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लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव: बजट सत्र में बढ़ा संस्थागत तनाव, सदन की कार्यप्रणाली पर गहराते सवाल

 

संसद के बजट सत्र के बीच भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण और असाधारण घटनाक्रम सामने आया है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष ने औपचारिक रूप से अविश्वास प्रस्ताव (No-Confidence Motion) प्रस्तुत कर दिया है। संसदीय इतिहास के परिप्रेक्ष्य में यह कदम अत्यंत दुर्लभ माना जाता है, क्योंकि अध्यक्ष पद को परंपरागत रूप से राजनीतिक टकराव से ऊपर, निष्पक्ष और संस्थागत गरिमा का प्रतीक समझा जाता है।

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इस प्रस्ताव ने पहले से ही गतिरोध, व्यवधान और तीखी बहसों से घिरे सदन के वातावरण को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।


प्रस्ताव का औपचारिक प्रस्तुतीकरण: 118 सांसदों के हस्ताक्षर

विपक्षी दलों की ओर से यह प्रस्ताव लोकसभा के महासचिव उत्पल कुमार सिंह को सौंपा गया। प्रस्ताव के साथ कुल 118 सांसदों के हस्ताक्षर होने का दावा किया गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के. सुरेश, गौरव गोगोई और मोहम्मद जावेद ने इस नोटिस को औपचारिक रूप से प्रस्तुत किया।

संख्या की दृष्टि से यह हस्ताक्षर समर्थन केवल प्रतीकात्मक विरोध नहीं, बल्कि एक संगठित राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।


ओम बिरला की त्वरित प्रतिक्रिया: “नोटिस की जांच कर प्रक्रिया तेज करें”

अविश्वास प्रस्ताव जमा होने के करीब एक घंटे के भीतर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सचिवालय को निर्देश जारी करते हुए कहा:

“अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस की विधिक और प्रक्रियात्मक जांच की जाए तथा आगे की प्रक्रिया को शीघ्र गति दी जाए।”

यह प्रतिक्रिया राजनीतिक और प्रक्रियात्मक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण है। सामान्यतः अध्यक्ष के खिलाफ ऐसे प्रस्तावों में प्रतिक्रिया और निर्णय-प्रक्रिया अत्यंत सावधानीपूर्वक चलती है, क्योंकि यह सीधे सदन की संवैधानिक संरचना से जुड़ा विषय होता है।


संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 94(c) का उल्लेख

विपक्ष द्वारा लाया गया यह प्रस्ताव भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94(c) के अंतर्गत पेश किया गया है। यह अनुच्छेद लोकसभा अध्यक्ष के पद से हटाए जाने से संबंधित है और इसके तहत सदन को अध्यक्ष के आचरण और निष्पक्षता पर विचार का अधिकार प्राप्त है।

प्रस्ताव के नोटिस में आरोप लगाया गया है कि अध्यक्ष ने:

  • सदन की कार्यवाही का संचालन

  • विपक्ष को अवसर प्रदान करने के मानदंड

  • तथा अनुशासनात्मक निर्णय

“स्पष्ट रूप से पक्षपातपूर्ण ढंग” से निभाए हैं।


विपक्ष के मुख्य आरोप: लोकतांत्रिक संतुलन पर प्रश्न

प्रस्ताव में दर्ज आरोप केवल औपचारिक असहमति नहीं, बल्कि संसदीय प्रक्रिया के मूल तत्वों से जुड़े हैं। विपक्ष का कहना है कि हालिया घटनाओं ने लोकतांत्रिक संवाद को प्रभावित किया:

  1. राहुल गांधी को भाषण पूरा न करने देना
    धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान विपक्ष के नेता राहुल गांधी को कथित रूप से अपना वक्तव्य पूर्ण करने की अनुमति नहीं दी गई।

  2. आठ सांसदों का निलंबन
    विपक्षी सांसदों के निलंबन को विपक्ष ने “अत्यधिक कठोर” और “एकतरफा कार्रवाई” बताया।

  3. विपक्षी नेताओं को बोलने का अवसर न मिलना
    नोटिस में यह भी कहा गया कि विपक्ष के नेताओं को बार-बार बोलने का अवसर देने से रोका गया, जो संसदीय परंपराओं के विपरीत है।

विपक्ष का तर्क है कि ये घटनाएँ “संसदीय लोकतंत्र के बुनियादी संतुलन” पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं।


बजट सत्र और गतिरोध: लगातार बाधित कार्यवाही

लोकसभा पिछले कई दिनों से निरंतर व्यवधानों का सामना कर रही है। नारेबाज़ी, हंगामा, स्थगन और तीखी बहसों ने नियमित विधायी कार्य को प्रभावित किया। गतिरोध की प्रमुख पृष्ठभूमि में रहा:

