास्ते अपनाए जाने चाहिए थे।

सामाजिक सौहार्द पर पड़ सकता है असर

विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत जैसे विविधताओं वाले देश में धार्मिक और सांस्कृतिक मेलों का महत्व केवल आस्था तक सीमित नहीं होता। ये आयोजन समाज के अलग-अलग वर्गों को जोड़ने का काम करते हैं। यदि किसी भी समुदाय को यह महसूस होने लगे कि उसके सांस्कृतिक अधिकारों को व्यवस्थित तरीके से सीमित किया जा रहा है, तो इससे सामाजिक असंतोष और अविश्वास बढ़ सकता है।

संभल का नेज़ा मेला लंबे समय से “सद्भावना” और “साझा संस्कृति” का प्रतीक रहा है। ऐसे में इस पर उठे विवाद ने लोगों को भावनात्मक रूप से भी प्रभावित किया है।


लोकतंत्र में समानता सबसे बड़ा आधार

भारत का संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता देता है। ऐसे में प्रशासनिक निर्णयों को लेकर पारदर्शिता और निष्पक्षता बेहद जरूरी हो जाती है। यदि किसी आयोजन पर रोक लगाई जाती है, तो उसके पीछे स्पष्ट और समान रूप से लागू होने वाले नियम होने चाहिए, ताकि किसी समुदाय को पक्षपात का अहसास न हो।

आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासनिक सख्ती वास्तव में सुरक्षा और कानून व्यवस्था के लिए है, या फिर यह धीरे-धीरे सामाजिक और धार्मिक असंतुलन की भावना को जन्म दे रही है?

संभल के नेज़ा मेले को लेकर उठी बहस आने वाले समय में केवल एक स्थानीय विवाद नहीं रहेगी, बल्कि यह इस बात की परीक्षा भी बनेगी कि भारत अपनी साझा संस्कृति, धार्मिक समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों को किस हद तक बचा पाता है।




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