पश्चिम बंगाल 21 सितम्बर 2026:
Z S Razzaqi | Morning Dilli — India’s Window to the World
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नाम, चुनाव चिह्न और संगठनात्मक नियंत्रण को लेकर जारी विवाद अब सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे तक पहुंच गया है। पार्टी की पहचान पर दो प्रतिद्वंद्वी गुटों के दावों और चुनाव आयोग की अंतरिम व्यवस्था के बीच ममता बनर्जी ने न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की है। सोमवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने उनकी याचिका सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई।
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर 6 अक्टूबर को उपचुनाव निर्धारित हैं। चुनाव आयोग के अंतरिम आदेश के कारण दोनों गुटों को फिलहाल पार्टी के मूल नाम और उसके आरक्षित चुनाव चिह्न ‘फूल और घास’ के इस्तेमाल से रोक दिया गया है। ऐसे में पार्टी की पहचान, चुनावी प्रचार और संगठनात्मक अधिकारों से जुड़े सवालों पर कानूनी प्रक्रिया का असर महत्वपूर्ण हो सकता है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में याचिका सूचीबद्ध किए जाने की सहमति को चुनाव आयोग के आदेश पर रोक या ममता बनर्जी के पक्ष में अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता। फिलहाल अदालत ने मामले को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने की बात कही है।
कपिल सिब्बल ने उठाया सुनवाई में देरी का सवाल
ममता बनर्जी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में मामले का उल्लेख करते हुए तत्काल सुनवाई की मांग की। उन्होंने अदालत को बताया कि चुनाव आयोग के समक्ष पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न से जुड़ी कार्यवाही जून में शुरू हुई थी और ममता बनर्जी के गुट की ओर से जुलाई में जवाब भी दाखिल कर दिया गया था।
सिब्बल की दलील के मुताबिक, इसके बावजूद आयोग ने लंबे समय तक कोई निर्णय नहीं लिया। इसके बाद नंदीग्राम और रेजीनगर उपचुनावों की अधिसूचना जारी होने के बाद 17 सितंबर को अंतरिम आदेश जारी कर दिया गया।
उन्होंने इस समय-निर्धारण पर सवाल उठाते हुए अदालत से मामले की तत्काल सुनवाई करने और चुनाव आयोग के आदेश पर रोक लगाने का अनुरोध किया।
इस दलील के केंद्र में केवल पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न का सवाल नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान अंतरिम व्यवस्था लागू किए जाने की वैधता और उसके प्रभाव का मुद्दा भी है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा—दूसरे पक्ष को भी मिलेगा सुनवाई का अवसर
मामले का उल्लेख सुनने के बाद मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने तत्काल विस्तृत बहस की अनुमति नहीं दी। उन्होंने कहा कि दूसरे पक्ष को भी अपनी दलीलें रखने का अवसर मिलना चाहिए और याचिका सूचीबद्ध की जाएगी।
कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर टिप्पणी करते हुए कहा कि आयोग नए मानदंड स्थापित कर रहा है। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने दोहराया कि मामले को सूचीबद्ध किया जाएगा।
यहां अदालत की टिप्पणी और अंतिम न्यायिक आदेश के बीच अंतर समझना जरूरी है। याचिका सूचीबद्ध किए जाने का अर्थ है कि मामले को सुनवाई के लिए आगे बढ़ाया जाएगा। इससे अपने-आप आयोग का अंतरिम आदेश निरस्त नहीं हो जाता।
उपलब्ध समाचार विवरण के अनुसार, सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के आदेश पर रोक नहीं लगाई। फिलहाल सुनवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ने का रास्ता साफ हुआ है।
चुनाव आयोग के सामने दो गुटों ने किया पार्टी पर दावा
तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर विवाद तब सामने आया, जब ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट और पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले प्रतिद्वंद्वी गुट ने पार्टी के नाम, चुनाव चिह्न और संगठनात्मक नियंत्रण पर अपने-अपने दावे पेश किए।
दोनों पक्षों के बीच विवाद का एक प्रमुख आधार यह है कि पार्टी की वैध पहचान किसके साथ जुड़ी है और संगठनात्मक ढांचे पर अधिकार किस गुट का है।
चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद 17 सितंबर को अंतरिम व्यवस्था जारी की। इसके तहत आगामी उपचुनावों के लिए दोनों गुटों को फिलहाल All India Trinamool Congress नाम और उसके आरक्षित ‘फूल एवं घास’ चुनाव चिह्न का इस्तेमाल करने से रोक दिया गया।
इस व्यवस्था ने विवाद को तत्काल चुनावी महत्व दे दिया है। अब दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न के साथ उपचुनाव में उतरना होगा, जब तक कि सक्षम प्राधिकारी या अदालत की ओर से आगे कोई आदेश नहीं आता।
ममता बनर्जी के गुट को मिला नया नाम और ‘Football Player’ चिह्न
चुनाव आयोग की अंतरिम व्यवस्था के अनुसार, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को ‘Mamata All India Trinamool Congress’ नाम और ‘Football Player’ चुनाव चिह्न आवंटित किया गया है।