  • राहुल गांधी द्वारा पूर्व सेना प्रमुख जनरल (सेवानिवृत्त) एम.एम. नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक के अंश उद्धृत करने का प्रयास

  • भारत-चीन संबंधों पर राजनीतिक विवाद

  • कार्यवाही के संचालन पर प्रक्रियात्मक असहमति

इन मुद्दों ने सदन में राजनीतिक तनाव को और बढ़ाया।


असाधारण संसदीय क्षण: प्रधानमंत्री का जवाब नहीं

लगातार व्यवधानों के कारण सदन में एक दुर्लभ स्थिति तब बनी जब:

करीब 22 वर्षों में पहली बार राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव प्रधानमंत्री के जवाब के बिना पारित हुआ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का निर्धारित संबोधन स्थगित हुआ, और अंततः राष्ट्रपति के अभिभाषण को ध्वनि मत (Voice Vote) के माध्यम से पारित किया गया। संसदीय परंपराओं में इसे एक अत्यंत असामान्य घटना माना जाता है।


सुरक्षा और ‘अप्रत्याशित घटनाओं’ का संदर्भ

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने व्यवधानों के बीच यह दावा भी किया कि उन्हें ऐसी विश्वसनीय जानकारी प्राप्त हुई थी कि:

  • कुछ सांसद प्रधानमंत्री की सीट तक पहुँच सकते थे

  • जिससे “अप्रत्याशित घटनाएँ” हो सकती थीं

हालाँकि, विपक्षी दलों ने इन दावों को राजनीतिक आरोप बताते हुए खारिज कर दिया और कहा कि यह विपक्ष की छवि को नुकसान पहुँचाने का प्रयास है।


गतिरोध समाप्त करने के प्रयास: संवाद और बैठकों का दौर

सदन में बढ़ते तनाव को देखते हुए अध्यक्ष बिरला ने:

  • केंद्र सरकार के वरिष्ठ नेताओं

  • तथा विपक्ष के शीर्ष नेतृत्व

के साथ कई दौर की बातचीत की। इन बैठकों में राहुल गांधी, तृणमूल कांग्रेस के अभिषेक बनर्जी और समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव जैसे प्रमुख नेता शामिल रहे।

विपक्ष की प्रमुख मांगें थीं:

  • विपक्ष के नेता को निर्बाध बोलने का अवसर

  • निलंबित सांसदों पर पुनर्विचार

  • कार्यवाही में निष्पक्ष संतुलन


राजनीतिक और संस्थागत संकेत: बहस का व्यापक आयाम

विश्लेषकों का मानना है कि अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव केवल संसदीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक गहरा राजनीतिक और संस्थागत संकेत भी है। यह घटना कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है:

  • क्या सदन में सत्ता-विपक्ष संवाद का संतुलन बिगड़ रहा है?

  • क्या संसदीय प्रक्रियाओं की निष्पक्षता पर विश्वास प्रभावित हो रहा है?

  • क्या यह केवल राजनीतिक रणनीति है या व्यापक संस्थागत असंतोष?

अध्यक्ष पद की संवैधानिक गरिमा के कारण यह बहस और भी संवेदनशील हो जाती है।


आगे की राह: प्रक्रिया, राजनीति और संभावित प्रभाव

अब पूरा ध्यान लोकसभा सचिवालय की प्रक्रियात्मक जांच और संवैधानिक कदमों पर रहेगा। यदि प्रस्ताव औपचारिक रूप से स्वीकार्य पाया जाता है, तो:

  • सदन में एक महत्वपूर्ण बहस संभव है

  • राजनीतिक ध्रुवीकरण और तेज हो सकता है

  • तथा संसदीय कार्यवाही की दिशा पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है


निष्कर्ष:-

 लोकतांत्रिक विमर्श का निर्णायक क्षण

लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव भारतीय लोकतंत्र के लिए एक साधारण घटना नहीं है। यह न केवल राजनीतिक टकराव को रेखांकित करता है, बल्कि संसदीय संस्थाओं की निष्पक्षता, संवाद संस्कृति और लोकतांत्रिक मर्यादा पर गहरी चर्चा की आवश्यकता भी दर्शाता है।

आने वाले दिन यह तय करेंगे कि यह घटनाक्रम केवल एक राजनीतिक विवाद तक सीमित रहेगा या भारतीय संसदीय इतिहास में एक निर्णायक मोड़ के रूप में दर्ज होगा।

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