वहीं, ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले प्रतिद्वंद्वी गुट को ‘Democratic Trinamool Congress’ नाम और ‘Envelope’ यानी लिफाफा चुनाव चिह्न दिया गया है।
इस अंतरिम व्यवस्था के चलते दोनों पक्षों की चुनावी पहचान अलग हो गई है। आगामी उपचुनावों में पार्टी के मूल नाम और आरक्षित चिह्न के बजाय उन्हें आयोग की ओर से निर्धारित वैकल्पिक पहचान का इस्तेमाल करना होगा।
हालांकि, इस व्यवस्था को पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर अंतिम कानूनी फैसला नहीं समझा जाना चाहिए। विवाद का स्थायी समाधान आगे की न्यायिक और संबंधित वैधानिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
संगठनात्मक नियंत्रण पर भी आमने-सामने दोनों पक्ष
तृणमूल कांग्रेस के भीतर विवाद केवल नाम और चुनाव चिह्न तक सीमित नहीं है। पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और उसकी वैधता को लेकर भी दोनों गुटों के बीच मतभेद सामने आए हैं।
ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने दावा किया कि पार्टी का मौजूदा संगठनात्मक ढांचा अब वैध नहीं रह गया है। इसके विपरीत, ममता बनर्जी के गुट ने इस दावे का विरोध करते हुए अपने संगठनात्मक ढांचे को वैध बताया।
दोनों पक्षों के इन दावों पर चुनाव आयोग के समक्ष सुनवाई हुई। इसके बाद आयोग ने अंतरिम व्यवस्था लागू की।
अब सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका के माध्यम से आयोग के फैसले और उसकी प्रक्रिया को चुनौती दी गई है। आगे की सुनवाई में इन मुद्दों पर दोनों पक्षों की दलीलें महत्वपूर्ण हो सकती हैं।
18 सितंबर को दाखिल हुई थी सुप्रीम कोर्ट में याचिका
ममता बनर्जी की ओर से चुनाव आयोग के अंतरिम फैसले को चुनौती देते हुए 18 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी। यह याचिका अधिवक्ता अभिनव सिंह के माध्यम से दाखिल की गई।
याचिका में आयोग की अंतरिम व्यवस्था को चुनौती दी गई है। सोमवार को कपिल सिब्बल ने अदालत में तत्काल सुनवाई की मांग रखी और आयोग के आदेश पर रोक लगाने का अनुरोध किया।
मुख्य न्यायाधीश की ओर से याचिका सूचीबद्ध करने की बात कहे जाने के बाद अब आगे की न्यायिक कार्यवाही पर निगाहें टिकी हैं।
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि अदालत सुनवाई के दौरान आयोग के आदेश पर कोई अंतरिम राहत देगी या नहीं। इस संबंध में अंतिम निर्णय सामने आने तक आयोग की मौजूदा व्यवस्था को ही प्रभावी अंतरिम स्थिति के रूप में देखना होगा।
नंदीग्राम और रेजीनगर उपचुनाव से पहले क्यों महत्वपूर्ण है मामला?
नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर 6 अक्टूबर को निर्धारित उपचुनावों से पहले यह विवाद इसलिए महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि चुनाव आयोग की व्यवस्था सीधे दोनों गुटों की चुनावी पहचान से जुड़ी है।
पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न मतदाताओं के लिए राजनीतिक पहचान के प्रमुख माध्यम होते हैं। ऐसे में मूल नाम और आरक्षित चिह्न के इस्तेमाल पर रोक से दोनों गुटों को वैकल्पिक पहचान के साथ चुनावी प्रक्रिया में आगे बढ़ना होगा।
हालांकि, इस अंतरिम व्यवस्था का वास्तविक चुनावी प्रभाव क्या होगा, इसका निष्कर्ष अभी निकालना जल्दबाजी होगी। इसके लिए चुनावी प्रचार, मतदाताओं की प्रतिक्रिया और आगे आने वाले कानूनी आदेशों से संबंधित जानकारी आवश्यक होगी।
मामले से जुड़े प्रमुख तथ्य
- 17 सितंबर 2026: चुनाव आयोग ने दोनों गुटों के लिए अंतरिम व्यवस्था जारी की।
- 18 सितंबर 2026: ममता बनर्जी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई।
- 21 सितंबर 2026: वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तत्काल सुनवाई की मांग की।
- सुप्रीम कोर्ट: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिका सूचीबद्ध करने की बात कही।
- ममता बनर्जी का गुट: ‘Mamata All India Trinamool Congress’ नाम और ‘Football Player’ चिह्न।
- प्रतिद्वंद्वी गुट: ‘Democratic Trinamool Congress’ नाम और ‘Envelope’ चिह्न।
- 6 अक्टूबर 2026: नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा उपचुनाव निर्धारित हैं।
- वर्तमान स्थिति: उपलब्ध समाचार विवरण के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने अभी चुनाव आयोग के अंतरिम आदेश पर रोक नहीं लगाई है।
निष्कर्ष:
अब निगाहें सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर
तृणमूल कांग्रेस के नाम, चुनाव चिह्न और संगठनात्मक नियंत्रण का विवाद अब न्यायिक प्रक्रिया के अगले चरण में प्रवेश कर रहा है। ममता बनर्जी की याचिका सूचीबद्ध किए जाने की सहमति से मामले की सुनवाई का रास्ता साफ हुआ है, लेकिन इससे आयोग के अंतरिम आदेश की वैधता पर अंतिम फैसला नहीं हो गया है।
एक ओर ममता बनर्जी का गुट चुनाव आयोग की व्यवस्था को चुनौती दे रहा है, वहीं दूसरी ओर प्रतिद्वंद्वी गुट भी पार्टी की पहचान और संगठनात्मक अधिकारों पर अपना दावा पेश कर चुका है। ऐसे में अदालत के सामने आयोग की प्रक्रिया, दोनों पक्षों की दलीलों और अंतरिम आदेश के कानूनी प्रभाव से जुड़े सवाल आ सकते हैं।

